मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
२२ प्रस्तावना
च"१। इस प्रकार निरर्थक प्रलाप के अन्तर्गत भारतयुद्ध-कथा (महा-
भारत-कथा) तथा सीताहरण-कथा (रामायण-कथा) को अट्ठकथाकार
बुद्धघोष ने रखा है। आगे चलकर मध्यम शील के वर्णन के अन्तर्गत
यह आया है कि जिस प्रकार अन्य श्रमण तथा ब्राह्मण इस प्रकार की
व्यर्थ अथवा तिरश्चीन कथाओं में लगे रहते हैं, जैसे— राजकथा,
चोरकथा, महामात्यकथा, सेनाकथा, भयकथा, युद्धकथा....आदि; उस
प्रकार से श्रमण गोतम ऐसी व्यर्थ कथाओं में नहीं लगा रहता। अतः
लोग उसकी प्रशंसा करते हैं२। यहाँ पर हम देखते हैं कि इस सन्दर्भ
में 'युद्धकथा' शब्द आया है। 'सुमङ्गलविलासिनी' में ही इसकी
व्याख्या आचार्य बुद्धघोष इस प्रकार से करते हैं— "युद्धे पि भारत-
युद्धादीसु असुकेन असुको एवं मारितो एवं विद्धो ति कामस्सादवसेन
कथा तिरच्छानकथा"३। 'सुमङ्गलविलासिनी' के थाई (स्यामी)
संस्करण में 'भारतयुद्धादीसु' के स्थान पर 'भारतरामायुद्धादीसु' पाठ
है४ जो स्पष्ट रूप से महाभारत-कथा तथा रामायण-कथा इन दोनों की
ओर इङ्गित करता है।
भारतीय वाङ्मय के प्रसिद्ध इतिहास-लेखक विन्टरनित्स ने यह
स्थापना करते हुए कहा कि बौद्ध पालि त्रिपिटक में महाभारत अथवा
रामायण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उसी स्थल पर यह पाद-टिप्पणी दे
दी है कि 'युद्धकथा' का अर्थ अथवा अभिप्राय यदि रामायण अथवा
महाभारत प्रारम्भिक त्रिपिटक युग में ही अभिप्रेत होता तो मूल में ही
इन दोनों नामों का उल्लेख होता और मात्र युद्धकथा कह कर न छोड़
दिया जाता५। पर उनका यह कथन पूर्णतया भ्रान्ति-युक्त एवं निरर्थक
है, क्योंकि ऐसा न करने का तो कारण स्वयमेव स्पष्ट ही है कि उक्त
बौद्ध कथन में इन विशिष्टकथाओं के प्रति किसी भी प्रकार के आदर-
भाव की सम्भावना ही नहीं है। जिसे निरर्थक प्रलाप अथवा तिरश्चीन
१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६३-६४।
२. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६।
३. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ १०७।
४. वहीं।
५. द्रष्टव्य, एम० विन्टरनित्स, हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर,
भा० १, पृष्ठ ४७१, टि० ४।
प्रस्तावना २३
कथा कहा जा रहा हो, उसके प्रति गौरवबुद्धि कैसे हो सकती है और
ऐसा न होने पर मूल में इनके नामोल्लेख करने का प्रसङ्ग ही नहीं
उठता।
यदि यह प्रश्न उठाया जाय कि आचार्य बुद्धघोष का समय पांचवी
शताब्दी है और उस समय तक रामायण तथा महाभारतादि ग्रन्थों की
प्रतिष्ठा हो चुकी थी, अतएव उनके द्वारा इस प्रकार का व्याख्यान
प्रस्तुत हुआ, तो इसका उत्तर यह है कि बौद्ध परम्परा यह मानती है
कि सम्राट् अशोक से पूर्व हुई बौद्ध सङ्गीतियों में मूल पालि त्रिपिटक के
साथ उसको अट्ठकथाओं का भी सङ्गायन हुआ था और अशोक के समय
पाटलिपुत्र में हुई तृतीय सङ्गीति के सन्दर्भ में अशोक के पुत्र महेन्द्र
अपने साथ मूल त्रिपिटक तथा उसकी अट्ठकथाओं को सिंहल द्वीप ले
गये थे। कालान्तर में उनका सिंहली अनुवाद प्रस्तुत किया गया और
बाद में आगे चल कर आचार्य बुद्धघोष ने इनका सिंहली भाषा से
पालि अथवा मागधी भाषा में अनुवाद-मात्र किया, कोई नवीन रचना
नहीं की। 'सुमङ्गलविलासिनी' के प्रारम्भ में ही आचार्य बुद्धघोष ने
इस तथ्य को प्रकट किया है¹।
इस प्रकार दशरथजातक से स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख युद्धकथा
के रूप में स्वयं त्रिपिटक में प्राप्त है। दशरथजातक तो स्वयं ही अट्ठकथा
का भाग है। जातक की मात्र गाथाएँ मूल त्रिपिटक का भाग मानी
जाती हैं, शेष कथा अट्ठकथा में दी गयी है। अतः ऊपर दिये गये 'युद्ध-
कथा' शब्द तथा उसके व्याख्यान के सन्दर्भ में डा० वेबर का सिद्धान्त
खण्डित हो जाता है कि दशरथजातक मात्र में रामकथा का मूल स्रोत
