मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
५० मत्तविलास-प्रहसन
शाक्यभिक्षुः—भववं ! केण कारणेण एदं ण लक्खीअदि ।
भोः अचिक्खदु भववं । इमस्स वराणो । ७०[भगवन् केन कारणे-
नेतन्न लक्ष्यते । भोः आचष्टां भगवान् । अस्यायं वर्णः ।]
कपाली—किमत्र७१ वक्तव्यम् । ननु मया दृष्टम् । काकादपि
कृष्णमिदं कपालम् ।
शाक्यभिक्षुः—तेण हि एदं ममकेरअं ति सअं एव अब्भुवगदं ।
[तेन ह्येतन्मदीयमिति स्वयमेवाभ्युपगतम् ।]
कपाली—सत्यमभ्युपगतं तव वर्णान्तकरणे नैपुण्यम् ! पश्य,
यदेतदासीत् प्रथमं स्वभावतो मृणालभङ्गच्छविचोरमम्बरम् ।
ननु त्वया नीतमचिन्त्यकर्मणा तदेव बालारुणरागताम्रताम् ॥१५॥
अपिच,
आवृत्तं बहिरन्तश्च कषायेणानपायिना ।
त्वां प्राप्तं स्यात् कथं नाम कपालमकषायितम् ॥१६॥
देवसोमा—हा हदह्नि मन्दभाआ । सव्वलक्खणसम्पण्ण दाए
कमलासणसीसकवालाणुभावस्स पुण्णमासिसोमदंसणस्स णिच्चसुरा-
गन्धिणो एदस्स मलिनपडसंसग्गेण इअं ईदंसी अवत्था संवृत्ता ।
[हा हतास्मि मन्दभागा । सर्वलक्षणसम्पन्नतया कमलासनशीर्षकपा-
लानुभावस्य पौर्णमासीसोमदर्शनस्य नित्यसुरागन्धिन एतस्य मलिन-
पटसंसर्गेणेयमीदृश्यवस्था संवृत्ता ।] (इति रोदिति )
कपाली--प्रिये ! अलं सन्तापेन । पुनःशुचिर्भविष्यति । श्रूयन्ते
हि महान्ति भूतानि प्रायश्चित्तैरपनीतकल्मषाणि भवन्ति । तथा हि-७२
आस्थाय प्रयतो महाव्रतमिदं बालेन्दुचूडामणिः
स्वामी नो मुमुचे पितामहशिरश्छेदोद्भवादेनसः ।
नाथोऽपि त्रिदिवौकसां त्रिशिरसं त्वष्टुस्तनूजं पुरा
हत्वा यज्ञशतेन शान्तदुरितो भेजे पुनःपुरायताम् ॥१७॥
भो ! बभ्रु कल्प ! नन्वेवमेतत् !
पाशुपतः—आगमानु७३गतमभिहितम् ।
७०. भो भगवन् । ७१. किमनृतन्ननु मया । ७२. यथा । ७३. —नुरूपमभि— ।
हिन्दी अनुवाद ५१
शाक्यभिक्षु-हे भगवन् ! यह किस कारण से दिखाई नहीं दे रहा
है ? अरे भगवान् ! आप बताएँ, इसका यह रंग ।
कपाली—इसमें कहना क्या ? मैंने निश्चित रूप से देखा है । यह कपाल
कौए से भी काला है ।
शाक्यभिक्षु—इसीलिए तो यह मेरा (ही) है, यह (तुमने) स्वयं
सिद्ध कर दिया ।
कपाली—रंग बदलने में तो तुम्हारी निपुणता अवश्य ही सिद्ध हो
गई । देखो,
जो यह वस्त्र पहले स्वाभाविक रूप से कमलनाल के तन्तु की सुन्दरता
को चुराने वाला (सफेद) (था) वही अब अचिन्त्यकर्मा तुम्हारे द्वारा
(प्रातःकालीन) नवीन सूर्य की लालिमावाला बना दिया गया है ॥१५॥
और भी,
गेरुए रंग के वस्त्र (चीवर) से बाह्य और अन्तःस्वरूप को ढकने
वाले तुमको प्राप्त हुआ यह कपाल भला कैसे अकषायित (रंगे बिना) रह
सकता है ॥१६॥
देवसोमा—हाय ! मन्दभागिनी मैं मारी गई । सम्पूर्ण लक्षणों से
युक्त होने के कारण ब्रह्मा के शिरःकपाल का अनुकरण करने वाले, पूर्णिमा
के चन्द्रमा के सदृश दर्शनीय, सदैव मदिरा की गन्ध से युक्त इस (कपाल) की
मैले वस्त्रों के सम्पर्क से यह ऐसी दशा हो गई है । (ऐसा कहकर रोती है)
कपाली—प्रिये ! दुःखी मत होओ । फिर से पवित्र हो जाएगा ।
ऐसा सुना जाता है कि महान् लोग प्रायश्चित्त के द्वारा पापों से रहित
(निष्पाप) हो जाते हैं । जैसे कि—
नवीन चन्द्रमारूपी चूडामण्डल वाले हमारे स्वामी (शिव) ब्रह्मा के
सिर को काटने से उत्पन्न पाप के कारण इस (प्रायश्चित्त-रूपी) महाव्रत
का नियमपूर्वक पालन करके (पाप) मुक्त हुए। प्राचीन काल में
देवताओं के स्वामी (इन्द्र) ने भी त्वष्टा के पुत्र त्रिशिरा को मारकर, सौ
यज्ञ (करने) से पापों को शान्त कर, फिर से पुण्यत्व का सेवन
किया ॥१७॥
बभ्रुकल्प ! निस्संदेह ऐसा ही है ।
पाशुपत—आगम के अनुसार ही कहा है ।
५२ मत्तविलास-प्रहसन
शाक्यभिक्षुः—भो०७४वण्णो दाव मए किदो । इमस्स
लट्ठाणपरिमाणं केण णिम्मिदं । [भोः ! वर्णस्तावन्मया कृतः ।
अस्य संस्थानपरिमाणं०७५ केन निर्मितम् । ]
कपाली—ननु मायासन्तानसम्भवाः खलु भवन्तः ।
शाक्यभिक्षुः—केत्तिअं वेलं भवन्तं अक्कोसामि । गण्हदु
भअवं । [कियतीं वेलां भवन्तमाक्रोशामि । गृह्णातु भगवान् ।]
कपाली—नूनमेवं बुद्धेनापि दानपारमिता पूरिता ।
शाक्यभिक्षुः—एवं गदे किं दाणि मे सरण । [ एवं गते किमि-
दानीं मे शरणम् ।]
कपाली—ननु बुद्धधर्मसङ्घाः ।
पाशुपतः—नायं व्यवहारो मया परिच्छेत्तुं शक्यते । तदधि-
करणमेव यास्यामः ।
देवसोमा—भअवं ! जइ एवं, णमो कवालस्स । [भगवन् !
