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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

प्रस्तावना ३१
वेदार्थानभिज्ञे सति न रामायणमपराद्ध्यति"१ ।
इस प्रकार मन्त्ररामायण के कर्त्ता ने सम्पूर्ण रामकथा तथा इसके
पात्रों का निदर्शन वैदिक वाङ्मय से कराया है ।
इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में रामरक्षास्तोत्र उद्धृत है और उसकी
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थ के प्रयोजन को रामकथा का वेदमूलकत्व
सिद्ध करना ही अभिहित किया गया है । "इसके प्रारम्भ में रामायण के
गायत्री-स्वरूप का उल्लेख है । गायत्रीरामायण, विद्यारण्य कृत
रामायण रहस्य, तत्त्वसंग्रहरामायण, गोविन्दराज-कृत भूषणटीका आदि
रामायण के गायत्री-स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । तर्क यह है कि
रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला
अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है—
‘प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।’
किन्तु वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह
का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता । विद्यारण्य ने वाल्मीकि
रामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्री-स्वरूप कहा है—
“गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम्”२ ।
नीलकण्ठ द्वारा रचित इस ग्रन्थ के विद्वान् सम्पादक डा० राम
कुमार राय हैं। उन्होंने प्रत्येक वैदिक मन्त्र के सन्दर्भ दे दिये हैं, साथ ही
मन्त्ररहस्य-प्रकाशिका व्याख्या के अनुसार उन मन्त्रों का हिन्दी अनु-
वाद भी प्रस्तुत कर दिया है । इससे यह ग्रन्थ अत्यन्त बोधगम्य बन
गया है । मन्त्ररामायण का संस्करण आज से बहुत पहले श्री वेङ्कटेश्वर
स्टीम प्रेस, बम्बई, से मुद्रित हुआ था और यह कार्य इतना पहले हुआ
था कि इसकी प्रतियाँ अत्यन्त दुर्लभ हो गयीं थी तथा विद्वद्वर्ग इसे भूल
सा गया था कि आज से कई शताब्दी पूर्व नीलकण्ठ ने रामकथा अथवा
रामायण की वेदमूलकता प्रतिपादित करने का श्लाघनीय प्रयत्न किया
था । प्रस्तुत संस्करण इस कमी को हटाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका
अदा करेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है ।
आशा है मन्त्ररामायण का यह संस्करण विद्वानों द्वारा आहत होगा ।
वाराणसी, ७ जनवरी १६८८ लक्ष्मीनारायण तिवारी
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ ६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १७४-१७५ ।