मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० प्रस्तावना
रामायण कहा गया है । यहाँ अनुशरण, शोक और स्मरण, ये तीन
वाल्मीकि रामायण के श्लोकों के श्रुतिमूलक कारण हैं ।
रभसस्येत्यादि मन्त्र में 'दुष्कृत' यह अन्तिम पद है । इसमें बत्तीस
वर्ण हैं । कार्यहानि को देखकर इस मन्त्र के द्वारा शोक व्यक्त है और
शोक के कारण को शाप-रूप प्रतिफल प्राप्त हुआ है । इस मन्त्र का भाव
ही 'मा निषाद.....' इत्यादि श्लोक में व्यक्त हुआ है । यह श्लोक अनुष्टुप्
छन्द में है। इस छन्द में गायत्री और पंक्ति ये दो छन्द सन्निविष्ट हैं।
जगती छन्द के भी आ जाने से यहाँ अनुष्टुप् छन्द ही लिया जायेगा ।
अथवा अनुष्टुप्, त्रिष्टुप् तथा जगती छन्दों के प्रति पादों का सन्निवेश
अनुष्टुप् छन्द में ही हुआ है। अतः सभी छन्दों का मूल अनुष्टुप् छन्द
हुआ। इसी छन्द को प्राचेतस् ऋषि वाल्मीकि ने आदि-काव्य का
आधार बनाकर वेदमूलक रामायण की रचना की है ।
मन्त्र संख्या १० द्वारा यह व्यक्त किया गया है कि वेद का परम
तत्त्व 'ऋत' एवं सत्य है । वाल्मीकि ने रामकथा के रूप में ऋत एवं
सत्य तत्त्व को प्रतिष्ठित करते हुए अनृत एवं असत् तत्त्वों की निन्दा
प्रस्तुत की है । रामायण या रामकथा परम तत्त्व को प्राप्त कराने में
तन्तुरूप से कार्य करती है । विष्णु की स्तुति के लिये प्रयुक्त शब्द (वायु
रूप ) कवियों के जिह्वाग्र में स्थित भोग और मोक्षसाधिका विष्णु की
माया के द्वारा रामकथा के रूप में अत्यन्त विस्तृत है । इस मन्त्र में
'वरुणस्य' के तात्पर्य वरुणपुत्र प्राचेतस् नाम से अभिहित वाल्मीकि ही
हैं। 'धीर' शब्द से भी इन्हीं वाल्मीकि का अभिधान किया गया है।
अतः उन्होंने समग्र रूप से रामकथा का वर्णन किया है।
इसी प्रकार मन्त्र संख्या ३३ को सीता का स्तुति विषयक सिद्ध
किया गया है। 'सीता' शब्द की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए नीलकण्ठ
कहते हैं— "स्यति सर्वेषां रक्षसामन्तं करोतीति सीता", अर्थात् जो
सभी राक्षसों का नाश कर दे वह सीता है। वे आगे कहते हैं— ऐसी
सीता हमारे ऐश्वर्य को बढ़ाती हुई प्रतिपक्ष (अशुभ कर्मों) का नाश
करें ।
मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करके कहते
हैं— "नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति इति न्यायेन त्वयि