सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

२८ प्रस्तावना
“न नंहसा मूर्द्धिणो वा न च देवाञ्जनस्रजः ।
कुबेरस्य यथोष्णीषं किं मां समुपसर्पंथ” ॥
“इति प्राचीनः पाठो देवबोधादिभिर्व्याख्यातत्वात्” । कहीं-कहीं
इनके द्वारा इङ्गित किये गये ये पाठ तत्तत् टीकाओं में सम्प्रति प्राप्त
नहीं होते और इन्हें देखते हुए विद्वानों की यह भी धारणा है कि मात्र
सम्मान-प्रदर्शन हेतु तो ऐसा नहीं हुआ है ? साथ ही देवबोध को ये
‘प्राचीन’ कहते हैं और ऐसा तभी सम्भव प्रतीत होता है जब इनके
तथा देवबोध के बीच कम से कम चार या पाँच शताब्दियों का अन्तर
काल की दृष्टि से रहा हो । देवबोध की ओर निर्देश आगे भी है—
“मधुपर्किकाः मधुपर्क-समये पठन्त इति देवबोधः” । इसी प्रकार दूसरे
व्याख्याकार अर्जुन मिश्र को उद्धृत करते हुए ये कहते हैं—“जारूथ्यान्
त्रिगुणदक्षिणान् इत्यर्जुन मिश्रः ।” किन्हीं-किन्हीं पाण्डुलिपियों की ओर
सङ्केत ‘क्वचित्पुस्तके’ लिखकर किया गया है—“अत्र यत्तद्देवा
ददुरित्यादिना त्रिपथगां नदीमित्यन्तों नारायणोपाख्यानग्रन्थोऽध्याय-
द्वयात्मकः क्वचित्पुस्तके पठ्यते” । अर्जुन मिश्र ने भी देवबोध को उद्धृत
किया है और इससे हम इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँच सकते हैं कि
काल की दृष्टि से इन टीकाकारों में यह क्रम बनता है—देवबोध, अर्जुन
मिश्र, नीलकण्ठ । कहीं-कहीं नीलकण्ठ द्वारा विचित्र रूप में भी व्याख्याएँ
प्रस्तुत हुई हैं' ।
नीलकण्ठ ने इस टीका के अतिरिक्त गणेशगीता पर भी टीका
लिखी थी । मन्त्ररामायण के अतिरिक्त इनका मन्त्रभागवत नामक
ग्रन्थ भी अति प्रसिद्ध है, जिसमें भागवत की कथा से सम्बद्ध मन्त्र
ऋग्वेद से इस प्रकार क्रमबद्ध रूप से संगृहीत हैं, जिनसे सम्पूर्ण भागवत
की कथा प्रस्तुत हो जाती है और इसके ऊपर इन्होंने अपने सिद्धान्ता-
नुसार इन मन्त्रों से भागवत की कथा निःसृत करने हेतु अपनी व्याख्या
लिखी है । इनके पुत्र का भी नाम गोविन्द था, जिनके पुत्र (अर्थात्
नीलकण्ठ के पौत्र ) शिव ने पैठण में निवास करते हुए 'धर्मतत्त्व-प्रकाश'
नामक ग्रन्थ की रचना १७४६ ई० में की थी । नीलकण्ठ की ‘शिव-
ताण्डव-टीका’ का रचनाकाल १६८० ई० तथा ‘गणेशगीता' की टीका
का रचनाकाल १६६३ ई० है । ‘भारत-भाव प्रदीप’ के नाना हस्तलेखों
१. वहीं,पृष्ठ ६५-६७ ।

प्रस्तावना २६
का समय १६८७ ई० से लेकर १६६५ ई० है, अतः इनका समय १६५०
ई०-१७०० ई० मानना उचित प्रतीत होता है¹।
जैसा ऊपर कहा जा चुका है, मन्त्ररामायण में नीलकण्ठ ने ऋग्वेद
के मन्त्रों को देते हुए उनसे पूरी रामकथा अथवा रामायण कथा को
निकाला है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पूरी रामकथा
इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान हैं। इन मन्त्रों का सङ्कलन भी इन्होंने
स्वयं किया है और उनसे सम्पूर्ण रामकथा को व्यक्त करनेवाली 'मन्त्र-
रहस्य-प्रकाशिका' नामक व्याख्या लिखी है, जैसा कि इस व्याख्या के
अन्त में वे स्वयं कहते हैं— “इति श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणमर्यादाधुरन्धर-
चतुर्धरवंशावतंस-गोविन्दसूरिसूनोः श्रीनीलकण्ठस्य कृति स्वोद्धृतमन्त्र-
रामायणव्याख्या मन्त्ररहस्यप्रकाशिकाख्या समाप्तिगमत्” । इस प्रकार
से इन वैदिक मन्त्रों पर इनके द्वारा प्रस्तुत इस व्याख्या का नाम
'मन्त्ररहस्यप्रकाशिका' है। इस प्रकार मन्त्रों के सङ्कलन तथा उन पर
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक की
समस्त कथा को इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान प्रदर्शित किया है। ये
मन्त्र १५७ हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत व्याख्या-स्थलों के कुछ अंशों का
सारांश इस प्रकार—
मन्त्र ७ की व्याख्या यह प्रकट करती है कि वाल्मीकि रामायण
आर्ष काव्य है। महर्षि वाल्मीकि ने वेदों के छन्दों को अनुष्टुप् छन्द में
समन्वित करते हुए प्रायः समस्त रामायण की रचना की है। इसमें वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण माना गया है— अधिकं समस्वरन् श्रुतिं
दिव्यां दृष्टिं वा प्राप्य रम्यं काव्यं कृतवन्त इत्यर्थः । अर्थात् श्रुति के
अनुसार अथवा दिव्य दृष्टि को प्राप्त करके श्री वाल्मीकि के द्वारा रम्य
(रामायण) काव्य की रचना हुई। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण मानकर जिसकी (रामायण की) रचना की
तथा शोक व्यक्त किया ( 'मा निषाद••••' इत्यादि के द्वारा ), एवं श्रुति
अथवा नारदोपदिष्ट महापुरुष ( श्रीराम ) का उन ऋचाओं के अनुरूप
अनुष्टुप् छन्द द्वारा ही संस्मरण कर वर्णन किया, वही श्लोक-रूप से
१. द्रष्टव्य, बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास,
पृष्ठ ७० ।