यद्येवं, नमः कपलाय ।]
पाशुपतः—कोऽभिप्रायः ।
देवसोमा—एषो उण अणेअविहारभोअसमधिगवित्तसञ्चओ,
जहाकामं अधिकरणकारुणिआणं मुहाणि पूरेदुं पारेदि । अह्माअं
पुण अहिचम्म भूदिमत्तविभवस्सदरिद्दकवालिअस्स परिआरिआणं
को एत्त विभवो अधिकरणं पवेसिदुं । [एष पुनरनेकविहारसमधि-
गतवित्तसञ्चयो यथाकामम०७६धिकरणकारिणिकानां०७७ मुखानि
पूरयितुं पारयति । अस्माकं पुनरहिचर्मभूतिमात्रविभवस्य०७८
दरिद्रकापालिकस्य परिचारिकाणां कोऽत्र विभवोऽधिकरणं प्रवेष्टुम्]
पाशुपतः—नैतदेवम्०७६—
अजिह्मः सारगुरुभिः स्थिरैः श्लक्ष्णैः सुजन्मभिः ।
तैर्धर्मो धार्यते स्तम्भैः प्रासाद इव साधुभिः ॥१८॥
७४. भोदु वण्णं । ७५. णं तावत् कथम् । ७६. सं कारु ।
७७. —कारुणिका । ७८. —वदरिद्र । ७६. मा मैवम्—।
हिन्दी अनुवाद ५३
शाक्यभिक्षु—अरे ! ठीक है (माना कि) रंग तो मैंने बदल दिया ।
(परन्तु) इसका आकार और परिमाण किसने बदला ?
कपाली—आप लोग तो माया की ही सन्तान हैं !
शाक्यभिक्षु—कितनी देर तक आपकी निंदा करूँ भगवन् ! लीजिए ।
कपाली-वस्तुतः बुद्ध ने भी इस प्रकार दानपारमिता पूर्ण की थी ।
शाक्यभिक्षु—इसके बाद अब मेरी शरण कहाँ ?
कपाली—निस्संदेह बुद्धधर्म के सङ्घ ।
पाशुपत-इस विवाद का निर्णय करना मेरे लिए असम्भव है । तो
न्यायालय ही चलते हैं ।
देवसोमा-यदि ऐसा है तो कपाल को नमस्कार ।
पाशुपत-क्या मतलब ?
देवसोमा-फिर यह अनेक मठों से प्राप्त हुई धनराशि वाला, इच्छा-
नुसार न्यायालय के अधिकारियों के मुखों को (रिश्वत देकर) भर सकता है ।
लेकिन सर्प की केंचुली मात्र जिसकी सम्पत्ति है ऐसे दरिद्र कापालिक की
हम जैसी सेविकाओं के पास न्यायालय में प्रवेश के लिए कौन साधन है ?
पाशुपत-नहीं ऐसी बात नहीं है ।
सरल (स्तम्भ पक्ष में—सीधे) सारगर्भ के कारण गुरु बने हुए (पक्ष
में—भारी), धैर्यशाली (पक्ष में—ठोस), नम्र (पक्ष में-चिकने), सत्कुलोत्पन्न
(पक्ष में-अच्छी नस्ल वाले) उन साधुओं द्वारा धर्म वैसे ही धारण किया
जाता है, जैसे स्तम्भों से महल (धारण किया जाता है) ॥१५॥
५४ मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—कृतमनेन। कुतश्चिदपि न्याय्यवृत्तेर्भयं नास्ति।
शाक्यभिक्षुः—भो भअवं ! तुमं दाव अग्गदो होहि। [भो८०
भगवन् ! त्वं तावदग्रतो भव ]
पाशुपतः—बाढम् ।
(सर्वे परिक्रामन्ति)
(ततः प्रविशत्युन्मत्तकः)
उन्मत्तकः—एशे एशे दुट्ठकुक्कुले । शुल्लमंशगब्भं कवालं
गण्हिअं धावशि। दाशीएवुत्त ! कहि गमिश्शिशि । एशे दाणि कवालं
णिक्खिविअ मं खादितुकामो अहिमुहं आहावइ । इमिण पत्थलेण
दन्ताणि शे भंजिश्शं । कहं कवालं उज्झिअ पलाअशि । उम्मत्ते
दुट्ठकुक्कुले ईदिशेण णाम शूलत्तणेण मए शह विलोशं कलेशि ।
गामशूगलं आलुहि अ गगणमुप्पदिदेण शागलेण पडिभञ्जिअ लावणं
बला गहीदे शाक्कशुदे तिमिङ्कले । अइ एलण्डलुकख ! किं भणाशि—
अलिअं अलिअं त्ति । णां एशे मुशलशमविशाललम्बहत्थे दद्दिले मे
शक्खी । अहव तेल्लोककविदिअपलक्कमश्श शक्खिणा कि कय्यं ।
एवं कलिश्शं । कुक्किलखादिअशेशं मंशखण्डं खादिशं । हा हा
मालिदोम्हि, बप्फेण मालिदोम्हि । के एशे मं तालेशि । दुट्ठदालआ
जश्शवा कश्श वा भाअणोओ खु अहं, भीमशेणश्श घटुक्कओ विअ ।
अविअशुणाथ,
गहीदशूला बहुवेशधालिणो शदं पिशाआ उदले वहन्ति मे ।
शदं च वग्घाण णिशग्गभीशणं मुहेण मुञ्चामि अहं महोलये ॥
कहं मं बाहन्ति । पशीदन्तु पशीदन्तु दालअभट्टा । इमश्श मंशखण्डश्श