सुरक्षित है। युद्धकथा का सन्दर्भ यह व्यक्त करता है कि राम-रावण के
युद्ध की कथा रूप में रामकथा की प्रतिष्ठा समाज में उस समय हो चुकी थी
और काफी समय तक रामकथा अथवा इस कथा को व्यक्त करने वाले
काव्य को सीताहरण कहा जाता रहा। अतः सीताहरण तथा रावण
युद्ध की ओर पूर्व में ही 'युद्धकथा' से निदर्शन विद्यमान रहने के कारण
होमर के काव्य से इसके आने का प्रश्न ही नहीं उठता।
डा० याकोबी भी वेबर की भाँति ही रामकथा को दो भागों में
बाँट कर उसके दो आधारों को स्थापित करते हैं। उनके अनुसार प्रथम
१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३।
२४ प्रस्तावना
भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ
प्रधान नायक है तथा द्वितीय भाग में दण्डकारण्य तथा रावणवध-
सम्बन्धी कथा मिलती है और इसका मूल स्रोत वेदों की देवता-सम्बन्धी
कथाएँ प्रतीत होती हैं१ ।
श्री बुल्के को डा० याकोबी का मत तर्क-सङ्गत प्रतीत नहीं होता२,
क्योंकि उन्होंने अपने मस्तिक में यह निश्चित धारणा बना ली है कि
रामकथा का कोई वैदिक आधार नहीं है और डा० याकोबी उसका
वैदिक आधारमात्र ही नहीं देते, अपितु यह भी मानते हैं कि ईरानीय
'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूल स्रोत एक ही है। हापकिन्स
के मतानुसार महाभारत के शान्तिपर्व में जो रामकथा प्राप्त होती है,
उससे डा० याकोबी के मत की पुष्टि होती है३ ।
दिनेशचन्द्र सेन भी रामकथा के दो प्रधान मूल स्रोतों की कल्पना
करते हैं और ये दो स्रोत उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के हैं।
प्रथम के अन्तर्गत वे दशरथजातक को रखते हैं तथा द्वितीय के अन्तर्गत
रावण-सम्बन्धी आख्यान को तथा इन दोनों के संयोग से रामकथा की
उत्पत्ति को प्रस्तुत करते हैं४ । पर इनके विचार भी श्री वेबर की भाँति
ही हैं जिनके विरुद्ध पूर्व में तर्क प्रस्तुत किये जा चुके हैं और यह प्रदर्शित
किया जा चुका है कि युद्धकथा के रूप में दशरथजातक के पूर्व ही
रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। रावण-सम्बन्धी स्वतन्त्र आख्यानों को
सिद्ध करने के लिये सेन ने बौद्ध तथा जैन वाङ्मय का सहारा लिया
है, जिनके विषय में यह कहा जा सकता है कि उन स्रोतों के बहुत ही
पूर्व रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। साथ ही बौद्धों तथा जैनों में
रामकथा के प्रति कोई गौरवबुद्धि नहीं थी और वे उसे अपने अनुसार
तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना चाहते थे ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि रामकथा के मूल स्रोत के रूप में वैदिक
वाङ्मय को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं दृष्टिगोचर होती ।
वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का उपबृंहण मानते हैं। उनकी यह
स्पष्टोक्ति है—
१. द्रष्टव्य, हर्मन याकोबो, दास रामायण, पृष्ठ ८६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १०५ ।
३. वहीं, पृष्ठ १०६ । ४. वहीं, पृष्ठ १०८ ।
प्रस्तावना २५
“रामायणं महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम् ।
सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम्” ॥ ( १।१६ )
अर्थात् रामायण नामक महाकाव्य समस्त वेदों की सम्मति के अनुकूल
है। वह समस्त पापों का नाश तथा दुष्ट ग्रहों की बाधा का निवारण
करने वाला है।
यही सिद्धान्त मन्त्ररामायण द्वारा भी स्थापित किया गया है जिस
पर हम नीचे स्वतन्त्र रूप से विचार प्रस्तुत करेंगे। “गाथानृतं नारा-
शंसी” उल्लेख जो काठकसंहिता ( १४।५ ) में है उसका तात्पर्य यही है
कि ये वेदरूप ही हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूपी मन्त्र
नाराशंसी होते हैं; नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब
सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं, इसीलिये स्वार्थ में ये