३० प्रस्तावना
रामायण कहा गया है । यहाँ अनुशरण, शोक और स्मरण, ये तीन
वाल्मीकि रामायण के श्लोकों के श्रुतिमूलक कारण हैं ।
रभसस्येत्यादि मन्त्र में 'दुष्कृत' यह अन्तिम पद है । इसमें बत्तीस
वर्ण हैं । कार्यहानि को देखकर इस मन्त्र के द्वारा शोक व्यक्त है और
शोक के कारण को शाप-रूप प्रतिफल प्राप्त हुआ है । इस मन्त्र का भाव
ही 'मा निषाद.....' इत्यादि श्लोक में व्यक्त हुआ है । यह श्लोक अनुष्टुप्
छन्द में है। इस छन्द में गायत्री और पंक्ति ये दो छन्द सन्निविष्ट हैं।
जगती छन्द के भी आ जाने से यहाँ अनुष्टुप् छन्द ही लिया जायेगा ।
अथवा अनुष्टुप्, त्रिष्टुप् तथा जगती छन्दों के प्रति पादों का सन्निवेश
अनुष्टुप् छन्द में ही हुआ है। अतः सभी छन्दों का मूल अनुष्टुप् छन्द
हुआ। इसी छन्द को प्राचेतस् ऋषि वाल्मीकि ने आदि-काव्य का
आधार बनाकर वेदमूलक रामायण की रचना की है ।
मन्त्र संख्या १० द्वारा यह व्यक्त किया गया है कि वेद का परम
तत्त्व 'ऋत' एवं सत्य है । वाल्मीकि ने रामकथा के रूप में ऋत एवं
सत्य तत्त्व को प्रतिष्ठित करते हुए अनृत एवं असत् तत्त्वों की निन्दा
प्रस्तुत की है । रामायण या रामकथा परम तत्त्व को प्राप्त कराने में
तन्तुरूप से कार्य करती है । विष्णु की स्तुति के लिये प्रयुक्त शब्द (वायु
रूप ) कवियों के जिह्वाग्र में स्थित भोग और मोक्षसाधिका विष्णु की
माया के द्वारा रामकथा के रूप में अत्यन्त विस्तृत है । इस मन्त्र में
'वरुणस्य' के तात्पर्य वरुणपुत्र प्राचेतस् नाम से अभिहित वाल्मीकि ही
हैं। 'धीर' शब्द से भी इन्हीं वाल्मीकि का अभिधान किया गया है।
अतः उन्होंने समग्र रूप से रामकथा का वर्णन किया है।
इसी प्रकार मन्त्र संख्या ३३ को सीता का स्तुति विषयक सिद्ध
किया गया है। 'सीता' शब्द की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए नीलकण्ठ
कहते हैं— "स्यति सर्वेषां रक्षसामन्तं करोतीति सीता", अर्थात् जो
सभी राक्षसों का नाश कर दे वह सीता है। वे आगे कहते हैं— ऐसी
सीता हमारे ऐश्वर्य को बढ़ाती हुई प्रतिपक्ष (अशुभ कर्मों) का नाश
करें ।
मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करके कहते
हैं— "नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति इति न्यायेन त्वयि

प्रस्तावना ३१
वेदार्थानभिज्ञे सति न रामायणमपराद्ध्यति"१ ।
इस प्रकार मन्त्ररामायण के कर्त्ता ने सम्पूर्ण रामकथा तथा इसके
पात्रों का निदर्शन वैदिक वाङ्मय से कराया है ।
इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में रामरक्षास्तोत्र उद्धृत है और उसकी
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थ के प्रयोजन को रामकथा का वेदमूलकत्व
सिद्ध करना ही अभिहित किया गया है । "इसके प्रारम्भ में रामायण के
गायत्री-स्वरूप का उल्लेख है । गायत्रीरामायण, विद्यारण्य कृत
रामायण रहस्य, तत्त्वसंग्रहरामायण, गोविन्दराज-कृत भूषणटीका आदि
रामायण के गायत्री-स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । तर्क यह है कि
रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला
अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है—
‘प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।’
किन्तु वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह
का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता । विद्यारण्य ने वाल्मीकि
रामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्री-स्वरूप कहा है—
“गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम्”२ ।
नीलकण्ठ द्वारा रचित इस ग्रन्थ के विद्वान् सम्पादक डा० राम
कुमार राय हैं। उन्होंने प्रत्येक वैदिक मन्त्र के सन्दर्भ दे दिये हैं, साथ ही
मन्त्ररहस्य-प्रकाशिका व्याख्या के अनुसार उन मन्त्रों का हिन्दी अनु-
वाद भी प्रस्तुत कर दिया है । इससे यह ग्रन्थ अत्यन्त बोधगम्य बन
गया है । मन्त्ररामायण का संस्करण आज से बहुत पहले श्री वेङ्कटेश्वर
स्टीम प्रेस, बम्बई, से मुद्रित हुआ था और यह कार्य इतना पहले हुआ
था कि इसकी प्रतियाँ अत्यन्त दुर्लभ हो गयीं थी तथा विद्वद्वर्ग इसे भूल
सा गया था कि आज से कई शताब्दी पूर्व नीलकण्ठ ने रामकथा अथवा
रामायण की वेदमूलकता प्रतिपादित करने का श्लाघनीय प्रयत्न किया
था । प्रस्तुत संस्करण इस कमी को हटाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका
अदा करेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है ।
आशा है मन्त्ररामायण का यह संस्करण विद्वानों द्वारा आहत होगा ।
वाराणसी, ७ जनवरी १६८८ लक्ष्मीनारायण तिवारी
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ ६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १७४-१७५ ।

इस पृष्ठ पर मुद्रित पाठ अत्यधिक फीका, धुंधला और कंट्रास्ट की कमी (washed out / illegible) के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है (संभवतः यह पिछले पृष्ठ की केवल हल्की छाप या अत्यधिक ओवर-एक्सपोज़्ड स्कैन है)।

पाठ के अक्षर और पंक्तियाँ अपठनीय होने के कारण इसका प्रामाणिक और शुद्ध देवनागरी लिप्यंतरण (transcription) संभव नहीं है। कृपया बेहतर रिज़ॉल्यूशन अथवा स्पष्ट कंट्रास्ट वाली प्रतिलिपि (image) उपलब्ध कराएं।

॥ श्रीः ॥
श्रीजानकीवल्लभो जयतितराम्।
अथ मन्त्ररामायणम्
सटीकम् ।
रामायणद्रुमं नौमि रामरक्षानवांकुरम् ।
गायत्रीबीजमाम्नायमूलं मोक्षमहाफलम् ॥१॥
राम रक्षा रूपी नवीन अंकुर वाले, गायत्री बीज वाले, वेदरूपी
मूलवाले और मोक्ष रूपी महान फलवाले रामायण रूपी वृक्ष को मैं
नमस्कार करता हूं ।
ऐसा कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में चौबीस
सहस्र श्लोक गायत्रीमंत्र के २४ अक्षरों के आधार पर संगृहीत किये
हैं । रामायण के वेदत्व के विषय में अगस्त्य संहिता आदि प्रमाण हैं ।
गायत्री मंत्र में सविता देवता की स्तुति की गयी है । सविता को भग-
वान् नारायण की ज्योति भी कहा जाता है । भगवान के नानारूपो
में अवतार लेकर क्रीडा करने वाले रामादि रूपों की रामायण में
उपासना की गयी है और यह आवागमन से रहित कैवल्य की ओर
ले जाने वाला है ।
अत्र रामरक्षायाः रामायणद्रुमांकुरत्वं स्पष्टमवगम्यते, तत्स्थानां राघवा-
दिपदानां क्रमेण रामायणार्थसूचकत्वात् तस्याः गायत्रीबीजत्वं वेदमूलत्वं चोप-
पादनीयम् तेन रामायणस्यापि तदुभयं सिद्धयति । अत एव रामायणे चतुर्विंश-
त्साहस्र्यां चतुर्विंशतिगायत्र्यक्षराणि वाल्मीकिना संगृहीतानीत्यभियुक्तप्रसिद्धं

