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सर्वकोश
मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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६८ टिप्पणियाँ
महेन्द्रविक्रमवर्मा के पिता सिंहविष्णुवर्मा कुलपर्वत के समान थे।
उन्होंने पर्वत सदृश समस्त राज्य को दृढ़ता, सुचारुता प्रदान की; समस्त
पृथ्वी के भार को योग्य शासक के रूप में वहन किया ।
शत्रुषद्वर्ग (पृ० २४)—
छः प्रकार के अन्तःशत्रु माने जाते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह
और मत्सर ।
महाभूत (पृ० २४)—
पञ्च महाभूत ये हैं—पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु और आकाश ।
प्रज्ञादानदयानुभावधृतयः (श्लोक ३)—
बुद्धि, उदारता, अनुकम्पा, मर्यादा, दृढ़-सङ्कल्प, दीप्ति, शिल्प
कला-ललित कला, समृद्धि, निष्ठा, पराक्रम, निष्कपटता और नम्रता
आदि—इन बारह गुणों को कलियुग में जब कहीं स्थान प्राप्त नहीं हुआ
अर्थात् कोई उचित पात्र नहीं मिला तो ये सब गुण एक साथ मिलकर
राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा की शरण में उसी प्रकार चले गए जैसे प्रलय काल
में देवता, मनुष्य, तिर्यक् (पशु-पक्षी) व स्थावर आदि सृष्टियाँ जगत् के
आदि पुरुष मूल कारण की शरण में चली जाती हैं उसी में लीन हो जाती
हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि महेन्द्रविक्रमवर्मा सर्वगुणसम्पन्न था ।
कल्पान्ते (पृ० २४)—
कल्प—सृष्टि । कल्पान्ते—सृष्टि के अन्त में अर्थात् प्रलय काल में ।
कल्प ब्रह्मा का एक दिन अथवा १००० युग । युग चार होते हैं—
सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि । सत्ययुग का परिमाण १७२८००० वर्ष;
त्रेतायुग का परिमाण १२९६००० वर्ष; द्वापर युग का परिमाण ८६४०००
वर्ष है तथा कलियुग ४३२००० वर्ष के परिमाण वाला है । इन चार युगों
का एक चतुर्युग या महायुग कहलाता है । यह (चारों युग मिलकर) देवताओं
का एक युग होता है । एक हजार महायुगों का एक दिन होता है और एक
हजार महायुगों की ही ब्रह्मा की एक रात्रि होती है—
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
—भगवद्गीता ८.१७