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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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ससनीलेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्यमायाः ॥२॥
ऋ. १०. ६६, २
अपनी दीप्ति और शक्ति से युक्त, द्रोहरहित जिस राम की पत्नी
पृथ्वी पुत्री सीता को असुरों के द्वारा चुरा लिया गया, उस राम ने
अपने लोकवासियों के साथ पत्नी का हरण करने वाले रावण की माया
को प्रकृष्ट रूप से सहन करते हुए युद्ध में उसकी समस्त माया को उसके
साथ नष्ट कर दिया !
अथ स्तुतिस्वरूपं च दर्शयति सहीति । स घनश्यामः पुरुषः राम इति
कथासम्बन्धवशादवसीयते । हि प्रसिद्धः प्रत्यगात्मत्वात् । द्युता स्वस्य दीप्त्या
शक्त्या विद्युता तथैव विद्युद्दष्टिपृश्निग्रहया सह साम अपगतद्रोहं यथा स्यात्तथा
वेति गच्छति देशान्तरमित्यर्थात् 'ऋध्या सह गयम् आगात्' इत्युपसंहारात् ऋध्या
देव्या सीतया गयं गृहं तत्र च अस्य पृथुं पृथ्‍वीं योनिं जायां सीतां जायेदस्तंमद्य-
घरसेदुर्योनिरिति ( ? ) महीं देवीं विष्णुपत्नीमजूर्यामिति च