२ मन्त्ररामायण
संगच्छते । तथा रामायणस्य वेदत्वोक्त्या प्रत्यक्षवेदमूलतत्त्वोपपादकम् 'वेदवेद्ये-
परे पुंसिजाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत्साक्षाद्रामायणात्मना ॥
तस्माद्रामायणं देवि वेद एव न संशयः” इत्यगस्त्यसंहितावचनम् “स तु मेधा-
विनो दृष्ट्वा वेदार्थपरिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥ काव्यं
रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्” इति तस्य वेदोपबृंहणप्रयोजनकत्वं
प्रतिपादयदार्षं वचनं च संगच्छते । तत्र गायत्र्यर्थस्तावत्सवितुः ब्रह्माण्डवृक्ष-
प्रसवभूमेः तत् प्रसवितृरूपं भूर्स्थानीयं वरेण्यं वरणीयं मोक्षकामैर्ब्रह्माण्डवृक्ष-
प्रविलापनेनानुसर्तव्यम् एवं च “तदिति वा एतस्यमहतो भूतस्य नाम भवति”
इति श्रुतेस्तत्पदोदिते ब्रह्मणि सवितृपदेन कार्यमात्रमध्यारोप्य वरेण्यपदेन तदपोद्य
निष्प्रपञ्चं ब्रह्मणः पारमार्थिकं रूपं निरूपितं तथा तस्यैव सवितुर्भर्गः अभिर्गति-
रस्येति व्युत्पत्त्या सूर्यमण्डलान्तःस्थं नारायणाख्यं ज्योतिः “य एषोन्तरादित्ये
हिरण्मयः पुरुषः” इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं मायाविक्षेपमुपास्यं निर्दिष्टं धीमहीत्य-
नेनान्वयात् तथा देवस्येति तस्यैव ब्रह्माण्डान्तर्नानावतारैः क्रीडतो रामकृष्णादि-
रूपं तृतीयं रूपमुक्तं तथा धीमहीति विरोधपूर्वकं स्वार्थमुभयार्थमीश्वरार्थं चेति
चतुर्द्धा भजनं दर्शितं तथा तृतीयपादे बहिर्मुखस्वभावायाबुद्धेः अन्तर्मुखतया
प्रकर्षेण प्रेरणे प्रत्यगात्मप्रधाने कैवल्यरूपेपदस्य हेतुत्वप्रदर्शनेन तस्यैव सकलकर्मो-
पास्तिफलप्रयोजकत्वमुक्तम् एवं च गायत्र्यां काण्डत्रयं दर्शितं तथा च मैत्रायणी-
श्रुतिः— “तत्सचितुर्वरेण्यमित्यसौ वा आदित्यः सविता स वा एवं प्रवरणीय
आत्मकामेनेत्याहुर्ब्रह्मवादिनः” इति । भर्गोदेवस्य धीमहीति सविता वै देवस्त-
तोयोस्य भर्गस्तं चिन्तयामीत्याहुर्ब्रह्मवादिन इति । धियो योनः प्रचोदयादिति
बुद्धयो वै धियस्ता योस्माकं प्रचोदयादित्याहुर्ब्रह्मवादिन.” इति अत्रात्मकामेन
प्रवरणीय इति सवितुः प्रत्यगात्मत्वं ज्ञानकाण्डार्थ उक्तः चिन्तयामीति चिन्ता-
योग्यत्वमुपासनाकाण्डार्थ उक्तः । धिय इत्यनेकाकारधीप्रेरकत्वं कर्मकाण्डार्थ उक्तः
तत्राद्य उपेयः परो सन्निकृष्टविप्रकृष्टौ तत्प्राप्त्युपायौ । एवं वेदमातुर्गायत्र्याः
काण्डत्रयात्मकत्वेन तज्जानां वेदानां तन्मूलकानां रामायणादीनां च तथात्वं
ज्ञेयम् एत एवार्था राघवादिविशतिनामभी रामरक्षायामक्षरार्थद्वारा प्रदर्श्यन्ते ।
तथाहि :—
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ।
कौशल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ॥ १ ॥
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ॥ २ ॥

मन्त्ररामायण ३

मेरे शिर की रक्षा राघव करें, मस्तक की रक्षा दशरथपुत्र करें।
कौशल्यापुत्र मेरे नेत्रों की रक्षा करें। विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानो
की रक्षा करें। यज्ञ के रक्षक मेरी नासिका की रक्षा करें। मुख की
रक्षा सौमित्रिवत्सल करें। जिह्वा की रक्षा विद्यानिधि करें, तथा भरत
से पूजित (राम) मेरे कण्ठ की रक्षा करें।