अनृत कहे जाते हैं, अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य
नहीं होता है। ये भी अपौरुषेय ही होते हैं। सिद्धान्तभूत गाथाएँ अनृत
नहीं हैं। यतः वेदों में वास्तविक इतिहास या किसी घटना का उल्लेख
मानने से वेद की अपौरुषेयता भङ्ग होती है, अतः वहाँ विद्यमान घटना-
सम्बन्धी गाथाएँ गुणवाद तथा अर्थवादमात्र मानी जाती हैं। उनका
तात्पर्य ही सत्य होता है और उनका वाच्यार्थ अनृत है, यही ‘गाथा-
नृतम्’ कहने का अभिप्राय है।
मन्त्ररामायण : भारतीय सनातन परम्परा में वाल्मीकि रामायण
तथा पुराणों आदि का प्रामाण्य उनके वेदमूलक होने के ही कारण है
और उन सभी को यह परम्परा वेद के व्याख्यान-स्वरूप में ही मानती
है। भारतीय परम्परा के मनु तथा व्यास आदि के मतानुसार वेद
अनादि माने जाते हैं तथा आधुनिक इतिहासकार भी वेद को संसार
की सबसे प्राचीन पुस्तक के रूप में ग्रहण करते हैं। वाल्मीकि रामायण
का स्पष्ट उद्घोष है—
“कुशीलवौ तु धर्मज्ञो राजपुत्रौ यशस्विनौ ।
भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥
स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥
काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।
पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः” ॥ (वा.रा. १।४।५-७)
२६ प्रस्तावना
अर्थात् राजकुमार कुश और लव दोनों भाई धर्म के ज्ञाता और
यशस्वी थे । उनका स्वर बड़ा ही मधुर था और वे मुनि के आश्रम पर
ही रहते थे । उनकी धारणा-शक्ति अद्भुत थी और वे दोनों ही वेदों में
पारङ्गत हो चुके थे । भगवान् वाल्मीकि ने उन्हें मेधावी देख कर वेदार्थ
का विस्तारपूर्वक ज्ञान कराने के लिये उन्हें सीता के चरित्र से युक्त
सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्य का, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्य-
वध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया ।
इस उद्धरण से यह पूर्णरूप से स्पष्ट है कि वेदार्थ के विस्तार के लिये
ही रामायण की रचना हुई । मन्त्ररामायण में भी वाल्मीकि रामायण
के इस वचन को उद्धृत करने के साथ ही अगस्त्यसंहिता के वचन को
उद्धृत करते हुए इसके लेखक नीलकण्ठ कहते हैं—"तथा रामायणस्य
वेदत्वोक्त्या प्रत्यक्षवेदमूलतत्त्वोपपादकम्—
"वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।
तस्माद्रामायणं देवि वेद एव न संशयः" ॥
इत्यगस्त्यसंहितावचनम्....१ ।
अर्थात् यह अगस्त्यसंहिता का वचन है कि वेदवेद्य परमात्मा जब
दशरथनन्दन राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी रामायण के
रूप में महर्षि प्राचेतस के मुख से अवतीर्ण हुए । इसलिये हे देवि, इसमें
संशय नहीं कि रामायण वेद ही है ।
इससे यह स्पष्ट है कि नीलकण्ठ के समय में भी रामायण अथवा
रामकथा के वेदमूलकत्व के सन्दर्भ में प्रश्न उपस्थित हुआ था और इसके
समाधान के लिये अर्थात् रामकथा की वेदमूलकता सिद्ध करने के लिए
उन्हें मन्त्ररामायण नामक ग्रन्थ की रचना करनी पड़ी ।
मन्त्ररामायण के रचयिता नीलकण्ठ का पूरा नाम नीलकण्ठ
चतुर्धर (आधुनिक भाषा में चौधरी) है। ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण विद्वान्
थे । इनके पिता का नाम गोविन्द सूरी तथा माता का नाम फुल्लाम्बिका
था और गोदावरी पर स्थित कूर्परग्राम के ये निवासी थे । आजकल
यह स्थान बम्बई राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित है और इसका
आधुनिक नाम कोपरगांव है । वहाँ से आकर ये काशी में बस गये और
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ २ ।
प्रस्तावना २७
यहीं पर इन्होंने महाभारत पर अपनी प्रख्यात टीका 'भारतभावप्रदीप'
की रचना की, जो विद्वानों में नीलकण्ठी के नाम से विख्यात है। इस
टीका को उन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में लिखा था¹।
महाभारत पर लिखी गयी अपनी इस प्रसिद्ध टीका के प्रारम्भ में
