मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमत्तविलास-प्रहसन ६७
ताललयाश्रम्' (दश० १.१०) । नन्दिकेश्वर के मतानुसार नृत्त में भावाभिनय
नहीं होता है—
'भावाभिनयहीनं तु नृत्तमित्यभिधीयते' । —अभिनयदर्पण १५
नृत्त सुकुमार प्रयोग है—इसका जन्म शृङ्गार रस से होता है । महोत्सव तथा
प्रिया-समागम के समय इसका आयोजन विहित है । उसमें कथानक बिल्कुल
नहीं होता है । पुनः नृत्य और नृत्त मधुर और उद्धत भेद से लास्य और ताण्डव
रूप में दो प्रकार के होते हैं ।
नृत्य और नृत्त का विवेचन सङ्गीतशास्त्र के ग्रन्थों में द्रष्टव्य है ।
निष्प्रतिबद्धबोधमहिमा (पृ० २२)—
'निष्प्रतिबद्धः बोधस्य महिमा यस्य सः' । अर्थात् जिसके ज्ञान की महिमा
अकुण्ठित है; जो अनिन्दनीय ज्ञान वाला है; जो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी है।
कपाली—
यहाँ कपाली एक ओर शिव के लिए प्रयुक्त हुआ है और दूसरी ओर
प्रस्तुत प्रहसन के मुख्य नायक सत्यसोम की ओर भी सङ्केत करता है ।
चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभरमत्तविलासप्पहणं (पृ०.२२)—
यहाँ नटी 'मत्तविलासप्रहसन' की ओर प्रत्यक्ष सङ्केत नहीं कर रही
है, अपितु सूत्रधार को वृद्धावस्था में छोटी पत्नी के साथ रमण करने के कारण
उलाहना दे रही है कि 'यौवन के गुणों से भरे हुए मतवालों के विलास को
दिखाने आए हो ?' सूत्रधार बहुत दिनों तक अपनी छोटी पत्नी के साथ
रमण करता रहा जिससे कि बड़ी पत्नी (नटी) रुठ गई थी ।
कुलपर्वत (पृ० २४)—
मुख्य पहाड़, जो इस महाद्वीप के प्रत्येक खण्ड में विद्यमान माने
जाते हैं उन सात पहाड़ों में से एक । वे सात पर्वत ये हैं—
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः ।
विन्ध्यश्च परियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः ॥ —अमरकोष
ये पर्वत पृथ्वी को स्थिर रखते हैं, उसे दृढ़ता प्रदान करते हैं ऐसा माना
जाता है ।