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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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वाचिक अभिनय—आलाप, गीत, वार्ता आदि होते हैं; आहार्य अभिनय—वेष-
भूषा इत्यादि होते हैं; कायिक अभिनय—हस्त-पाद-नेत्र संचालन आदि और
सात्त्विक अभिनय—हर्ष, लज्जा, चिन्ता, शोकादि होते हैं ।
इन चार प्रकार के अभिनयों के द्वारा (राम, दुष्यन्त आदि) पात्रों
का अनुकरण इस कुशलता के साथ किया जाता है कि सामाजिकों को नटों
में पात्रों की ही प्रतीति होने लगती है।
भावावेशवशात् (पृ० २२)—
भाव और आवेश—ये चित्त के विकार होते हैं—
—'भावा बहुधा चित्तविक्रियाः'।
भाव अनेक प्रकार के होते हैं जैसे—रति, सत्य, भेद, भय, क्रोध, लोभ, मद,
मोद, स्नेह, भ्रम इत्यादि ।
अनेकरसताम् (पृ० २२)—
अनेक-रसता को । काव्य रस से युक्त होता है, जैसा कि साहित्य-
दर्पणकार विश्वनाथ का भी मत है—
'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' ।
काव्यप्रकाशकार मम्मट भी काव्य को नवरसों से रुचिकर मानते हैं—
'नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति' ।
कुछ आचार्य काव्य में आठ ही रसों का समावेश करते हैं । वे काव्य में शांत
रस के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं। परन्तु कुछ आचार्य काव्य में
वात्सल्य रस का भी अन्तर्भाव मानते हैं। भक्ति इत्यादि और भी रस माने
गये हैं ।
नृत्तम् (पृ० २२)—
नृत्य और नृत्त इन दोनों शब्दों में गात्र-विक्षेप (अङ्गों का चलाना)
अर्थ की समानता अवश्य है परन्तु फिर भी दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं।
नृत्य में पदार्थ का अभिनय होता है। धनञ्जय के अनुसार नृत्य भावाश्रित
होता है—'भावाश्रयं नृत्यम्' (दश० १.९) जबकि नृत्त ताल (हाथ की
ताली) और लय (द्रुत, मध्यम और विलम्बित) पर आश्रित होता है—'नृत्तं