ही उन्होंने यह व्यक्त किया है कि इसके लिखने के पूर्व देश के विभिन्न
भागों से उन्होंने मूल ग्रन्थ महाभारत की अनेक पाण्डुलिपियों को
मँगाया था और उन्हें देखते हुए ही मूल के सर्वोपयुक्त पाठ का निर्धारण
किया था, साथ ही इस सन्दर्भ में प्राचीन व्याख्याकारों की व्याख्याओं
का भी अनुसरण किया था—
“बहून् समाहृत्य विभिन्नदेश्यान् कोशान् विनिश्चित्य च पाठमग्र्यम् ।
प्राचां गुरूणामनुसृत्य वाचम् आरभ्यते भारतभावदीपः”² ॥
इस सन्दर्भ में स्थान-स्थान पर वे पाठ-भेदों की ओर तथा अनेक
पाण्डुलिपियों में प्राप्त अधिक पाठ की ओर इङ्गित करते हैं और ऐसा
लगभग १२५ स्थानों में हुआ है। आज भी विभिन्न पाण्डुलिपियों का
परीक्षण करने पर पाठ-भेदों के सम्बन्ध में हमें वही सामग्री प्राप्त
होती है, जिसका निदर्शन इन्होंने अपनी टीका में किया है। इन पाठ-
भेदों के सम्बन्ध में अपने से पूर्व विद्यमान टीकाकारों की टीकाओं के
उद्धरण भी प्रमाण-स्वरूप ये उद्धृत करते हैं और यह इनका वैशिष्ट्य
महाभारत के प्रचलित मूल ग्रन्थ के सम्बन्ध में सूचना प्रस्तुत करने की
दिशा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भण्डारकर ओरियन्टल इन्स्टीट्यूट,
पूना, से प्रकाशित महाभारत में नीलकण्ठ द्वारा उद्धृत ऐसे पाठों को
पाद-टिप्पणी में दिया गया है और ये पर्याप्त संख्या में हैं। विभिन्न पर्वों
पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत करने के प्रसङ्ग में इन्होंने अपने से पूर्व
टीकाकारों में से देवबोध, विमलबोध, अर्जुन मिश्र, रत्नगर्भ तथा
सर्वज्ञनारायण आदि का नामोल्लेखपूर्वक स्मरण करते हुए उनके द्वारा
स्वीकृत मूल के पाठों को उद्धृत किया है—जैसे-महाभारत के
१।१५८।१४ पर व्याख्या करते हुए ये लिखते हैं—
१. द्रष्टव्य, आदिपर्वन्, वी० एस० सुकथंकर द्वारा सम्पादित,
पूना, प्रोलोगोमेना, पृष्ठ ६५ ।
२. वहीं।
२८ प्रस्तावना
“न नंहसा मूर्द्धिणो वा न च देवाञ्जनस्रजः ।
कुबेरस्य यथोष्णीषं किं मां समुपसर्पंथ” ॥
“इति प्राचीनः पाठो देवबोधादिभिर्व्याख्यातत्वात्” । कहीं-कहीं
इनके द्वारा इङ्गित किये गये ये पाठ तत्तत् टीकाओं में सम्प्रति प्राप्त
नहीं होते और इन्हें देखते हुए विद्वानों की यह भी धारणा है कि मात्र
सम्मान-प्रदर्शन हेतु तो ऐसा नहीं हुआ है ? साथ ही देवबोध को ये
‘प्राचीन’ कहते हैं और ऐसा तभी सम्भव प्रतीत होता है जब इनके
तथा देवबोध के बीच कम से कम चार या पाँच शताब्दियों का अन्तर
काल की दृष्टि से रहा हो । देवबोध की ओर निर्देश आगे भी है—
“मधुपर्किकाः मधुपर्क-समये पठन्त इति देवबोधः” । इसी प्रकार दूसरे
व्याख्याकार अर्जुन मिश्र को उद्धृत करते हुए ये कहते हैं—“जारूथ्यान्
त्रिगुणदक्षिणान् इत्यर्जुन मिश्रः ।” किन्हीं-किन्हीं पाण्डुलिपियों की ओर
सङ्केत ‘क्वचित्पुस्तके’ लिखकर किया गया है—“अत्र यत्तद्देवा
ददुरित्यादिना त्रिपथगां नदीमित्यन्तों नारायणोपाख्यानग्रन्थोऽध्याय-
द्वयात्मकः क्वचित्पुस्तके पठ्यते” । अर्जुन मिश्र ने भी देवबोध को उद्धृत
किया है और इससे हम इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँच सकते हैं कि
काल की दृष्टि से इन टीकाकारों में यह क्रम बनता है—देवबोध, अर्जुन
मिश्र, नीलकण्ठ । कहीं-कहीं नीलकण्ठ द्वारा विचित्र रूप में भी व्याख्याएँ
प्रस्तुत हुई हैं' ।
नीलकण्ठ ने इस टीका के अतिरिक्त गणेशगीता पर भी टीका
लिखी थी । मन्त्ररामायण के अतिरिक्त इनका मन्त्रभागवत नामक
ग्रन्थ भी अति प्रसिद्ध है, जिसमें भागवत की कथा से सम्बद्ध मन्त्र
ऋग्वेद से इस प्रकार क्रमबद्ध रूप से संगृहीत हैं, जिनसे सम्पूर्ण भागवत
की कथा प्रस्तुत हो जाती है और इसके ऊपर इन्होंने अपने सिद्धान्ता-
नुसार इन मन्त्रों से भागवत की कथा निःसृत करने हेतु अपनी व्याख्या
लिखी है । इनके पुत्र का भी नाम गोविन्द था, जिनके पुत्र (अर्थात्