रंघति नाशं गच्छतीति रघुः व्यष्टिसमष्टिरूपो अन्नमयःकोशःतत्र विदितो
राघवःब्रह्माण्डाभिमानी मम ब्रह्माण्डरूपं शिरः पातु १ स एव दशरथस्य दशभि-
रिन्द्रियाश्वैर्य्युक्तस्य मनोमयकोशरूपस्य आत्मैवात्मा कार्यं प्राणमयः कोशस्तज्जः
तेन अन्नमयादान्तरः प्राणमयः ततोप्यान्तरो मनोमय इति पूर्वयोः प्रविलापनं
सिद्धम्, स च वासनातन्तुसन्तानात्मा मनोमयः ब्रह्माण्डासृष्टिकमेणार्वाचीनं
भालदेशं ब्रह्मलिपिस्यानं मे पातु २ कुशलैव कौशल्या स्वार्थे ष्यञ् सर्वाथाविद्योतन-
समर्थाबुद्धिस्तस्यां भवः कौसल्येयो विज्ञानमयः ततोप्यान्तरः स मम दर्शनसाधने
दृशी पातु एतेन मनोमयस्याप्यपवाद उक्तः ३ । विश्वस्य मित्रं निरुपाधिप्रेम-
गोचरतया प्रेयान् आनन्दमयाख्य आत्मैव विश्वामित्रः तस्यापि प्रियः 'सुषुप्तोसता
सौम्यतदासम्पन्नो भवति' इतिश्रुतेः प्राप्तः सन्नात्यन्तिकदुःखनिवृत्तिकरस्तदधिष्ठान-
भूत आनन्दः पुच्छंब्रह्मापरपर्यायो मम श्रुती स्वाधिगमद्वारभूते पातु तदेवं प्रथमेन
पादेन रामे ब्रह्माण्डमारोप्य अन्यपादनत्रयेणापोह्य च रामस्य शुद्धं रूपं गायत्री-
प्रथमपादोक्तं दर्शितम् अयं चार्थः कृत्स्नोपि वेदान्त प्रसिद्ध इति मूलवाक्यानि
नोदाहृतानि ४। यज्ञत्राता अव्यभिचारेण ऋतुफलप्रदः फलमतउपपत्तेः इति
न्यायादिति भावः । स मे ऋतुफलभूतदिव्यगन्धरसानुपलब्धिकरणं घ्राणरसना-
दिकं पातु ५ सौमित्रिवत्सलः सुष्ठु मित्रं जीवपक्षिणः सखा ईश्वरः तस्यापत्यं
सौमित्रिर्हिरण्यगर्भः तत्र वत्सलः तेन तत्तादात्म्यं प्राप्तानामुपासकानां अनुग्रह-
कर्तेत्युक्तम् सौमित्रेर्मुख्यकार्यत्वात्तद्वत्सलो मे मुखं पातु ६ । तावेतापन्तर्यामिसूत्रा-
त्मानौ विद्यैकलभ्यौ न तु शुष्कतर्कगम्यौ इति विद्यावाप्तिद्वारभूतां मम जिह्वां
विद्यानिधिः विद्यासम्प्रदायप्रवर्त्तकः पातु ७ । विद्यापि यज्ञाद्यपूर्वप्राप्या "विधि-
द्विषन्ति यज्ञेन" इत्यादिश्रुतेः "अतो भरतैः कर्मठैर्वन्दितः शरणीकृतः भरन्ति-
कर्मफलं सञ्चिन्वन्ति ते भरताः यजमानाः भरतमुद्धर' इति मन्त्रलिंङ्गात् यज्ञश्च
कण्ठस्थ्यैरेव मन्त्रैः स्तोत्रशस्त्रादिभिर्निर्वर्त्यत इति यज्ञप्रियो मे मन्त्रोच्चारणस्थानं
कण्ठं पातु तदेवं यज्ञादिजन्येन पुण्येन प्राप्तोपासनामार्गः मगृह्यं सूत्रमीशं वा
क्रममुक्तिद्वारं प्राप्नोतीति श्लोकद्वयतात्पर्यम् ॥८॥१-२॥

स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेश कार्मुकः !

"हनुमत्प्रभुः"!
It must say "हनुमत्प्रभुः मे सक्थिनी अङ्कदेशं पातु"!
Yes! It is "हनुमत्प्रभुः मे सक्थिनी"!

Let's check line 23:
"तस्यैव चतुर्द्धा भजनमाह मध्यमिवित।" -> wait, is it "मध्यमिति ।"?
Look at the characters:
म (ma)
ध्य (dhya)
मि (mi)
ति (ti)
It's clearly "मध्यमिति ।"! (The dot inside is just text).

Let's check line 7:
"मानुषभावेऽपि ऐश्वरदिव्यायुधानां शाङ्गादीनां धारित्वादिव्यायुध आयुध-"
Wait, is it "शार्ङ्गादीनां"?
Look above the 'शा': there is a repha 'र्'!
Yes, there is a distinct curved hook above शा: "शार्ङ्गादीनां"!
And after 'धारित्वा': is it 'द्दिव्यायुध' or 'दिव्यायुध'?
It looks like "धारित्वाद्दिव्यायुध" or "धारित्वादिव्यायुध"?
There is a single 'द' with 'ि': "धारित्वादिव्यायुध".

Let's check line 8:
"निधानस्थानभूतो स्कन्धौ मे पातु ९। तथा भुजबलेनैव भग्नेशकार्मु

मन्त्ररामायण ५
देवस्य चतुर्विधं ध्यानं चतुर्विधभक्तकृतं चतुर्थश्लोकेन दर्शितम् ॥ ४ ॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ५ ॥
घुटने की रक्षा समुद्र पर सेतु का निर्माण करने वाले करें । जंघाओं
की रक्षा दशमुख का वध करने वाले करें । पैरों की रक्षा विभीषण
को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले करें और मेरे सम्पूर्ण शरीर की रक्षा
श्रीराम करें ।
अथ व्यष्टिपरीत्या नैनाव्यक्तावलम्बनाया गतेः संसारसमुद्रसेतुरूपायः प्रदाता
सेतुकृत् जानुनी शिशोः प्रथमगतिसाधने मे पातु अनेन स्थूलदेहातिक्रम उक्तः
अस्यामवस्थायां ध्यायी विदेह इत्युच्यते १७ । तथा दश इन्द्रियाणि मुखानि
भोगद्वाराणि यस्य स दशमुखो लिङ्गात्मा तस्यान्तको नाशकः प्रविलापयिता
दशमुखान्तकः ईषद्वद्धोर्द्धगस्य शिशोः मन्दोर्ध्वगतिसाधने जंघे मे पातु, एतेन लिंग-
देहातिक्रम उक्तः अस्यामवस्थायां ध्यायी प्रकृतिलय इत्युच्यते १८ । तथा विगतं
भीषणं भयङ्करमज्ञानं यस्य स विभीषणो निरस्ताविद्यः तस्मै श्रीः 'एषास्य परमा
सम्पत्' । इति श्रुतिप्रसिद्ध आनन्दः तस्याः प्रदाता विभीषणश्रीदो निघृष्टतलतया
शीघ्रगतिहेतू पादौ मे पातु, एतेनानर्थनिवृत्तिपूर्विका आनन्दावाप्तिरुक्ता, अस्या-
मवस्थायां ध्यायी मुक्त इत्युच्यते १९ । रामः सर्वेश्वरतया ब्रह्माण्डमण्डपे रमणशीलो
मम जीवन्मुक्तभावं कामयमानस्य अखिलं वपुस्त्रिविधमपि शरीरं पातु समस्तयोग-
प्रतिपक्षनिरासेन ब्रह्मसाक्षात्कारक्षमं करोत्वित्यर्थः २० । तदेवं ब्रह्मणि राघवपदेना-
ध्यारोपितस्य प्रपञ्चस्य दंशरथात्मजादिपदत्रयेणापादितस्याधिष्ठानं प्राप्तुं ध्याना-
लम्बभूतं भगवतः समष्टिरूपं व्यष्टिरूपं च द्वाभ्यां श्लोकाभ्यां प्रदर्श्य व्यष्ट्युपासनां
चतुर्थेन समष्ट्युपासनां पञ्चमार्थेन च प्रदर्श्य शेषेणानर्थनिवृत्त्यानन्दावाप्ती
जीवन्मुक्तिसहिते निरूपिते इति अर्थश्च कृत्स्नः शास्त्रार्थोस्तीति प्रदर्शनेन रामायण-
द्रुमांकुरस्य रामकवचस्य गायत्रीबीजत्वमुपपादितम् । यथात्र कथांशः स्पष्टं
सूच्यते अध्यात्मांशस्तु परोक्षवृत्त्या गम्यते, एवं रामायणे तन्मूलभूते वेदे च तदुभयं
ज्ञेयम् ॥ ५ ॥
तथा हि :—"मन्त्रह्रदात्कथाकुल्या विद्याकेदारमागता ॥ मोक्ष (रस) स्य
च प्रसूर्मध्ये पीयते कर्ममार्गगैः ॥१॥ इदमाम्नायते—"तुग्रो (ह) भुज्युमश्विनोदमेघे
रयिन्न कश्चिन्ममृवां अवाहाः ॥ तमूहथुनौंभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोद-
काभिः ॥ १ ॥ तुग्रो नाम कश्चिद्राजा भुज्युसंज्ञं स्वपुत्रम् उदमेघे समुद्रे अवाहाः
प्रापितवान् । तत्र दृष्टान्तः—रयिं न कश्चिन्ममृवानिति । यथा कश्चिन्मृतः पुरुषो