कालणादो मामं वाहेह । एशे खु अम्हाणं आआलिए शूलनन्दी जावं
णं अवशप्पामि । [एष एष दुष्टकुक्कुरः । शूल्यमांसगर्भं कपालं
गृहीत्वा धावसि८१ । दास्याःपुत्र ! कुत्र गमिष्यसि । एष इदानीं कपालं
निक्षिप्य मां खादितुकामोऽभिमुखमाधावति । (दिशो विलोक्य)
अनेन प्रस्तरेण दन्तानस्य भङ्क्ष्यामि । कथं कपालमुज्झित्वा पलायसे ।
उन्मत्तो दुष्टकुक्कुर ईदृशेन नाम शूरत्वेन८२ मया सहापि८३ रोषं
८०. (पाशुपतमवलोक्य) भो । ८१. धावति । ८२. न सह । ८३. ह विरोधं क-।
हिन्दी अनुवाद ५५
कपाली—इसकी आवश्यकता नहीं । न्यायी व्यक्ति को कहीं से भी
भय नहीं होता है ।
शाक्यभिक्षु-हे भगवन् ! तब तुम्हीं आगे चलो ।
पाशुपत — अच्छा ।
(सब घूमते हैं)
(तब पागल व्यक्ति प्रवेश करता है )
उन्मत्तक-यह दुष्ट कुत्ता । 'शूल्यमांस से युक्त कपाल को लेकर
भाग रहा है। ओ दासी के पुत्र ! कहाँ जायगा ? अब यह कपाल को
फेंककर मुझे खाने की इच्छा से इधर की ओर दौड़ा आ रहा है। (चारों
ओर देखकर) इस पत्थर से इसके दाँतों को तोड़ दूंगा। क्या ? कपाल
को छोड़कर भाग रहा है ? पागल दुष्ट कुत्ते इस प्रकार की वीरता के बल
पर मुझसे क्रोध करता है। गाँव के सूअर पर चढ़कर आकाश में उड़ने वाले
समुद्र ने रावण को कुचल कर इन्द्र के पुत्र तिमिङ्गल को बलपूर्वक पकड़
लिया था। अरे एरण्ड के वृक्ष ! क्या कहते हो—झूठ है, झूठ है। लेकिन
मुसल के समान अत्यधिक लम्बे हाथ वाला यह मेढक मेरा साक्षी है।
अथवा तीनों लोकों में विख्यात पराक्रमी को साक्षी की क्या आवश्यकता ?
(तो) ऐसा करता हूँ। कुत्ते के खाने के बाद अवशिष्ट मांस के टुकड़े को
खाऊँगा। (खाता हुआ भ्रान्त होकर) हाय ! हाय ! आँसुओं से मारा
५६ मत्तविलास-प्रहसन
करोषि । ग्रामशूकर८४मारुह्य गगनमुत्पतितेन सागरेण८५ प्रभ-८६
ञ्ज्यरावणं८७ बलाद्गृहीतः८८शक्रसुतस्तिमिङ्गिलः८६ । अयि
एरण्डवृक्ष ! किं भणसि अलीकमलीकमिति । नन्वेष मुसलसम-
विशाललम्बहस्तो दर्दुरी मे साक्षी६० । अथवा त्रैलोक्यविदित-
पराक्रमस्य साक्षिणा किं कार्यम्६१ । एवं६२ करिष्यामि । कुक्कुर-
खादितशेषं मांसखण्डं खादिष्यामि । (खादन्भ्रान्तः) हा हा
मारितोऽस्मि वाष्पेण६३ मारितोऽस्मि (रुदित्वा विलोक्य) क एष मां
ताडयसि । (विलोक्य) दुष्टदारकाः ! यस्य वा कस्य वा भागिनेयः
खल्वहं भीमसेनस्य घटोत्कच इव । अपि च शृणुथ
गृहीतशूला बहुवेशधारिणाः शतं पिशाचा उदरे वहन्ति६४मे ।
शतं च व्याघ्राणां निसर्गभीषणं मुखेन मुञ्चाम्यहं महोरगान् ॥१६॥
कथं मां बाधन्ते । प्रसीदन्तु दारकभर्तारः । अस्यमांसखण्डस्य कार-
णाद् मा मां६५ बाधध्वम् । (अग्रतो विलोक्य) एष खल्वस्माकमा-
चार्यः शूरनन्दी । यावदेनमुपसर्पामि ।] (इति धावति)
पाशुपतः — अये ! अयमुन्मत्तः इत एवाभिवर्तते । य एषः,
निर्विष्टोज्झितचित्रचीवरधरो रूक्षैर्नितान्ताकुलैः
केशैरुद्धतभस्मपां६६सुनिचयैर्निर्मात्यमालाकुलैः६७ ।
उच्छिष्टाशनलोलुपैर्बलिभुजामन्वास्यमानो गणै-
र्भूयान् ग्रामकसारसञ्चय इव भ्राम्यन् मनुष्याकृतिः ॥२०॥
८४. र गल मा — । ८५. श्वगणेन । ८६. प्रतिभज्य ।
८७. ञ्ज्य ऐरावतं गृ — । ८८. तः ससुतः ।
८६. ग्रामसूकरः कुक्कुरः, तस्य गलं कण्ठं, गगनमुत्पतितेन मया श्वगणेन
सह ऐरावतं प्रतिभज्य गृहीतः ससुतस्तिमिङ्गिल इति उन्मत्तप्रलापः ।
६०. हनुमत एषा मुसलसमविशाललम्बहस्ते दर्दुरे मे शक्तिः ।
६१. अथवा किं मम त्रैलोक्यविदितपराक्रमस्य शक्त्या कार्यम् ।