नीलकण्ठ के पौत्र ) शिव ने पैठण में निवास करते हुए 'धर्मतत्त्व-प्रकाश'
नामक ग्रन्थ की रचना १७४६ ई० में की थी । नीलकण्ठ की ‘शिव-
ताण्डव-टीका’ का रचनाकाल १६८० ई० तथा ‘गणेशगीता' की टीका
का रचनाकाल १६६३ ई० है । ‘भारत-भाव प्रदीप’ के नाना हस्तलेखों
१. वहीं,पृष्ठ ६५-६७ ।
प्रस्तावना २६
का समय १६८७ ई० से लेकर १६६५ ई० है, अतः इनका समय १६५०
ई०-१७०० ई० मानना उचित प्रतीत होता है¹।
जैसा ऊपर कहा जा चुका है, मन्त्ररामायण में नीलकण्ठ ने ऋग्वेद
के मन्त्रों को देते हुए उनसे पूरी रामकथा अथवा रामायण कथा को
निकाला है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पूरी रामकथा
इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान हैं। इन मन्त्रों का सङ्कलन भी इन्होंने
स्वयं किया है और उनसे सम्पूर्ण रामकथा को व्यक्त करनेवाली 'मन्त्र-
रहस्य-प्रकाशिका' नामक व्याख्या लिखी है, जैसा कि इस व्याख्या के
अन्त में वे स्वयं कहते हैं— “इति श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणमर्यादाधुरन्धर-
चतुर्धरवंशावतंस-गोविन्दसूरिसूनोः श्रीनीलकण्ठस्य कृति स्वोद्धृतमन्त्र-
रामायणव्याख्या मन्त्ररहस्यप्रकाशिकाख्या समाप्तिगमत्” । इस प्रकार
से इन वैदिक मन्त्रों पर इनके द्वारा प्रस्तुत इस व्याख्या का नाम
'मन्त्ररहस्यप्रकाशिका' है। इस प्रकार मन्त्रों के सङ्कलन तथा उन पर
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक की
समस्त कथा को इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान प्रदर्शित किया है। ये
मन्त्र १५७ हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत व्याख्या-स्थलों के कुछ अंशों का
सारांश इस प्रकार—
मन्त्र ७ की व्याख्या यह प्रकट करती है कि वाल्मीकि रामायण
आर्ष काव्य है। महर्षि वाल्मीकि ने वेदों के छन्दों को अनुष्टुप् छन्द में
समन्वित करते हुए प्रायः समस्त रामायण की रचना की है। इसमें वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण माना गया है— अधिकं समस्वरन् श्रुतिं
दिव्यां दृष्टिं वा प्राप्य रम्यं काव्यं कृतवन्त इत्यर्थः । अर्थात् श्रुति के
अनुसार अथवा दिव्य दृष्टि को प्राप्त करके श्री वाल्मीकि के द्वारा रम्य
(रामायण) काव्य की रचना हुई। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण मानकर जिसकी (रामायण की) रचना की
तथा शोक व्यक्त किया ( 'मा निषाद••••' इत्यादि के द्वारा ), एवं श्रुति
अथवा नारदोपदिष्ट महापुरुष ( श्रीराम ) का उन ऋचाओं के अनुरूप
अनुष्टुप् छन्द द्वारा ही संस्मरण कर वर्णन किया, वही श्लोक-रूप से
१. द्रष्टव्य, बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास,
पृष्ठ ७० ।
३० प्रस्तावना
रामायण कहा गया है । यहाँ अनुशरण, शोक और स्मरण, ये तीन
वाल्मीकि रामायण के श्लोकों के श्रुतिमूलक कारण हैं ।
रभसस्येत्यादि मन्त्र में 'दुष्कृत' यह अन्तिम पद है । इसमें बत्तीस
वर्ण हैं । कार्यहानि को देखकर इस मन्त्र के द्वारा शोक व्यक्त है और
शोक के कारण को शाप-रूप प्रतिफल प्राप्त हुआ है । इस मन्त्र का भाव
ही 'मा निषाद.....' इत्यादि श्लोक में व्यक्त हुआ है । यह श्लोक अनुष्टुप्
छन्द में है। इस छन्द में गायत्री और पंक्ति ये दो छन्द सन्निविष्ट हैं।
जगती छन्द के भी आ जाने से यहाँ अनुष्टुप् छन्द ही लिया जायेगा ।
अथवा अनुष्टुप्, त्रिष्टुप् तथा जगती छन्दों के प्रति पादों का सन्निवेश
अनुष्टुप् छन्द में ही हुआ है। अतः सभी छन्दों का मूल अनुष्टुप् छन्द
हुआ। इसी छन्द को प्राचेतस् ऋषि वाल्मीकि ने आदि-काव्य का
आधार बनाकर वेदमूलक रामायण की रचना की है ।
मन्त्र संख्या १० द्वारा यह व्यक्त किया गया है कि वेद का परम
तत्त्व 'ऋत' एवं सत्य है । वाल्मीकि ने रामकथा के रूप में ऋत एवं
सत्य तत्त्व को प्रतिष्ठित करते हुए अनृत एवं असत् तत्त्वों की निन्दा
प्रस्तुत की है । रामायण या रामकथा परम तत्त्व को प्राप्त कराने में