रयिं धनं तद्वत् । न शब्दोऽत्र उपमार्थे तं तथाभूतं मां अश्विनौ युवां नौभिः
वह्नीभिर्नौकाभिः उसैन्धम् ऊहथुः तीरं प्रापयामासथुः । कीदृशीभिः- आत्मन्वतीभिः,
आत्मा स्वामी विद्यते यासां ताभिः स्वीयाभिः अन्तरिक्षे गगनतुल्येऽर्णवे प्लवन्ते
ताभिरन्तरिक्षप्रुद्भिः, अपोदकाभिरपगतजलाभिः इत्यश्विदेवत्यैकर्मणि विनि-
युक्तस्यास्य मन्त्रस्य याज्ञिकाभिमतोऽर्थः कर्मसमृद्ध्यर्थः “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं
यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रियमाणमृगभिवदति” इति ब्राह्मणाच्च । तत्कर्मारेवमेवायं
व्याख्येयः । तथा “ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः ।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति यइत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥” इति मन्त्रेण सर्वासा-
मृचां सर्वेन्द्रियदेवताधिष्ठानभूतपरमव्योमशब्दितान्तःकरण

मन्त्ररामायण ७
व्यवस्थाया आवश्यकत्वाच्चान्यदेवतयो मंत्रो रामकथां प्रकाशयितुमीष्टे । अथ
हठात्तत्परत्वं वर्ण्यते तर्हि एकस्य शब्दस्यानेकार्थता स्यात् सा चानिष्टेति चेत् ।
उच्यते यथा एकैव रेखा स्थानभेदात् एकदशशतसहस्रादिव्यपदेशान् लभते
एवमेकमेव पदं वाक्यं वा पदान्तरवाक्यान्तरसमभिव्याहारादनेकमर्थं प्रत्याययति
न च तावतानानार्थत्वं शब्दस्य संभवति, अपि तु वृत्तिभेद एव तथाहि
एकमप्यमृतपदम् “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥” इत्यत्र कैवल्यवाचि “अपाम
सोमममृता अभूम” इत्यत्र देवभाववाचि “प्रजामनुप्रजायसे तदुतेमर्त्यामृतम्
इत्यत्र सन्तानवाचि दृष्टम् । यथा वा “यज्ञेन यज्ञमयजंत देवा”
इति वाक्यम् ‘अवध्नन्पुरुषं पशुम्’ इत्यव्यवहितातीत

पि वैयर्थ्यं स्यात् । तथा सति दृष्टत्वादि मंत्राणामपि तत्कल्प्यं स्यात्तेन बाह्यन्तं
श्रुतिषोडशकर्मकाण्डोच्छेदौ स्यातां तस्मान्मन्त्राणां रामायणमूलत्वे संभवत्यपि
अध्यात्मपरत्वं न युज्यत इति चेत् । न, एकस्मिन्नेव विषये प्रतिपत्तृभेदेन
प्रतिपत्तिभेददर्शनात् । तथाहि एकं रज्जुखण्डं कश्चित्सर्प इति, कश्चिद्दण्ड इति;
कश्चिद्रज्जुरिति प्रत्यक्षेण प्रत्येति । एकं वा घटं कश्चिदसत्त्वेन कश्चिदनिर्वचनीयत्वेन
तर्कवलात्प्रत्येति, तथा “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतम-
भयमेतद् ब्रह्म” इति प्रजापतिवाक्यादेकमेवात्मानं देहादिविशिष्टमेषामृतादि-
गुणभाक्त्वेनविरोचनः प्रतिपेदे इन्द्रस्तु तत एव श्लेषेन देहत्रयातीतं तादृक्त्वेनेति
दृश्यते । यास्कोपि “बहुप्रजा निर्ऋतिमाविवेश” इत्यस्य बहुप्रजाः कृच्छ्रमापद्यत
इतिपरिव्राजकाः, वर्षकर्मेति नैरुक्ता इति एकमेव निर्ऋतिपदं द्वेधा व्याचष्टे ।
वर्षकर्मेत्यस्य व्याख्याभूमिमापद्यत इति तत्रैव ज्ञेयम् । तस्मादस्तिप्रतिपत्ति
भेदादर्थभेदो मंत्राणाम् । अत एव यास्कः स्थालीपुलाकन्यायेन कांश्चिन्मन्त्रान-
धिदैवतमध्यात्मं च व्याख्याय सर्वेषामचेतनदेवतानामभिरध्यात्मपरतया व्याख्यानं
कर्तव्यमित्याशयेनाह-“माहाभाग्याद्देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयत एक-
स्यात्मनोन्ये देवाः प्रत्यंगानि भवन्त्यपि च सत्त्वानां प्रकृतिभिऋषयः स्तुवन्तोत्याहुः
प्रकृतिसार्वनाम्न्याच्चेतरेतरजन्मानो भवन्तीतरेतरप्रकृतयः कर्मजन्मान आत्म-
जन्मानः आत्मैवैषां रथो भवत्यात्माश्वा आत्मायुधमात्मेषवः सर्वं देवस्य देवस्य”
इति । एतदेवाभिप्रेत्य व्यासोपि आश्वमेधिकाध्यात्मे ‘वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता'
इत्यारभ्य ‘ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ ॥ शतक्रतुरदृश्येन वज्रेणेतीह
नः श्रुतम् ॥ इति । अत्र वृत्रशतक्रतुवज्रशब्दानज्ञानजीवविवकेषु प्रयुंक्त ।
वनादिरूपकेण च ब्रह्मान्यरूपयत्तत्रैव क्वचिदधिलोके दृष्टमत्यर्थं मंदाधिकारिणेः-
धिदेवपरतया व्याचष्टे यथोक्तम्-‘के ये ते स्त्रियो ज्ञाता विधाता ये च ते सिनाः
कृष्णाश्च तंतवस्ते रात्र्यहनी इत्यादिना । विद्वांस्तु-“द्वादशारं नहि
तज्जराय वर्वति चक्रं परिद्याममृतस्य ॥ आपुत्राग्नेमिथुनासो अत्र सप्त शतानि
विंशतिश्च तस्थुः” इत्यादीनामृचां संवत्सरोऽहोरात्रपरत्वेनानुवादसरूपत्वं
मा भूदिति इत्थं व्याचक्षते । षाडिन्द्रियाणि षडृतवः ऋतावृतौ द्वौ द्वामासाविव
प्रतीन्द्रियं रागद्वेषौ प्रतिमासं द्वौ पक्षाविव प्रतिरागं प्रतिद्वेषं च पक्षद्वयं यथा
धर्मे रागः शुक्लः अर्थे कृष्णः, एवं धर्मे द्वेषः, कृष्णः, अर्थे शुक्ल इति ।
प्रतिपक्षं पंचदश तिथयः ताश्च सूर्य्यचन्द्रयोः सन्निकर्षविप्रकर्षतारम्याद्भवन्ति
तत्र सूर्य आत्मा चन्द्रः षोडशकला मनोरूपी अहमर्थः कलाश्च प्राणः १ श्रद्धा २
खं ३ वायुः ४ ज्योतिः ५ आपो ६ भूः ७ इन्द्रियम् ८ मनः ९, अन्नम् १०
वीर्य्यम् ११, तपः १२, मंत्राः १३, कर्म १४ लोकाः १५, नाम १६ च ।