६२. — वं तावत् करिष्ये । ६३. मालितोऽस्मि वाषेण ।
६४. — स — । ६५ मां ताउयथ । ६६. पाण्डुनि— ।
६७. — लावृतः, — लावृतैः ।
हिन्दी अनुवाद ५७
गया। (रोकर, देखकर) यह कौन मुझे मार रहा है ! (देखकर) अरे दुष्ट
लड़को ! मैं भीमसेन का घटोत्कच के समान जिस किसी का भी भान्जा
हूँ, और भी सुनो—
शूल ग्रहण किए हुए, नाना वेषधारी सैकड़ों पिशाच मेरे पेट में
घूम रहे हैं। स्वभाव से भयङ्कर मैं सैकड़ों बाघों को और बड़े-बड़े सर्पों को
मुख से उगल रहा हूँ ॥१६॥
मुझे कष्ट क्यों दे रहे हो ? अरे युवको ! प्रसन्न हो जाओ। इस मांस के
टुकड़े के कारण मुझको कष्ट मत दो। (सामने देखकर) अरे ये हमारे गुरु
शूरनन्दी ! तो इनके पास जाता हूँ। (दौड़ता है )
पाशुपत—अरे यह पागल इधर ही आ रहा है। जो यह—
सूखे हुए, अत्यधिक बिखरे हुए, उड़ती हुई भस्म और धूलि समूह से
भरे हुए, बासी मालाओं से व्याप्त बालों से, जूठा खाना खाने के लिए
लोलुप कौओं के समूह जिसका पीछा कर रहे हैं (ऐसा), पहनने के पश्चात्
छोड़े हुए विचित्र वस्त्र धारण करने वाला, मानों बहुत सारा गाँव के
कूड़े का ढेर ही मनुष्य का आकार धारण करके घूमता हुआ (इधर ही आ
रहा है ) ॥२०॥
५८ मत्तविलास-प्रहसन
उन्मत्तकः—जावणं उपशप्पमि । महाशाहणो चराधाल
कुक्कुलश्श शाआशादो अहिगदं एदं कवालं पडिगह्हदु भअवं ।
[^६८यावदेनमुपसर्पामि । (उपसृत्य) महासाधोश्चण्डालकुक्कुरस्य
सकाशादधिगतमेतत्^६६कपालं प्रतिगृह्णातु भगवान्^१००।]
पाशुपतः—(सहृष्टिक्षेपम्) पात्रे प्रतिपाद्यताम् ।
उन्मत्तकः—महाबम्हण ! कलिअदु पशादो । [महाब्राह्मण !
क्रियतां प्रसादः ।]
शाक्यभिक्षुः—एषो महापासुवदो एदस्स जोग्गो । [एष
महापाशुपत एतस्य योग्यः ।]
उन्मत्तकः—(कपालिनमुपगम्य कपालं भूमौ निक्षिप्य प्रदक्षिणी-
कृत्य पादयोः पतित्वा) महादेव ! कलिअदु पशादो । एशो दे
अञ्जली । [महादेव ! क्रियतां प्रसादः । एष ते ऽञ्जलिः ।]
कपाली—^१०१अस्मदीयं^१०२ कपालम् ।
देवसोमा—एवं एद [^१०३एवमेतत् ।]
कपाली—भगवत्प्रसादात् पुनरपि कपाली संवृत्तः । (ग्रहीतु-
मिच्छति ।)
उन्मत्तकः—दाशीएवुत्त ! विशं खादेहि । [दास्याःपुत्र ! विषं
खाद ।] (कपालमाच्छिद्य गच्छति)
कपाली—(अनुसृत्य) एष^१०४ यमपुरुषो मे जीवितं हरति ।
अभ्यवपद्येतां भवन्तौ ।
उभौ—होदु अम्हे दे सहाआ होम । [भवतु ! आवां ते
सहायौ भवावः ।]
(सर्वे रुन्धन्ति)
कपाली—भोः ! तिष्ठ तिष्ठ ।
उन्मत्तकः—किश्श मं लुन्धन्ति । [कस्मान्मां रुन्धन्ति ।]
कपाली—अस्मदीयं कपालं दत्वा गम्यताम् ।
उन्मत्तकः—मूढ ! कि ण पेक्खशि, शुवण्णभाअणं खु एदं ।
[मूढ ! किं न पश्यसि, सुवर्णभाजनं खल्वेतत् ।]
६८. (पाशुपतमवलोक्य) याव— । ६६. —शाद् मया अधि— ।
१००. भगवान् ! भगवान् ! मस्तकेन वन्दामि । १०१. प्रिये अस्म —।
१०२. —दीयमिदं क— । १०३. भगवन् एव— ।
१०४. हन्त यम— ।; कष्टं एषः।
उत्तरोत्तर रहस्योद्घाटन, भरतवाक्य, दार्शनिक समीक्षा एवं उपसंहार
हिन्दी अनुवाद ५६
उन्मत्तक - अब इसके पास जाता हूँ । (पास जाकर) महासज्जन
चण्डाल के कुत्ते से प्राप्त इस कपाल को भगवन् ग्रहण करें ।
पाशुपत—(दृष्टि तिरछी कर) उचित पात्र को दें ।
उन्मत्तक- महाब्राह्मण ! कृपा कीजिए ।
शाक्यभिक्षु-यह महापाशुपत इसके योग्य है ।
उन्मत्तक-(कपाली के पास जाकर कपाल को पृथ्वी पर रखकर,
प्रदक्षिणा करके, पैरों पर गिर कर) महादेव ! कृपा कीजिए । तुम्हारे लिए
यह अञ्जलि है ।
कपाली-हमारा कपाल !
