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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

प्रस्तावना २६
का समय १६८७ ई० से लेकर १६६५ ई० है, अतः इनका समय १६५०
ई०-१७०० ई० मानना उचित प्रतीत होता है¹।
जैसा ऊपर कहा जा चुका है, मन्त्ररामायण में नीलकण्ठ ने ऋग्वेद
के मन्त्रों को देते हुए उनसे पूरी रामकथा अथवा रामायण कथा को
निकाला है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पूरी रामकथा
इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान हैं। इन मन्त्रों का सङ्कलन भी इन्होंने
स्वयं किया है और उनसे सम्पूर्ण रामकथा को व्यक्त करनेवाली 'मन्त्र-
रहस्य-प्रकाशिका' नामक व्याख्या लिखी है, जैसा कि इस व्याख्या के
अन्त में वे स्वयं कहते हैं— “इति श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणमर्यादाधुरन्धर-
चतुर्धरवंशावतंस-गोविन्दसूरिसूनोः श्रीनीलकण्ठस्य कृति स्वोद्धृतमन्त्र-
रामायणव्याख्या मन्त्ररहस्यप्रकाशिकाख्या समाप्तिगमत्” । इस प्रकार
से इन वैदिक मन्त्रों पर इनके द्वारा प्रस्तुत इस व्याख्या का नाम
'मन्त्ररहस्यप्रकाशिका' है। इस प्रकार मन्त्रों के सङ्कलन तथा उन पर
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक की
समस्त कथा को इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान प्रदर्शित किया है। ये
मन्त्र १५७ हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत व्याख्या-स्थलों के कुछ अंशों का
सारांश इस प्रकार—
मन्त्र ७ की व्याख्या यह प्रकट करती है कि वाल्मीकि रामायण
आर्ष काव्य है। महर्षि वाल्मीकि ने वेदों के छन्दों को अनुष्टुप् छन्द में
समन्वित करते हुए प्रायः समस्त रामायण की रचना की है। इसमें वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण माना गया है— अधिकं समस्वरन् श्रुतिं
दिव्यां दृष्टिं वा प्राप्य रम्यं काव्यं कृतवन्त इत्यर्थः । अर्थात् श्रुति के
अनुसार अथवा दिव्य दृष्टि को प्राप्त करके श्री वाल्मीकि के द्वारा रम्य
(रामायण) काव्य की रचना हुई। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण मानकर जिसकी (रामायण की) रचना की
तथा शोक व्यक्त किया ( 'मा निषाद••••' इत्यादि के द्वारा ), एवं श्रुति
अथवा नारदोपदिष्ट महापुरुष ( श्रीराम ) का उन ऋचाओं के अनुरूप
अनुष्टुप् छन्द द्वारा ही संस्मरण कर वर्णन किया, वही श्लोक-रूप से
१. द्रष्टव्य, बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास,
पृष्ठ ७० ।