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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 668 में से

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पृष्ठ 518

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०७
फैला देने पर 'ऊर्ध्वमण्डल' हस्त हो जाते हैं। ललाट प्रदेश तक ऊपर ले जाना
ही इसका मुख्यतः 'लक्षण' है।
पार्श्वमण्डल-हस्त :- ऊर्ध्वमण्डल हस्त ही जब पताका के आकार में
(गोल घूमते हुए) परस्पर सम्मुख एक पार्श्वगत हो जाते हैं तो 'पार्श्वमण्डल'
कहलाते हैं। अन्य आचार्यों का कहना है कि वक्षःस्थल के बराबर अपने ही
बाजू या पक्ष में परस्पर आहत भुजों का ताल देकर घुमाते हुए वर्तना क्रम
से प्रचार करना ही इस हस्त का स्वरूप है।
१६६. उरोमण्डलीहस्त :- इसमें उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित हस्तों का
एक साथ योग रखा जाता है तथा ये वक्षःस्थल के समीप या सामने से
रहनेवाले होते हैं। इसमें हस्तक्रम ऐसा रखा जाता है कि एक के आगमन
से दूसरे का गमन या गोल घुमाना बना रहे (ऐसी वर्तना रहती है)
उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित क्रिया 'पताक' हस्तों की होती है। अन्य आचार्यों
के मत में यह 'हंसपक्ष' हस्त में रखे जाने की बात कहीं गयी है।
१६७. उरःपार्श्वार्धमण्डलहस्त :- इसमें वक्षःप्रदेश में उत्तान हस्त को
ठहरा कर फिर अलपल्लव हस्त को व्यावर्तित करण से निकाले तथा बाजू
में भुजा को फैला दे। यह एक हस्त की प्रक्रिया हुई। तब दूसरे हाथ की
अंगुलियों को अराल हस्त में उद्वेष्टित कर लावे। इसके नाम का भी यहाँ यही
कारण है कि इसमें एक हाथ से वक्षःस्थल के आधे भाग को और दूसरा हाथ
पार्श्व (बाजू) में मण्डल की तरह क्रमशः गतागत करते हैं।
१६८. मुष्टिकस्वस्तिकहस्त :- इसमें कलाई के समीप में दोनों हाथों में
से एक हस्त को अराल वर्तना से कुञ्चित रूप से तथा दूसरे हस्त को अलपल्लव
वर्तना से अञ्चित रूप से बार बार आवागमन करवाने के पश्चात् खटकामुख
हस्तों से स्वस्तिक करते हैं। इस प्रकार खटकामुखों की मुष्टि (हस्त) से
उत्पत्ति होने के कारण इसका 'मुष्टिकस्वस्तिक' नामकरण सार्थक है।
१६६. नलिनीपद्मकोशहस्त :- इस हस्त का विभिन्न आचार्यों ने
पृथक् २ वर्णन तथा स्वरूप बतलाया है। इसमें मुष्टिक युक्त स्वस्तिक के क्षेत्र
में जब दोनों कलाइयों को व्यावर्तित करण से कनिष्ठिका अंगुली एवं अंगूठों
का परितंन कर देते हैं तब दोनों कलाइयाँ परस्पर पराङ्मुख हो जाती हैं
जिससे दो पद्मकोश बन जाते हैं। इस प्रकार इसके नाम के अनुरूप ही
एक कमलिनी में अनेक कमलों की उत्पत्ति हो जाने से इसका 'नलिनीपद्म-
कोश' नाम हो जाता है।