देवसोमा—हां ।
कपाली-भगवान् की कृपा से फिर कपाली बन गया । (लेना
चाहता है )
उन्मत्तक-अरे दासी के पुत्र ! विष खा । (कपाल छीनकर जाने
लगता है)
कपाली-(पीछा करके) यह यमदूत मेरे प्राणों को ले रहा है । आप
दोनों इसे पकड़ें ।
दोनों-ठीकं है । हम दोनों तुम्हारे सहायक बनते हैं ।
(सब रोकते हैं )
कपाली-अरे ! ठहरो, ठहरो ।
उन्मत्तक-मुझे क्यों रोक रहे हो ।
कपाली-हमारे कपाल को देकर जाओ ।
उन्मत्तक-मूर्ख ! क्या देखता नहीं है, यह तो सोने का पात्र है ।
६० मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—एवंविधं सुवर्णभाजनं केन कृतम् ।
उन्मत्तक—एदिणा शुवण्णवराणपडावुदेण शुवण्णकारावुत्त-
एण किदं त्ति भअवं ! शुवण्णभाअण त्ति भणामि । [एतेन सुवर्णवर्ण-
पटावृतेन सुवर्णकारा१०५वुत्तेन कृतमिति भगवन् ! सुवर्णभाजन-
मिति भणामि ।]
शाक्यभिक्षुः—किं भणसि ।
उन्मत्तकः—शुवण्णभाअणं त्ति । [सुवर्णभाजनमिति ।]
शाक्यभिक्षुः—किमअं उम्मत्तओ । [किमयमुन्मत्तकः ।]
उन्मत्तकः—उम्मत्तओ त्ति बहुशो एदं शद्दं शुणोमि । एदं
गण्हिअ दलिशेहि उम्मत्तअं । [१०६उन्मत्तक इति बहुश एतं शब्दं
शृणोमि । एतद् गृहीत्वा दर्शयोन्मत्तकम् ।] (कपालिने कपालं
प्रयच्छति)
कपाली—(कपालं गृहीत्वा) अयमिदानीं कुड्येनान्तर्हितः ।
शीघ्रमनुगम्यताम् ।
उन्मत्तकः—लद्धप्पशादे ह्नि । [लब्धप्रसादोऽस्मि ।]
(निष्क्रान्तो जवेनोन्मत्तकः)
शाक्यभिक्षुः—अहो अच्छरिअं । परवक्खस्स लाभेण अहं
परितुट्ठो ह्नि । [अहो आश्चर्यम् । परपक्षस्य लाभेनाहं परितुष्टोऽस्मि ।]
कपाली—(कपालं परिष्वज्य)
चिरं मया चरितमखण्डितं तपो
महेश्वरे भगवति भक्तिरस्ति१०७ मे ।
तिरोहितः स तु सहसा सुखेन न-
स्त्वमद्य यत् कुशलि कपाल ! दृश्यसे ॥२१॥
देवसोमा—भअवं ! चन्दसमागदं विअ पओसं भअवन्तं
पेक्खन्तीए अज्ज आणन्ददो विअ मे दिट्ठी । [भगवन् ! चन्द्रसमा-
गतमिव प्रदोषं भगवन्तं पश्यन्त्या अद्यानन्दतीव मे दृष्टिः ।]
१०५. —कारेण कृत— ।
१०६ युष्माकं उन्मत्तका । युष्माकं पुत्रा उन्मत्तकाः । एतद् दत्वा दर्शयामि
उन्मत्तकत्वम् । १०७. अस्तु ।
हिन्दी अनुवाद ६१
कपाली-ऐसा सोने का पात्र किसने बनाया ।
उन्मत्तक-भगवन् ! सुनहरे वर्ण वाले वस्त्र से (शरीर को) ढकने
वाले मेरे सुनार भगिनीपति ने बनाया है । इसलिए सोने का पात्र है (ऐसा)
कह रहा हूँ ।
शाक्यभिक्षु-क्या कह रहे हो ?
उन्मत्तक-सोने का पात्र ।
शाक्यभिक्षु-क्या यह पागल है ?