ता मंत्रार्थवादैरपि कर्मणि रुच्युत्पादनार्थमनुपपन्नोऽप्यर्थः
प्रजाया अमृतत्वमात्मावपोत्खननमित्यादिरुपन्यस्यते “प्रजामनुप्रजायसे तदु ते
मर्त्यामृतम्” इति, प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत् इति च । एवं च
कर्मस्तवकार्थवादानुसारिभाष्यकारीयं व्याख्यानममुख्यम् । अत एवोक्तं
भारते “इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं
प्रहरेत्” इति तत्र उपबृंहणं नाम एकत्र मन्त्रे तृचे सूक्ते वा दृष्टस्यार्थस्य
संक्षिप्तस्य नानास्थानेषु विप्रकीर्णानां तदनुगुणानामर्थानामुपसंहारेण पुष्टिकरत्वम् ।
तच्च येन कर्ममात्रं न श्रुतं तेन कर्तुमशक्यम्, अतस्तस्मादल्पश्रुताद्वे-
दस्य भयं युक्तम् । भगवानपि “यामिमां पुष्पितां वाचम्” इत्यादिनाऽर्थ-
वादानां मोहकत्वं ब्रुवन् तदनुसारिणो व्याख्यानस्यानादरणीयत्वं दर्शयति

१० मन्त्ररामायण
विध्यर्थं स्मारयति । यथा "यत्कृष्णो रूपं कृत्वा प्राविशस्त्वं वनस्पतीन् । तत-
स्त्वामेकविंशतिधा सम्भरामि सुसम्भृतम्" इति मन्त्रः कृष्णाह्वयब्रह्माख्यस्त्वं रूपप्रपञ्चं
निर्माय स्थावरजङ्गमात्मकं तं प्रविश्य तत्र तद्वस्तुतादात्म्यापत्त्या समिद्रूपोसि
ततो हेतोः त्वाम् एकविंशतिधा सम्भरामीति "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनु
प्रविश्य सच्चित्यञ्चाभवत्" इति ब्राह्मणोक्तकथाप्रदर्शनपूर्वकं समिधां कृष्णभाव-
मापादयत् तासां सम्भरणं स्मारयति । यथा वा "यस्य रूपं विभ्रदिमामविन्द-
द्गुहां प्रविष्टा सरितस्य मध्ये । तस्येदं विहृतमाभरन्त" इति मन्त्रो यस्य वराहस्य
रूपं धारयन् परमेश्वरः भूमि समुद्रमध्येनिगूढस्थाने प्रविष्टामलभत्, तेनेदमुत्खातं
मृत्खण्डम् आभरन्तो वयमिति वराहावतारकथाप्रदर्शनपूर्वकं व