तन्तुरूप से कार्य करती है । विष्णु की स्तुति के लिये प्रयुक्त शब्द (वायु
रूप ) कवियों के जिह्वाग्र में स्थित भोग और मोक्षसाधिका विष्णु की
माया के द्वारा रामकथा के रूप में अत्यन्त विस्तृत है । इस मन्त्र में
'वरुणस्य' के तात्पर्य वरुणपुत्र प्राचेतस् नाम से अभिहित वाल्मीकि ही
हैं। 'धीर' शब्द से भी इन्हीं वाल्मीकि का अभिधान किया गया है।
अतः उन्होंने समग्र रूप से रामकथा का वर्णन किया है।
इसी प्रकार मन्त्र संख्या ३३ को सीता का स्तुति विषयक सिद्ध
किया गया है। 'सीता' शब्द की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए नीलकण्ठ
कहते हैं— "स्यति सर्वेषां रक्षसामन्तं करोतीति सीता", अर्थात् जो
सभी राक्षसों का नाश कर दे वह सीता है। वे आगे कहते हैं— ऐसी
सीता हमारे ऐश्वर्य को बढ़ाती हुई प्रतिपक्ष (अशुभ कर्मों) का नाश
करें ।
मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करके कहते
हैं— "नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति इति न्यायेन त्वयि
प्रस्तावना ३१
वेदार्थानभिज्ञे सति न रामायणमपराद्ध्यति"१ ।
इस प्रकार मन्त्ररामायण के कर्त्ता ने सम्पूर्ण रामकथा तथा इसके
पात्रों का निदर्शन वैदिक वाङ्मय से कराया है ।
इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में रामरक्षास्तोत्र उद्धृत है और उसकी
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थ के प्रयोजन को रामकथा का वेदमूलकत्व
सिद्ध करना ही अभिहित किया गया है । "इसके प्रारम्भ में रामायण के
गायत्री-स्वरूप का उल्लेख है । गायत्रीरामायण, विद्यारण्य कृत
रामायण रहस्य, तत्त्वसंग्रहरामायण, गोविन्दराज-कृत भूषणटीका आदि
रामायण के गायत्री-स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । तर्क यह है कि
रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला
अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है—
‘प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।’
किन्तु वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह
का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता । विद्यारण्य ने वाल्मीकि
रामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्री-स्वरूप कहा है—
“गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम्”२ ।
नीलकण्ठ द्वारा रचित इस ग्रन्थ के विद्वान् सम्पादक डा० राम
कुमार राय हैं। उन्होंने प्रत्येक वैदिक मन्त्र के सन्दर्भ दे दिये हैं, साथ ही
मन्त्ररहस्य-प्रकाशिका व्याख्या के अनुसार उन मन्त्रों का हिन्दी अनु-
वाद भी प्रस्तुत कर दिया है । इससे यह ग्रन्थ अत्यन्त बोधगम्य बन
गया है । मन्त्ररामायण का संस्करण आज से बहुत पहले श्री वेङ्कटेश्वर
स्टीम प्रेस, बम्बई, से मुद्रित हुआ था और यह कार्य इतना पहले हुआ
था कि इसकी प्रतियाँ अत्यन्त दुर्लभ हो गयीं थी तथा विद्वद्वर्ग इसे भूल
सा गया था कि आज से कई शताब्दी पूर्व नीलकण्ठ ने रामकथा अथवा
रामायण की वेदमूलकता प्रतिपादित करने का श्लाघनीय प्रयत्न किया
था । प्रस्तुत संस्करण इस कमी को हटाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका
अदा करेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है ।
आशा है मन्त्ररामायण का यह संस्करण विद्वानों द्वारा आहत होगा ।
वाराणसी, ७ जनवरी १६८८ लक्ष्मीनारायण तिवारी
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ ६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १७४-१७५ ।
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॥ श्रीः ॥
श्रीजानकीवल्लभो जयतितराम्।
अथ मन्त्ररामायणम्
सटीकम् ।
रामायणद्रुमं नौमि रामरक्षानवांकुरम् ।
गायत्रीबीजमाम्नायमूलं मोक्षमहाफलम् ॥१॥
राम रक्षा रूपी नवीन अंकुर वाले, गायत्री बीज वाले, वेदरूपी