उन्मत्तक-'पागल' यह शब्द बार-बार सुनता हूँ । इसे (कपाल को)
लेकर (मुझे) पागल को दिखाओ । (कपाली को कपाल देता है )
कपाली-(कपाल को लेकर) यह तो अब दीवार से ओझल हो गया ।
जल्दी से पीछा करो ।
उन्मत्तक-मुझे प्रसन्नता हुई ।
(पागल तेजी से निकल जाता है )
शाक्यभिक्षु-अरे आश्चर्य है । मैं शत्रुपक्ष के लाभ से हर्षित हुआ ।
कपाली-(कपाल का आलिङ्गन करके)
मैंने बहुत समय तक अखण्ड तप किया है । भगवान् शिव में मेरी
भक्ति है । वह (पागल) तो अचानक सरलतापूर्वक ओझल हो गया, (किन्तु)
हमारे कुशल कपाल ! तुम आज दिखाई दे रहे हो ॥२१॥
देवसोमा-स्वामी ! चन्द्रमा के साथ आए हुए संध्याकाल के समान
आपको देखती हुई मेरी दृष्टि आज प्रफुल्लित हो रही है ।
६२ मत्तविलास-प्रहसन
पाशुपतः—दिष्ट्या भवान् वर्धते ।
कपाली—नन्वभ्युदयो भवतामेव ।
पाशुपतः—(आत्मगतम्) सत्यमेतत् — नास्त्यदोषवतां
भयमिवि१०८। यदयमद्य१०९ भिक्षुर्व्याघ्रमुखात्११० परिभ्रष्टः ।
(प्रकाशम्) यावदहमिदानीमेव सुहृदभ्युदयकृतमानन्दं पुरोधाय
भगवतः पूर्व१११स्थली११२निवासिनो धूमवेलां११३ प्रतिपाल-
यामि११४। अयं चाद्यप्रभृति—
विरोधः पूर्वसम्बद्धो युवयोरस्तु शाश्वतः ।
परस्परप्रीतिकरः किरातार्जुनयोरिव ॥२२॥
(निष्क्रान्तः पाशुपतः)
कपाली — भो नागसेन ! यन्मयापराधः कृतः, तत् प्रसन्नहृदयं
त्वामिच्छामि ।
शाक्यभिक्षुः—किं एद पि अब्भत्थणीअं । किं दे पिअं करेमि ।
[किमेतदप्यभ्यर्थनीयम् । किं ते प्रियं करोमि ।]
कपाली—यदि मे भगवान् प्रसन्नः किमतः परमहमिच्छामि ।
शाक्यभिक्षुः—गच्छामि दाव अहं । [गच्छामि तावदहम् ।]
कपाली—गच्छतु भवान् पुनर्दर्शनाय ।
शाक्यभिक्षुः—तह होदु । [तथा भवतु ।] (निष्क्रान्तः)
कपाली—प्रिये देवसोमे ! गच्छावास्तावत् ।
(भरतवाक्यम्)
शश्वद् भूत्यै प्रजानां वहतु विधिहुतामाहुतिं जातवेदा
वेदान् विप्रा भजन्तां सुरभिदुहितरो भूरिदोहा भवन्तु ।
उद्युक्तः स्वेषु ११५धर्मेष्वयमपि विगतव्यापदाचन्द्रतारं
राजन्वानस्तुशक्तिप्रशमितरिपुणा शत्रुमह्लेन लोकः ॥२३॥
(निष्क्रान्तौ)
(मत्तविलासप्रहसनं समाप्तम्)
१०८. —ति अय— । १०९. —द्य व्याघ्र ।
११०. —त् कथमपि प— । १११. —वां । ११२. ल ।
११३. —लां सम्भावयामि । अयं — । धूम्रवेलां । ११४. —मि अद्य— ।
११५. कर्मेष्वय— ।
हिन्दी अनुवाद ६३
पाशुपत — सौभाग्यवश आपकी उन्नति हो रही है ।
कपाली — उन्नति तो आपकी ही है ।
पाशुपत-(स्वगत) यह सत्य है—(कि) निर्दोष को भय नहीं होता
है, जो आज यह भिक्षु बाघ के मुख से बच गया । (प्रकट) तो मैं
इसी समय मित्र के अभ्युदयजन्य आनन्द को ही सामने रखकर सर्वप्रथम
भगवान् (महादेव) की संध्याकालीन अर्चना करने जाता हूँ । और आज
से यह—
तुम दोनों का किरात और अर्जुंन के समान पूर्वसम्बद्ध विरोध सदैव
आपस में प्रेमवर्धक होवे ॥२२॥
(पाशुपत निकल जाता है)
कपाली—अरे नागसेन ! क्योंकि मैंने अपराध किया है, इसलिए
(अब) तुमको प्रसन्न हृदय (देखना) चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—क्या ये भी प्रार्थनीय है ? तुम्हारा क्या उपकार करूँ ?
कपाली—यदि भगवान् (आप) मुझसे प्रसन्न हैं तो इससे अधिक क्या
इच्छा करूँ ?
शाक्यभिक्षु–तो मैं जाता हूँ ।
कपाली-पुनर्दर्शन के लिए आप जाएं ।
शाक्यभिक्षु–ठीक है। (निकल जाता है )
कपाली-प्रिये देवसोमा ! चलो चलें ।
(भरतवाक्य)
अग्नि, विधिपूर्वक हवन की गई आहुति को सदैव प्रजा के ऐश्वर्य
के लिए वहन करे। ब्राह्मण लोग वेद पढ़ें, कामधेनु की पुत्रियाँ (गायें)
अत्यधिक दूध देने वाली होवें, और यह संसार भी अपने धर्मों में लगा हुआ,
जब तक चन्द्रमा और तारे हैं (तब तक) विपत्ति रहित हो (और) शक्ति
से जिसने शत्रुओं को शान्त कर दिया है ऐसे शत्रु मल्ल (नाम के राजा) से
सनाथ होवे ॥२३॥
(निकल जाते हैं)
॥ मत्तविलास प्रहसन समाप्त ॥
६४
प्रहसन के पात्र
पुरुष-पात्र
सत्यसोम—एक कपालधारी, शैव तान्त्रिक एवं प्रहसन का नायक ।
नागसेन—एक पतित बौद्धभिक्षु ।
बभ्रुकल्प—पाशुपत; शैव-मतानुयायी ।
उन्मत्तक—एक पागल ।
स्त्री-पात्र
देवसोमा—कापालिक की सहचरी ।
टिप्पणियाँ
नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः (पृ० २२)—
'नन्दयतीति नान्दी' इस व्युत्पत्ति के अनुसार देव, ब्राह्मण और
राजादिकों को आनन्दित करने वाली स्तुति 'नान्दी' कहलाती है—
आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते ।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ।। सा०द० ६.२४
