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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

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पृष्ठ 81

मत्तविलास-प्रहसन ६८
आदिपुरुष (पृ० २४)—
जगत् का मूल कारण ।
सर्गप्रभेदा (पृ० २४)
देवता, मनुष्य, तिर्यक् व स्थावर आदि सृष्टियां (सर्ग) के भेद हैं।
आकरे सूक्तिरत्नानां (श्लोक ४; पृ० २६)—
राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा अपनी राजसभा में छोटे-बड़े सभी कवियों
का समान रूप से आदर करता था। उसकी सभा-गोष्ठियों में काव्य गुणों
से पूर्ण श्रेष्ठ कोटि की कृतियों को तो आदर मिलता ही था परन्तु साथ ही
साथ साधारण कवियों की सामान्य कवितायें या सूक्तियाँ भी बहुत
सम्मानित की जाती थीं।
स्थापना (पृ० २६)—
स्थापना, आमुख और प्रस्तावना—इन तीनों शब्दों का प्रयोग एक
ही अर्थ में किया जाता है। प्रधान कथा-वस्तु का आरम्भ जहाँ से किया
जाता है वहाँ तक प्रस्तावना चलती है। इसी को स्थापना या आमुख
भी कहते हैं। आमुख का लक्षण है—
सूत्रधारो नटीं ब्रूते मार्षं वाऽथ विदूषकम् ।
स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखं प्रस्तावना वा ।
—दश० ३.७८
अर्थात् जहाँ सूत्रधार नटी, मार्ष (पारिपार्श्विक) अथवा विदूषक के
साथ बात करता हुआ विचित्र उक्तियों द्वारा कथा-वस्तु का सङ्केत करता
हुआ अपने कार्य का वर्णन करता है उसे आमुख कहते हैं।
'इति निष्क्रान्तो' तक यह प्रस्तावना चलती है।
कालिदास ने अपने तीनों नाटकों में 'प्रस्तावना' का प्रयोग किया
है, जबकि भास ने अपने सभी नाटकों में स्थापना का प्रयोग किया है और
शूद्रक ने आमुख का प्रयोग किया है। महेन्द्रविक्रमवर्मा ने भी प्रस्तुत प्रहसन
में स्थापना शब्द प्रयुक्त किया है। सम्भवतः दक्षिण भारत के नाटककारों
की 'स्थापना' शब्द का प्रयोग करने की विशेषता रही होगी।
किन्तु मत्तविलास की दूसरी हस्तलिखित प्रतिलिपि में 'आमुखम्' यह
पाठ-भेद भी उपलब्ध होता है।