मूलवाले और मोक्ष रूपी महान फलवाले रामायण रूपी वृक्ष को मैं
नमस्कार करता हूं ।
ऐसा कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में चौबीस
सहस्र श्लोक गायत्रीमंत्र के २४ अक्षरों के आधार पर संगृहीत किये
हैं । रामायण के वेदत्व के विषय में अगस्त्य संहिता आदि प्रमाण हैं ।
गायत्री मंत्र में सविता देवता की स्तुति की गयी है । सविता को भग-
वान् नारायण की ज्योति भी कहा जाता है । भगवान के नानारूपो
में अवतार लेकर क्रीडा करने वाले रामादि रूपों की रामायण में
उपासना की गयी है और यह आवागमन से रहित कैवल्य की ओर
ले जाने वाला है ।
अत्र रामरक्षायाः रामायणद्रुमांकुरत्वं स्पष्टमवगम्यते, तत्स्थानां राघवा-
दिपदानां क्रमेण रामायणार्थसूचकत्वात् तस्याः गायत्रीबीजत्वं वेदमूलत्वं चोप-
पादनीयम् तेन रामायणस्यापि तदुभयं सिद्धयति । अत एव रामायणे चतुर्विंश-
त्साहस्र्यां चतुर्विंशतिगायत्र्यक्षराणि वाल्मीकिना संगृहीतानीत्यभियुक्तप्रसिद्धं
२ मन्त्ररामायण
संगच्छते । तथा रामायणस्य वेदत्वोक्त्या प्रत्यक्षवेदमूलतत्त्वोपपादकम् 'वेदवेद्ये-
परे पुंसिजाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत्साक्षाद्रामायणात्मना ॥
तस्माद्रामायणं देवि वेद एव न संशयः” इत्यगस्त्यसंहितावचनम् “स तु मेधा-
विनो दृष्ट्वा वेदार्थपरिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥ काव्यं
रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्” इति तस्य वेदोपबृंहणप्रयोजनकत्वं
प्रतिपादयदार्षं वचनं च संगच्छते । तत्र गायत्र्यर्थस्तावत्सवितुः ब्रह्माण्डवृक्ष-
प्रसवभूमेः तत् प्रसवितृरूपं भूर्स्थानीयं वरेण्यं वरणीयं मोक्षकामैर्ब्रह्माण्डवृक्ष-
प्रविलापनेनानुसर्तव्यम् एवं च “तदिति वा एतस्यमहतो भूतस्य नाम भवति”
इति श्रुतेस्तत्पदोदिते ब्रह्मणि सवितृपदेन कार्यमात्रमध्यारोप्य वरेण्यपदेन तदपोद्य
निष्प्रपञ्चं ब्रह्मणः पारमार्थिकं रूपं निरूपितं तथा तस्यैव सवितुर्भर्गः अभिर्गति-
रस्येति व्युत्पत्त्या सूर्यमण्डलान्तःस्थं नारायणाख्यं ज्योतिः “य एषोन्तरादित्ये
हिरण्मयः पुरुषः” इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं मायाविक्षेपमुपास्यं निर्दिष्टं धीमहीत्य-
नेनान्वयात् तथा देवस्येति तस्यैव ब्रह्माण्डान्तर्नानावतारैः क्रीडतो रामकृष्णादि-
रूपं तृतीयं रूपमुक्तं तथा धीमहीति विरोधपूर्वकं स्वार्थमुभयार्थमीश्वरार्थं चेति
चतुर्द्धा भजनं दर्शितं तथा तृतीयपादे बहिर्मुखस्वभावायाबुद्धेः अन्तर्मुखतया
प्रकर्षेण प्रेरणे प्रत्यगात्मप्रधाने कैवल्यरूपेपदस्य हेतुत्वप्रदर्शनेन तस्यैव सकलकर्मो-
पास्तिफलप्रयोजकत्वमुक्तम् एवं च गायत्र्यां काण्डत्रयं दर्शितं तथा च मैत्रायणी-
श्रुतिः— “तत्सचितुर्वरेण्यमित्यसौ वा आदित्यः सविता स वा एवं प्रवरणीय
आत्मकामेनेत्याहुर्ब्रह्मवादिनः” इति । भर्गोदेवस्य धीमहीति सविता वै देवस्त-
तोयोस्य भर्गस्तं चिन्तयामीत्याहुर्ब्रह्मवादिन इति । धियो योनः प्रचोदयादिति
बुद्धयो वै धियस्ता योस्माकं प्रचोदयादित्याहुर्ब्रह्मवादिन.” इति अत्रात्मकामेन
प्रवरणीय इति सवितुः प्रत्यगात्मत्वं ज्ञानकाण्डार्थ उक्तः चिन्तयामीति चिन्ता-
योग्यत्वमुपासनाकाण्डार्थ उक्तः । धिय इत्यनेकाकारधीप्रेरकत्वं कर्मकाण्डार्थ उक्तः
तत्राद्य उपेयः परो सन्निकृष्टविप्रकृष्टौ तत्प्राप्त्युपायौ । एवं वेदमातुर्गायत्र्याः
काण्डत्रयात्मकत्वेन तज्जानां वेदानां तन्मूलकानां रामायणादीनां च तथात्वं
ज्ञेयम् एत एवार्था राघवादिविशतिनामभी रामरक्षायामक्षरार्थद्वारा प्रदर्श्यन्ते ।
तथाहि :—
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ।
कौशल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ॥ १ ॥
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ॥ २ ॥
मन्त्ररामायण ३
मेरे शिर की रक्षा राघव करें, मस्तक की रक्षा दशरथपुत्र करें।