विश्वनाथ आदि आचार्यों के मतानुसार नान्दी तो वास्तव में पूर्वरङ्ग
का रङ्गद्वार नामक एक अङ्ग है । इसको नान्दी न कहकर रङ्गद्वार कहना
चाहिए। यही विचार भरत मुनि का भी है। उनके कथनानुसार नान्दी तो
रङ्गद्वार के पूर्व ही कर ली जाती है। 'नान्द्यन्ते' का अर्थ है—नटकृत नान्दी
पाठ की समाप्ति के पश्चात् सूत्रधार नटमण्डलाधिपति रङ्गभूमि से निकल
जाता है और तत्पश्चात् (वेष-भूषा की दृष्टि से) उसी प्रकार का दूसरा नट
जो नटोपाध्यक्ष अथवा स्थापक कहलाता है, रङ्गशाला में प्रवेश करता है ।
अतः सूत्रधार से तात्पर्य उपाध्यक्ष नामक दूसरे नट से है, प्रधान नट जो
नान्दी पाठ करता है उससे नहीं । अतः प्रथम श्लोक कुछ आचार्यों के अनुसार
लक्षण साम्य होने से रङ्गद्वार है ।
सामान्य रूप से ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए नान्दी पाठ
होता है ।
सूत्रधार (पृ० २२)—
'सूत्रं प्रयोगानुष्ठानं धारयतीति सूत्रधारः स्थापनानामा नटः ।' अर्थात्
नाट्यसामग्री रूपी सूत्र को जो धारण करता है, वह सूत्रधार कहलाता है ।
यह सर्वप्रथम रंगभूमि में आकर कथावस्तु का बीजारोपण करता है ।
भाषावेषवपुःक्रियागुणकृतान् (श्लोक १; पृ० २२)—
अभिनय चार प्रकार के होते हैं—
१. वाचिक (भाषा) २. आहार्य (वेष) ३. कायिक (वपुःक्रिया)
और ४. सात्त्विक (गुण) ।
६६ टिप्पणियाँ
वाचिक अभिनय—आलाप, गीत, वार्ता आदि होते हैं; आहार्य अभिनय—वेष-
भूषा इत्यादि होते हैं; कायिक अभिनय—हस्त-पाद-नेत्र संचालन आदि और
सात्त्विक अभिनय—हर्ष, लज्जा, चिन्ता, शोकादि होते हैं ।
इन चार प्रकार के अभिनयों के द्वारा (राम, दुष्यन्त आदि) पात्रों
का अनुकरण इस कुशलता के साथ किया जाता है कि सामाजिकों को नटों
में पात्रों की ही प्रतीति होने लगती है।
भावावेशवशात् (पृ० २२)—
भाव और आवेश—ये चित्त के विकार होते हैं—
—'भावा बहुधा चित्तविक्रियाः'।
भाव अनेक प्रकार के होते हैं जैसे—रति, सत्य, भेद, भय, क्रोध, लोभ, मद,
मोद, स्नेह, भ्रम इत्यादि ।
अनेकरसताम् (पृ० २२)—
अनेक-रसता को । काव्य रस से युक्त होता है, जैसा कि साहित्य-
दर्पणकार विश्वनाथ का भी मत है—
'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' ।
काव्यप्रकाशकार मम्मट भी काव्य को नवरसों से रुचिकर मानते हैं—
'नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति' ।
कुछ आचार्य काव्य में आठ ही रसों का समावेश करते हैं । वे काव्य में शांत
रस के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं। परन्तु कुछ आचार्य काव्य में
वात्सल्य रस का भी अन्तर्भाव मानते हैं। भक्ति इत्यादि और भी रस माने
गये हैं ।
नृत्तम् (पृ० २२)—
नृत्य और नृत्त इन दोनों शब्दों में गात्र-विक्षेप (अङ्गों का चलाना)
अर्थ की समानता अवश्य है परन्तु फिर भी दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं।
नृत्य में पदार्थ का अभिनय होता है। धनञ्जय के अनुसार नृत्य भावाश्रित
होता है—'भावाश्रयं नृत्यम्' (दश० १.९) जबकि नृत्त ताल (हाथ की
ताली) और लय (द्रुत, मध्यम और विलम्बित) पर आश्रित होता है—'नृत्तं
मत्तविलास-प्रहसन ६७
ताललयाश्रम्' (दश० १.१०) । नन्दिकेश्वर के मतानुसार नृत्त में भावाभिनय
नहीं होता है—
'भावाभिनयहीनं तु नृत्तमित्यभिधीयते' । —अभिनयदर्पण १५
नृत्त सुकुमार प्रयोग है—इसका जन्म शृङ्गार रस से होता है । महोत्सव तथा
प्रिया-समागम के समय इसका आयोजन विहित है । उसमें कथानक बिल्कुल
नहीं होता है । पुनः नृत्य और नृत्त मधुर और उद्धत भेद से लास्य और ताण्डव
रूप में दो प्रकार के होते हैं ।
नृत्य और नृत्त का विवेचन सङ्गीतशास्त्र के ग्रन्थों में द्रष्टव्य है ।
निष्प्रतिबद्धबोधमहिमा (पृ० २२)—
'निष्प्रतिबद्धः बोधस्य महिमा यस्य सः' । अर्थात् जिसके ज्ञान की महिमा
अकुण्ठित है; जो अनिन्दनीय ज्ञान वाला है; जो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी है।
कपाली—
यहाँ कपाली एक ओर शिव के लिए प्रयुक्त हुआ है और दूसरी ओर
प्रस्तुत प्रहसन के मुख्य नायक सत्यसोम की ओर भी सङ्केत करता है ।
चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभरमत्तविलासप्पहणं (पृ०.२२)—
यहाँ नटी 'मत्तविलासप्रहसन' की ओर प्रत्यक्ष सङ्केत नहीं कर रही
है, अपितु सूत्रधार को वृद्धावस्था में छोटी पत्नी के साथ रमण करने के कारण
उलाहना दे रही है कि 'यौवन के गुणों से भरे हुए मतवालों के विलास को
