नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशम अध्याय
( शारीराभिनय )
१. शारीराभिनय के क्रम में उरःकर्म बतलाये हैं जो पाँच हैं ।
२-३. आभुग्नउर :— इसमें वक्षः उन्नत या तान कर निष्क्रान्त, शुद्ध या
भुग्न अंस जिसमें रहें ऐसा रखा जाता है ।
४-५. इस वक्षःस्थल की योजना अतिशय हर्ष में भावण करने में भी
होती है [ द्र० ना० शा० संग्रह-४५६ ]
६-७. हिक्का = हिचकी लेना ।
११-१५. पार्श्व ( बाजू ) के पाँच कर्म तथा उनकी योजना दी गई है ।
१८. उदर के चौथे प्रभेद का प्रक्षिप्त पाठ के अनुसार ‘सम’ नाम है
तथा अन्य मत के अनुसार ‘रिक्त-पूर्ण’ भी एक प्रभेद है जिसकी योजना श्वास-
योग में की जाती है ।
२१-२६. कटि-कर्म के पाँचप्रभेद स्वरूप तथा उनकी योजना को मुनि
ने दिखलाया है जिसका है सभी पश्चाद् भावी नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के द्वारा
अनुसरण किया गया ।
२७-३२. कटिकर्म के निरूपण के पश्चात् मुनि ने ऊरु की पांच स्थितियाँ
वर्णित की तथा उनकी योजना भी ।
३३-३६. जंघा के विवरण के बाद मुनि ने जंघा के पाँच कर्म, स्वरूप
तथा उनकी योजना को बतलाया ।
४०-५४. पादकर्म का विवरण देते हुए मुनि ने इसके पांच प्रभेद
बतलाकर उनका स्वरूप तथा योजना भी दिखलाई तथा अन्त में ‘सूचीपाद’
का स्वरूप बतला कर उसकी योजना का निरूपण किया ।
५५-५७. नाभि, जंघा, उरु के करण रूप में दिखलाये गये कर्मों से
भिन्न पादकर्म होते हैं । कटि आदि की गतियाँ मण्डल भेद से निष्पन्न होती
है, अतः कटि आदि से पाद पर्यन्त कर्म को ही मिलाकर ‘चारी’ कही
जाएगी क्योंकि वह समान करण से निष्पन्न होती है । इस प्रकार अङ्ग के
विभिन्न प्रदेशों का विवरण इस अध्याय में देकर अभिनय के तत्त्वों को प्रस्तुत
कर अगले अध्याय में चारी रूप व्यायाम को देने के सूत्रपात के द्वारा अध्याय
समाप्ति को भी दिखलाया गया है ।