मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 631, कुल 804 में से
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शब्दों में एक ही को अनादि मानकर साधु और अन्य शब्दों के अनादि न होने से उनको
असाधु या अपभ्रंश माना जाता है।
पतञ्जलि ने महाभाष्य में कहा है कि एक ही शब्द के अनेक अपभ्रंश हैं, जैसे—
गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि । प्राचीन आचार्यों की यह उक्ति एवं शब्द और
अर्थ का अनादि वाच्यवाचकताविषयक युक्ति के अनुसार यही निश्चित होता है कि एक
शब्द साधु है अर वह अनादि है। किसी ने उसका संस्कार कर दिया है—इसलिए वह
संस्कृत=साधु हो गया है, ऐसी बात नहीं है। अनादि वाचक एक साधु शब्द ही मनुष्य
सुलभ अशक्ति के कारण अनेक आकार में परिवर्तित हो गया है और इन्हीं शब्दों ने
प्राकृत आदि भाषाओं में स्थान लाभ किया है। अतः प्राकृत आदि भाषा भी साधु
संस्कृत भाषा है, इसलिए इस भाषा की प्राचीनता में यह अकाट्य युक्ति है।
आशय यह है कि धर्म में वेद ही प्रमाण है। शब्द के प्रामाण्य का आप्त से कथित
होना ही है। वेद अपौरुषेय है, ऐसी स्थिति में आप्त प्रणीत न होने से अनाप्त वाक्य के
समान वे भी अप्रमाण रहेंगे। किन्तु वेद की अपौरुषेयता भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि
पद और पदार्थ के सम्बन्ध से एवं वाक्य और वाक्यार्थ के सम्बन्ध से वेद की पौरुषेयता
ही अनुमित होती है। क्योंकि शब्द और अर्थ का उसकी उत्पत्ति के बाद ही किसी
पुरुष के द्वारा—यह शब्द इस अर्थ का वाचक है या यह वस्तु इस शब्द की वाच्य है—इस
रूप में सङ्केत की कल्पना करने के बाद शब्द का प्रयोग हो सकता है। क्योंकि सङ्केत-
हीन शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता है। पद-पदार्थ के सम्बन्ध के समान ही वाक्य
और वाक्यार्थ का सम्बन्ध भी स्वाभाविक नहीं है, वह भी पुरुष के द्वारा कल्पित है।
क्योंकि पदार्थ ही वाक्यार्थ नहीं है। किसी विशेष अर्थ को व्यक्त करने के लिए ही
कतिपय पदसमूहों को परस्पर सम्बद्ध कर प्रयोग किया जाता है। अतः इस अर्थ के
पदसमष्टिरूप वाक्य का सम्बन्ध, वह भी पुरुष के द्वारा किया गया, कल्पित ही मानना
पड़ेगा, अतः वेद का वाक्य और वाक्यार्थ भी पुरुष के द्वारा निर्मित ही सिद्ध करता है।
वेद को आप्तों के द्वारा निर्मित होना मीमांसकों ने स्वीकार नहीं किया है, ऐसी स्थिति
में इसे अनाप्त वाक्य ही मानना पड़ेगा।
इसके समाधान में मीमांसकों ने कहा है कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध स्वाभाविक
है। 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे
तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्' (मी० सू० १।१।५) इस सूत्र में औत्पत्तिक शब्द का
अर्थ स्वाभाविक होता है, उत्पत्ति शब्द का अर्थ लक्षण के द्वारा स्वभाव होता है।
वाचक शब्द और वाच्य अर्थ दोनों ही नित्य हैं। अतः उसका स्वभाव भी नित्य है।
इसलिए इन दोनों का सम्बन्ध भी स्वाभाविक अर्थात् नित्य या अकृत अर्थात् अपौरुषेय है।
शब्द को नित्य नहीं मानने पर अर्थ की प्रतीति उपपन्न नहीं होगी। शब्द का
उच्चारण ही अर्थप्रतीति का साधन है, उच्चारण स्वयं फल नहीं है। अतः, अर्थ की
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