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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

२८ प्रस्तावना
“न नंहसा मूर्द्धिणो वा न च देवाञ्जनस्रजः ।
कुबेरस्य यथोष्णीषं किं मां समुपसर्पंथ” ॥
“इति प्राचीनः पाठो देवबोधादिभिर्व्याख्यातत्वात्” । कहीं-कहीं
इनके द्वारा इङ्गित किये गये ये पाठ तत्तत् टीकाओं में सम्प्रति प्राप्त
नहीं होते और इन्हें देखते हुए विद्वानों की यह भी धारणा है कि मात्र
सम्मान-प्रदर्शन हेतु तो ऐसा नहीं हुआ है ? साथ ही देवबोध को ये
‘प्राचीन’ कहते हैं और ऐसा तभी सम्भव प्रतीत होता है जब इनके
तथा देवबोध के बीच कम से कम चार या पाँच शताब्दियों का अन्तर
काल की दृष्टि से रहा हो । देवबोध की ओर निर्देश आगे भी है—
“मधुपर्किकाः मधुपर्क-समये पठन्त इति देवबोधः” । इसी प्रकार दूसरे
व्याख्याकार अर्जुन मिश्र को उद्धृत करते हुए ये कहते हैं—“जारूथ्यान्
त्रिगुणदक्षिणान् इत्यर्जुन मिश्रः ।” किन्हीं-किन्हीं पाण्डुलिपियों की ओर
सङ्केत ‘क्वचित्पुस्तके’ लिखकर किया गया है—“अत्र यत्तद्देवा
ददुरित्यादिना त्रिपथगां नदीमित्यन्तों नारायणोपाख्यानग्रन्थोऽध्याय-
द्वयात्मकः क्वचित्पुस्तके पठ्यते” । अर्जुन मिश्र ने भी देवबोध को उद्धृत
किया है और इससे हम इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँच सकते हैं कि
काल की दृष्टि से इन टीकाकारों में यह क्रम बनता है—देवबोध, अर्जुन
मिश्र, नीलकण्ठ । कहीं-कहीं नीलकण्ठ द्वारा विचित्र रूप में भी व्याख्याएँ
प्रस्तुत हुई हैं' ।
नीलकण्ठ ने इस टीका के अतिरिक्त गणेशगीता पर भी टीका
लिखी थी । मन्त्ररामायण के अतिरिक्त इनका मन्त्रभागवत नामक
ग्रन्थ भी अति प्रसिद्ध है, जिसमें भागवत की कथा से सम्बद्ध मन्त्र
ऋग्वेद से इस प्रकार क्रमबद्ध रूप से संगृहीत हैं, जिनसे सम्पूर्ण भागवत
की कथा प्रस्तुत हो जाती है और इसके ऊपर इन्होंने अपने सिद्धान्ता-
नुसार इन मन्त्रों से भागवत की कथा निःसृत करने हेतु अपनी व्याख्या
लिखी है । इनके पुत्र का भी नाम गोविन्द था, जिनके पुत्र (अर्थात्
नीलकण्ठ के पौत्र ) शिव ने पैठण में निवास करते हुए 'धर्मतत्त्व-प्रकाश'
नामक ग्रन्थ की रचना १७४६ ई० में की थी । नीलकण्ठ की ‘शिव-
ताण्डव-टीका’ का रचनाकाल १६८० ई० तथा ‘गणेशगीता' की टीका
का रचनाकाल १६६३ ई० है । ‘भारत-भाव प्रदीप’ के नाना हस्तलेखों
१. वहीं,पृष्ठ ६५-६७ ।