पदे पांसुरूपेण सम्यगारूढमिति । न चैतेषां व्याख्यानम् "इषे त्वा" इतिवद्विनि-
योगमात्रविदायुष्करवराहवामनप्रादुर्भावान् ऐतिहासिकानजानता कर्तुं शक्यम् ।
द्वितीये "आज्यैः स्तुवते, पृष्ठैः स्तुवते प्रउग (?) शंसति, निष्केवल्यं शंसति"
इत्यादी स्तुतशस्त्रयोस्तु संस्कारो "याज्यावद्देवताभिधानत्वात्" इति सूत्रेण, ।
यथा याज्या देवताभिधानरूपया दृष्टयैव द्वारा इष्टदेवतास्मारकत्वेन प्रधानयाग-
संस्कारार्था, एवं स्तोत्रशस्त्रे अपि मन्त्राणामन्यत्र क्लृप्ताया दृष्टार्थताया लंघनीय-
त्वादिति प्राप्त्यथापि वा श्रुतिसंयोगाल्लक्षणे "स्तौतिशंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्या-
ताम्" इति सूत्रेण स्तुतेः श्रुतिप्रकरणाभ्यां प्रतीयमानं साध्यत्वमुल्लंध्याश्रुतस्य
संस्कारसाधनस्य कल्पनायोगात् याज्यायास्तु प्रकरणादिना यागांगत्वसिद्धेर्दृष्टार्थ-
त्वौचित्यात्तस्याचेन (?) होयागाङ्गप्रधानकर्मणी स्तौतिशंसती इति स्तुतशस्त्राधि-
करणे स्तोत्रशस्त्रयोः स्तुत्येकप्रयोजनत्वस्य साधितत्वात्तत्सामान्यादितरस्यापि
वेदभागस्य देवतास्तुतिप्राधान्येनैव प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्वमपि युक्तम् एकरूप्य-
लाभात् तस्माज्जडानां कर्मसु यथा कथंचिद्व्युत्पादनार्थो भाष्यकारमते वेदे
रामकथाया अदशनेपि निगमन्निरुक्तोपबृंहणादिसिद्धायास्तस्या अपलापायोगात्
अव्युत्पन्नाग्राह्यत्वेपि व्युत्पन्नग्राह्यत्वसिद्धं रामायणस्य श्रुतिमूलत्वमतस्तन्मूल-
मन्त्रेष्वपि रामायणे इव कथांशा प्रत्यक्षवृत्त्या लभ्यते, अध्यात्मांशः परांक्तवृत्त्येति
भाष्यकारीयव्याख्यानेन सह एकैकस्य मन्त्रस्य त्रेधा व्याख्यानं क्रियते तत्र 'कंन
श्रिन्नमिषण्यसि' इत्यादयः षट् 'इषुन॑धन्वन्' इत्यादयः सप्तचत्वारिंशत्, 'तां सुते
कीतिम्' इत्यादय एकविंशतिः 'पृर्चाप॒रं चरतः इत्यादयोष्टाविंशतिरित्येवमादयः
परःसहस्रं प्रघट्टका रामकथां प्रकाशयन्त्युर्वशीपुरूरवःसंवादादिवत् यथा "हये जाये
मनसा"इत्यष्टादशर्चे सूक्ते उर्वशीपुरूरवसोः संवादरूपा कथा यथा वा "ओचित्स-
खायम्" इति चतुर्दशर्चे सूक्ते यमयम्‍योः संवादरूपा तद्वत् तत्र 'कं नश्चित्र-
मिषण्यसि चिकित्वाम्' इति द्वादशर्चं सूक्तं विखनसः पुत्रस्य वभ्रोरार्ष तथा
चानुक्रान्तं कं नो वभ्रा वैखानस इति विखनाः ब्रह्मा 'विखनसाशितो विश्वसृष्टये'
इति भागवते तत्र विखनःशब्दप्रयोगदर्शनात् वभ्रोपदेन च वभ्रीभरनुवित्तं
गुहास्विति वल्मीकधया (?) सम्भरणमन्त्रलिंगात् वल्मीककारिणो जन्तुविशेषा
उच्यन्ते ताभिर्वल्मीकगर्भस्थतामापादितो मुनिर्वाल्मीकिः स एवान्न वभ्र इत्युच्यते,
यथा वल्मीकशब्दादपत्यप्रत्ययः एवं वभ्रीशब्दादपि गोत्रप्रत्ययस्तस्य लुक्
शब्दसाधुत्वार्थं ज्ञेयः । वाल्मीकिश्च ब्रह्मपुत्रो रामायणस्य कर्तेति स्कान्दे पार्वतीं
प्रतीश्वरवाक्यं स्मर्यते "वाल्मीकिरभवद् ब्रह्मा वाणी वाक् तस्य रूपिणी । चकार
रामचरितं पावनं चरितव्रतः" ॥ इति 'तं कं न' इति सूक्तस्य रामायणस्य

१२ मन्त्ररामायण
च एकार्षेयत्वं सिद्धम् देवता तु तयोरिन्द्ररामशब्दाभ्यां निर्दिष्टः परमेश्वर एक
एव । यथा च रामायणीयप्रथमेऽध्याये प्रश्नपूर्विका संक्षिप्ता रामकथास्ति तथा-
स्मिन्नपि पञ्चर्चे इति अनयोर्मूलिमूलभावः सिद्धो व्याख्याय प्रदर्श्यते । तत्रेयमाद्या
ऋक् 'कं न' इति । अत्र वम्रः स्वस्य गुरुं कल्पयित्वा तं पृच्छन् तस्योत्तरमुखे-
नेश्वरं स्तौति--
यहाँ अपने गुरु की कल्पना करके वैखानस वम्र उनसे प्रश्न पूछते
हुए उनके उत्तर के माध्यम से ईश्वर की स्तुति करता है ।
कं नश्चित्रमिषण्यसि चिकित्वान्पृथुग्मानं वाशं वावृधध्यै ।
कत्तस्य दातु शवसो व्युष्टौ तक्षद्वज्रं वृत्रतुरमपिन्वत् ॥१॥
ऋ. १०. ९९, १
हे गुरु आप किस स्तुत्य, रमणीय, शौर्यवीर्यादिगुणों से युक्त पुरुष
की स्तुति करने के लिए हमें प्रेरित कर रहे हैं। मेरे द्वारा स्तुति करने
पर उसकी शक्ति क्या फल देगी ?
अर्थात् कौन स्तुति के योग्य है और स्तुति करने पर क्या फल देता
है ? उत्तर में कहते हैं : 'वह विवेक को तीक्ष्ण करके अज्ञान (वृत्रासुर)
का नाश करता है।'
भो गुरो त्वं चिकित्वान् स्तुत्यं पुरुषं जानन् कं चित्रादिगुणवन्तं वावृधध्यै
वर्धयितुं पराक्रमादिभिः स्तोतुम् अस्मान् इषण्यसि प्रेरयसि चित्रं रमणीयं
पृथुग्मानं पृथून् निरवधिकबृहत्त्व युक्तान् शौर्यधैर्यादीन् गतान् प्राप्तान् ब्रह्मादीन्
मिमीते परिछिनत्तीति तं पृथुग्मानं निरतिशयैश्वर्यं वाशं वर्णनीयं तथा तस्य
पुरुषस्य सम्बन्धिनः शवसः बलस्य व्युष्टौ प्रकाशे मया कृते सति तस्य कत् किं
दातु दानं स्तुतः सन् सः नः किं फलं दास्यतीत्यर्थः एवं कःस्तुत्यः किं च
स्तुतिफलमिति पृष्टे प्रथमं प्ररोचनार्थं फलं दर्शयति तक्षदिति । अश्वमेधपर्वणि
“ततो वृतं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ । शतक्रतूरहस्येन वज्रेणेतीह नः श्रुतम्” ॥
इति कृष्णवाक्ये इन्द्रवृत्रवज्रशब्दैरात्ममोहकविवेका उच्यन्ते एतैरेव संकेतैः
कृत्स्नो वेदो व्याख्येय इत्येवमर्थः । ततश्च वज्रं स्तोतुर्विवेकं तक्षत् तनुकुर्वन् अम-
भावश्छान्दसः । तेन सूक्ष्मार्थभेदिना वृत्रतुरं स्वाज्ञानहन्तारं तं अपिन्वत्
अतर्पयत् स्तुत्या तुष्टः सन् तं विवेकं ददानि येनाज्ञाननाशादनर्थनिवृत्त्यानन्दावाप्ता
मद्यत इति पक्षेब्रह्म व्याहरणन्नेव भवतीति विषयप्रयोजने दर्शयते ॥ १ ॥
सहिद्युताविद्युतावेति सामपृथुं योनिमसुरत्वाससाद ।

ससनीलेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्यमायाः ॥२॥
ऋ. १०. ६६, २
अपनी दीप्ति और शक्ति से युक्त, द्रोहरहित जिस राम की पत्नी
पृथ्वी पुत्री सीता को असुरों के द्वारा चुरा लिया गया, उस राम ने
अपने लोकवासियों के साथ पत्नी का हरण करने वाले रावण की माया
को प्रकृष्ट रूप से सहन करते हुए युद्ध में उसकी समस्त माया को उसके
साथ नष्ट कर दिया !
अथ स्तुतिस्वरूपं च दर्शयति सहीति । स घनश्यामः पुरुषः राम इति
कथासम्बन्धवशादवसीयते । हि प्रसिद्धः प्रत्यगात्मत्वात् । द्युता स्वस्य दीप्त्या
शक्त्या विद्युता तथैव विद्युद्दष्टिपृश्निग्रहया सह साम अपगतद्रोहं यथा स्यात्तथा
वेति गच्छति देशान्तरमित्यर्थात् 'ऋध्या सह गयम् आगात्' इत्युपसंहारात् ऋध्या
देव्या सीतया गयं गृहं तत्र च अस्य पृथुं पृथ्‍वीं योनिं जायां सीतां जायेदस्तंमद्य-
घरसेदुर्योनिरिति ( ? ) महीं देवीं विष्णुपत्नीमजूर्यामिति च

१४ मन्त्ररामायण
अथाध्यात्ममप्युच्यते सवाजमिति ॥ स निरस्तसमस्तमायः श्रीरामभद्रः
अनवश्वियुग्वाहनहीनः वाजं संग्रामं यात्वा संताऽभूत् । कीदृशः । अपदुष्पदायन्
अपगतं दुःस्थितं पदं स्थानं कण्टककर्दमसलिलाद्यनाक्रान्तं यस्मात्तेन अपदुष्पदा
सेतुरूपेण पधायन् गच्छन् लङ्कामित्यर्थात् स्वर्षता इन्द्रादिलोकानां विभाजको
धिष्णुः शतदुरस्य शतद्वारस्य सत वै शीर्षण्याः प्राणाः द्वाववांचौ नाभिदर्शमीति
प्रतिवदनं दशद्वारत्वाच्छतद्वारो रावणः नाभ्यादिस्थानेष्वपि तत्तन्मुखद्वाराऽन्न-
रसागमनस्येष्टत्वात् मुखसंख्यानि प्रच्छन्नानि द्वाराणि संतीति ज्ञेयं । तस्य वेदो
धनं लङ्काराज्यं सनिष्यन् तद्भ्रात्रे विभीषणाय विभजिष्यन् परिषदत् स्वैष्टजनेन
परिवृतोन्यषीदत् । उपविष्टवान् । कीदृशः शिश्नदेवान् कामुकाद्राक्षसादीन् घ्नन्
नाशयन् वर्पसा स्वरूपेण अभिभूत् अभिभावितवान् सेतुमार्गेण लङ्कां गत्वा
दारहर्तारं हत्वा परिजनेनावृतः शत्रुधनानि तद्भ्रात्रे समर्पितवा नित्यर्थः ॥ ३ ॥
सयह्व्योवनीर्गोष्वा॑ जु॒होति॒ प्रध॒न्या॑सु स॒स्रिः ।
अपा॑दो यत्र॑ यु॒ज्यासो॑ऽरथा॒द्रोण्य॑श्वास ईर॑ते घृ॒तं वा ॥४॥
ऋ. १०. ९६, ४
जल में नौका के समान जिनकी गति है, पादचार रहित के समान
उन वानर सखाओं के साथ राम ने महासमुद्र पर पुल बना कर उसे
विस्तीर्ण पृथ्वी के समान भ्रमण योग्य कर दिया ।
अपदुष्पदायन्नित्येतद्विवृणोति सयह्वइति । स रामो यत्रस्थाने घृतं क्षरण-
स्वभावं घृतं वाःवारि द्रोण्यश्वासः द्रोणयो नाव एवाश्वा इव गति साधनानि
येषां सन्ति ते तथाभूताः एव ईरते गच्छन्ति यत्र च युज्यासः सखायो वानराः
अपादः पादचाराभावात् पादहीना इव एवम् अर्णाः भवन्ति तत्रापि महार्णव-
स्थाने यह्वीः महतीः अवनी सस्रिर्विस्तीर्णान् भूप्रदेशान्ससार "अद्रिगमहन" इति
किन्प्रत्ययं। लिङ्गव्यत्या

मन्त्ररामायण १५
वह राम हनूमदादि सहित समस्तदोषों से रहित सीता के साथ
पुनः अपने स्थान को वापस आ गये ! रावण के स्पर्श निमित्त अपवाद को
दूर करने के लिए राम के द्वारा त्यक्त सीता वन में रुदन करने लगी ।
वाल्मीकि के युगल शिष्य लव कुश ने उनसे पढ़कर समस्त वृत्तान्त
लोक में गया ।
सहरुद्रेभिरिति सः रामः रुद्रेभिः हनूमदादिभिः सहायैः ऋन्वा ऋतेन भासनया
देव्या सीतया सह गयं स्वस्थानम् आगात् आगतवान्कीदृश आरे अवद्य दूरनिरस्त-
दोषः सीतां रावणहृतां सर्वदेवसन्निधौ संशोध्येत्यर्थः किं कृत्वा गयम् आगात्
अशस्तवारोहिंन्धी प्रतिकूलकाले गृहं त्यक्त्वा पुनर्देव्या सहागादित्यर्थः । एतत्सर्वं
समविध्यं रामायणं वभ्रस्य वाल्मोकेः सम्बन्धिनौ शिष्यौ मिथुनौ द्वौ कुशलवौ
विदन्त्री तस्मादधीत्य लोके विशेषेण विवृतवन्तौ इत्यहं मन्ये जानामीति मन्त्र-
द्रष्टुर्युक्तिः तत्र भविष्यमाह - अन्नमिति । मुषायन् स्तेनो रावणः अन्नं पृथिवीं
तद्रूपां सीताम् अशशददः पृथिव्याम् "ता अन्नमसृजन्त" इति छान्दोग्ये । दृष्टः
अमीव्य अस्म्येत्य अरोदयत रावणस्पर्श निमित्तापवादपरिहार्थं रामेण त्यक्ता
सीता रोदनं कृतवतीत्यर्थः ॥ ५ ॥
स अत्र ऋन्वा सह गयमागादित्युपसंहारो विद्युता सहषेतीत्युपक्रमस्य अन्नं
मुषायन्नित्युपसंहारो योनिमाससादित्युपक्रमस्य दूरे अवद्य इत्युपसंहारोऽसुरस्पर्श-
निमित्तकार्थिकानां कायाश्वनुकूल इत्युपक्रमोपसंहारयोरैक्यरूप्यादिदं मन्त्रचतुष्ट-
यात्मकमेकं वाक्यं परमपुरुषप्रतिपादकं तद्विषयश्च प्रश्नः प्रथममन्त्र इति मन्त्र-
पञ्चकमिदं रामायणसंक्षेपपरमिति वाक्यार्थमर्यादाविदो विदांकुर्वन्तु ॥ ५ ॥
एवं मन्त्रप