दिखाने आए हो ?' सूत्रधार बहुत दिनों तक अपनी छोटी पत्नी के साथ
रमण करता रहा जिससे कि बड़ी पत्नी (नटी) रुठ गई थी ।
कुलपर्वत (पृ० २४)—
मुख्य पहाड़, जो इस महाद्वीप के प्रत्येक खण्ड में विद्यमान माने
जाते हैं उन सात पहाड़ों में से एक । वे सात पर्वत ये हैं—
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः ।
विन्ध्यश्च परियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः ॥ —अमरकोष
ये पर्वत पृथ्वी को स्थिर रखते हैं, उसे दृढ़ता प्रदान करते हैं ऐसा माना
जाता है ।
६८ टिप्पणियाँ
महेन्द्रविक्रमवर्मा के पिता सिंहविष्णुवर्मा कुलपर्वत के समान थे।
उन्होंने पर्वत सदृश समस्त राज्य को दृढ़ता, सुचारुता प्रदान की; समस्त
पृथ्वी के भार को योग्य शासक के रूप में वहन किया ।
शत्रुषद्वर्ग (पृ० २४)—
छः प्रकार के अन्तःशत्रु माने जाते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह
और मत्सर ।
महाभूत (पृ० २४)—
पञ्च महाभूत ये हैं—पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु और आकाश ।
प्रज्ञादानदयानुभावधृतयः (श्लोक ३)—
बुद्धि, उदारता, अनुकम्पा, मर्यादा, दृढ़-सङ्कल्प, दीप्ति, शिल्प
कला-ललित कला, समृद्धि, निष्ठा, पराक्रम, निष्कपटता और नम्रता
आदि—इन बारह गुणों को कलियुग में जब कहीं स्थान प्राप्त नहीं हुआ
अर्थात् कोई उचित पात्र नहीं मिला तो ये सब गुण एक साथ मिलकर
राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा की शरण में उसी प्रकार चले गए जैसे प्रलय काल
में देवता, मनुष्य, तिर्यक् (पशु-पक्षी) व स्थावर आदि सृष्टियाँ जगत् के
आदि पुरुष मूल कारण की शरण में चली जाती हैं उसी में लीन हो जाती
हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि महेन्द्रविक्रमवर्मा सर्वगुणसम्पन्न था ।
कल्पान्ते (पृ० २४)—
कल्प—सृष्टि । कल्पान्ते—सृष्टि के अन्त में अर्थात् प्रलय काल में ।
कल्प ब्रह्मा का एक दिन अथवा १००० युग । युग चार होते हैं—
सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि । सत्ययुग का परिमाण १७२८००० वर्ष;
त्रेतायुग का परिमाण १२९६००० वर्ष; द्वापर युग का परिमाण ८६४०००
वर्ष है तथा कलियुग ४३२००० वर्ष के परिमाण वाला है । इन चार युगों
का एक चतुर्युग या महायुग कहलाता है । यह (चारों युग मिलकर) देवताओं
का एक युग होता है । एक हजार महायुगों का एक दिन होता है और एक
हजार महायुगों की ही ब्रह्मा की एक रात्रि होती है—
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
—भगवद्गीता ८.१७
मत्तविलास-प्रहसन ६८
आदिपुरुष (पृ० २४)—
जगत् का मूल कारण ।
सर्गप्रभेदा (पृ० २४)
देवता, मनुष्य, तिर्यक् व स्थावर आदि सृष्टियां (सर्ग) के भेद हैं।
आकरे सूक्तिरत्नानां (श्लोक ४; पृ० २६)—
राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा अपनी राजसभा में छोटे-बड़े सभी कवियों
का समान रूप से आदर करता था। उसकी सभा-गोष्ठियों में काव्य गुणों
से पूर्ण श्रेष्ठ कोटि की कृतियों को तो आदर मिलता ही था परन्तु साथ ही
साथ साधारण कवियों की सामान्य कवितायें या सूक्तियाँ भी बहुत
सम्मानित की जाती थीं।
स्थापना (पृ० २६)—
स्थापना, आमुख और प्रस्तावना—इन तीनों शब्दों का प्रयोग एक
ही अर्थ में किया जाता है। प्रधान कथा-वस्तु का आरम्भ जहाँ से किया
जाता है वहाँ तक प्रस्तावना चलती है। इसी को स्थापना या आमुख
भी कहते हैं। आमुख का लक्षण है—
सूत्रधारो नटीं ब्रूते मार्षं वाऽथ विदूषकम् ।
स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखं प्रस्तावना वा ।
—दश० ३.७८
अर्थात् जहाँ सूत्रधार नटी, मार्ष (पारिपार्श्विक) अथवा विदूषक के
साथ बात करता हुआ विचित्र उक्तियों द्वारा कथा-वस्तु का सङ्केत करता
हुआ अपने कार्य का वर्णन करता है उसे आमुख कहते हैं।
'इति निष्क्रान्तो' तक यह प्रस्तावना चलती है।
कालिदास ने अपने तीनों नाटकों में 'प्रस्तावना' का प्रयोग किया
है, जबकि भास ने अपने सभी नाटकों में स्थापना का प्रयोग किया है और
शूद्रक ने आमुख का प्रयोग किया है। महेन्द्रविक्रमवर्मा ने भी प्रस्तुत प्रहसन
में स्थापना शब्द प्रयुक्त किया है। सम्भवतः दक्षिण भारत के नाटककारों
की 'स्थापना' शब्द का प्रयोग करने की विशेषता रही होगी।
किन्तु मत्तविलास की दूसरी हस्तलिखित प्रतिलिपि में 'आमुखम्' यह
पाठ-भेद भी उपलब्ध होता है।