मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः (पृ० २२)—
'नन्दयतीति नान्दी' इस व्युत्पत्ति के अनुसार देव, ब्राह्मण और
राजादिकों को आनन्दित करने वाली स्तुति 'नान्दी' कहलाती है—
आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते ।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ।। सा०द० ६.२४
विश्वनाथ आदि आचार्यों के मतानुसार नान्दी तो वास्तव में पूर्वरङ्ग
का रङ्गद्वार नामक एक अङ्ग है । इसको नान्दी न कहकर रङ्गद्वार कहना
चाहिए। यही विचार भरत मुनि का भी है। उनके कथनानुसार नान्दी तो
रङ्गद्वार के पूर्व ही कर ली जाती है। 'नान्द्यन्ते' का अर्थ है—नटकृत नान्दी
पाठ की समाप्ति के पश्चात् सूत्रधार नटमण्डलाधिपति रङ्गभूमि से निकल
जाता है और तत्पश्चात् (वेष-भूषा की दृष्टि से) उसी प्रकार का दूसरा नट
जो नटोपाध्यक्ष अथवा स्थापक कहलाता है, रङ्गशाला में प्रवेश करता है ।
अतः सूत्रधार से तात्पर्य उपाध्यक्ष नामक दूसरे नट से है, प्रधान नट जो
नान्दी पाठ करता है उससे नहीं । अतः प्रथम श्लोक कुछ आचार्यों के अनुसार
लक्षण साम्य होने से रङ्गद्वार है ।
सामान्य रूप से ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए नान्दी पाठ
होता है ।
सूत्रधार (पृ० २२)—
'सूत्रं प्रयोगानुष्ठानं धारयतीति सूत्रधारः स्थापनानामा नटः ।' अर्थात्
नाट्यसामग्री रूपी सूत्र को जो धारण करता है, वह सूत्रधार कहलाता है ।
यह सर्वप्रथम रंगभूमि में आकर कथावस्तु का बीजारोपण करता है ।
भाषावेषवपुःक्रियागुणकृतान् (श्लोक १; पृ० २२)—
अभिनय चार प्रकार के होते हैं—
१. वाचिक (भाषा) २. आहार्य (वेष) ३. कायिक (वपुःक्रिया)
और ४. सात्त्विक (गुण) ।