नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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४६. पाद क्रिया के समय यदि हस्ताभिनय भी हो तो पाद की गति
विश्रान्त हो जाती है अतः ऐसे समय हस्त की क्या दशा हो इस आशंका
के उत्तर में कहते हैं कि पादचारी की समाप्ति पर हस्त को कटिप्रदेश में
रखा जाता है ।
५०. पैरों को पृथ्वी पर रखने पर पादचारी के समान होने पर काय
का सन्निवेश बतलाने के लिये स्थानकों को बतलाना क्रम प्राप्त हो जाता है ।
‘स्थान’ शब्द भाव, अधिकरण या करण अर्थ में व्युत्पन्न है ( स्थीयन्ते इति
स्थानाति, तिष्ठन्त्येषु इति स्थानानि, तिष्ठन्त्येभिरिति स्थानानि ) । अतः
इसके अनुसार चारी के द्वारा कायसन्निवेश भी होता है अर्थात् चारियाँ प्रथम
गतिरूप होती हैं तथा बाद में जब स्थितिरूपा हो जाती हैं तो उन्हें स्थानक
या स्थान कहा जाता है ।
५१. छः स्थानकों के नाम दिखलाकर सर्व प्रथम वैष्णवस्थान का स्वरूप
दिखलाते हैं ।
५२-५४. वैष्णवस्थानः- पक्षः स्थित पद से अंगुलियों की बाजू में
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