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सर्वकोश
मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

हिन्दी अनुवाद ६३
पाशुपत — सौभाग्यवश आपकी उन्नति हो रही है ।
कपाली — उन्नति तो आपकी ही है ।
पाशुपत-(स्वगत) यह सत्य है—(कि) निर्दोष को भय नहीं होता
है, जो आज यह भिक्षु बाघ के मुख से बच गया । (प्रकट) तो मैं
इसी समय मित्र के अभ्युदयजन्य आनन्द को ही सामने रखकर सर्वप्रथम
भगवान् (महादेव) की संध्याकालीन अर्चना करने जाता हूँ । और आज
से यह—
तुम दोनों का किरात और अर्जुंन के समान पूर्वसम्बद्ध विरोध सदैव
आपस में प्रेमवर्धक होवे ॥२२॥
(पाशुपत निकल जाता है)
कपाली—अरे नागसेन ! क्योंकि मैंने अपराध किया है, इसलिए
(अब) तुमको प्रसन्न हृदय (देखना) चाहता हूँ ।
शाक्यभिक्षु—क्या ये भी प्रार्थनीय है ? तुम्हारा क्या उपकार करूँ ?
कपाली—यदि भगवान् (आप) मुझसे प्रसन्न हैं तो इससे अधिक क्या
इच्छा करूँ ?
शाक्यभिक्षु–तो मैं जाता हूँ ।
कपाली-पुनर्दर्शन के लिए आप जाएं ।
शाक्यभिक्षु–ठीक है। (निकल जाता है )
कपाली-प्रिये देवसोमा ! चलो चलें ।
(भरतवाक्य)
अग्नि, विधिपूर्वक हवन की गई आहुति को सदैव प्रजा के ऐश्वर्य
के लिए वहन करे। ब्राह्मण लोग वेद पढ़ें, कामधेनु की पुत्रियाँ (गायें)
अत्यधिक दूध देने वाली होवें, और यह संसार भी अपने धर्मों में लगा हुआ,
जब तक चन्द्रमा और तारे हैं (तब तक) विपत्ति रहित हो (और) शक्ति
से जिसने शत्रुओं को शान्त कर दिया है ऐसे शत्रु मल्ल (नाम के राजा) से
सनाथ होवे ॥२३॥
(निकल जाते हैं)
॥ मत्तविलास प्रहसन समाप्त ॥