कौशल्यापुत्र मेरे नेत्रों की रक्षा करें। विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानो
की रक्षा करें। यज्ञ के रक्षक मेरी नासिका की रक्षा करें। मुख की
रक्षा सौमित्रिवत्सल करें। जिह्वा की रक्षा विद्यानिधि करें, तथा भरत
से पूजित (राम) मेरे कण्ठ की रक्षा करें।
रंघति नाशं गच्छतीति रघुः व्यष्टिसमष्टिरूपो अन्नमयःकोशःतत्र विदितो
राघवःब्रह्माण्डाभिमानी मम ब्रह्माण्डरूपं शिरः पातु १ स एव दशरथस्य दशभि-
रिन्द्रियाश्वैर्य्युक्तस्य मनोमयकोशरूपस्य आत्मैवात्मा कार्यं प्राणमयः कोशस्तज्जः
तेन अन्नमयादान्तरः प्राणमयः ततोप्यान्तरो मनोमय इति पूर्वयोः प्रविलापनं
सिद्धम्, स च वासनातन्तुसन्तानात्मा मनोमयः ब्रह्माण्डासृष्टिकमेणार्वाचीनं
भालदेशं ब्रह्मलिपिस्यानं मे पातु २ कुशलैव कौशल्या स्वार्थे ष्यञ् सर्वाथाविद्योतन-
समर्थाबुद्धिस्तस्यां भवः कौसल्येयो विज्ञानमयः ततोप्यान्तरः स मम दर्शनसाधने
दृशी पातु एतेन मनोमयस्याप्यपवाद उक्तः ३ । विश्वस्य मित्रं निरुपाधिप्रेम-
गोचरतया प्रेयान् आनन्दमयाख्य आत्मैव विश्वामित्रः तस्यापि प्रियः 'सुषुप्तोसता
सौम्यतदासम्पन्नो भवति' इतिश्रुतेः प्राप्तः सन्नात्यन्तिकदुःखनिवृत्तिकरस्तदधिष्ठान-
भूत आनन्दः पुच्छंब्रह्मापरपर्यायो मम श्रुती स्वाधिगमद्वारभूते पातु तदेवं प्रथमेन
पादेन रामे ब्रह्माण्डमारोप्य अन्यपादनत्रयेणापोह्य च रामस्य शुद्धं रूपं गायत्री-
प्रथमपादोक्तं दर्शितम् अयं चार्थः कृत्स्नोपि वेदान्त प्रसिद्ध इति मूलवाक्यानि
नोदाहृतानि ४। यज्ञत्राता अव्यभिचारेण ऋतुफलप्रदः फलमतउपपत्तेः इति
न्यायादिति भावः । स मे ऋतुफलभूतदिव्यगन्धरसानुपलब्धिकरणं घ्राणरसना-
दिकं पातु ५ सौमित्रिवत्सलः सुष्ठु मित्रं जीवपक्षिणः सखा ईश्वरः तस्यापत्यं
सौमित्रिर्हिरण्यगर्भः तत्र वत्सलः तेन तत्तादात्म्यं प्राप्तानामुपासकानां अनुग्रह-
कर्तेत्युक्तम् सौमित्रेर्मुख्यकार्यत्वात्तद्वत्सलो मे मुखं पातु ६ । तावेतापन्तर्यामिसूत्रा-
त्मानौ विद्यैकलभ्यौ न तु शुष्कतर्कगम्यौ इति विद्यावाप्तिद्वारभूतां मम जिह्वां
विद्यानिधिः विद्यासम्प्रदायप्रवर्त्तकः पातु ७ । विद्यापि यज्ञाद्यपूर्वप्राप्या "विधि-
द्विषन्ति यज्ञेन" इत्यादिश्रुतेः "अतो भरतैः कर्मठैर्वन्दितः शरणीकृतः भरन्ति-
कर्मफलं सञ्चिन्वन्ति ते भरताः यजमानाः भरतमुद्धर' इति मन्त्रलिंङ्गात् यज्ञश्च
कण्ठस्थ्यैरेव मन्त्रैः स्तोत्रशस्त्रादिभिर्निर्वर्त्यत इति यज्ञप्रियो मे मन्त्रोच्चारणस्थानं
कण्ठं पातु तदेवं यज्ञादिजन्येन पुण्येन प्राप्तोपासनामार्गः मगृह्यं सूत्रमीशं वा
क्रममुक्तिद्वारं प्राप्नोतीति श्लोकद्वयतात्पर्यम् ॥८॥१-२॥
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेश कार्मुकः !
"हनुमत्प्रभुः"!
It must say "हनुमत्प्रभुः मे सक्थिनी अङ्कदेशं पातु"!
Yes! It is "हनुमत्प्रभुः मे सक्थिनी"!
Let's check line 23:
"तस्यैव चतुर्द्धा भजनमाह मध्यमिवित।" -> wait, is it "मध्यमिति ।"?
Look at the characters:
म (ma)
ध्य (dhya)
मि (mi)
ति (ti)
It's clearly "मध्यमिति ।"! (The dot inside is just text).
Let's check line 7:
"मानुषभावेऽपि ऐश्वरदिव्यायुधानां शाङ्गादीनां धारित्वादिव्यायुध आयुध-"
Wait, is it "शार्ङ्गादीनां"?
Look above the 'शा': there is a repha 'र्'!
Yes, there is a distinct curved hook above शा: "शार्ङ्गादीनां"!
And after 'धारित्वा': is it 'द्दिव्यायुध' or 'दिव्यायुध'?
It looks like "धारित्वाद्दिव्यायुध" or "धारित्वादिव्यायुध"?
There is a single 'द' with 'ि': "धारित्वादिव्यायुध".
Let's check line 8:
"निधानस्थानभूतो स्कन्धौ मे पातु ९। तथा भुजबलेनैव भग्नेशकार्मु
मन्त्ररामायण ५
देवस्य चतुर्विधं ध्यानं चतुर्विधभक्तकृतं चतुर्थश्लोकेन दर्शितम् ॥ ४ ॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ५ ॥
घुटने की रक्षा समुद्र पर सेतु का निर्माण करने वाले करें । जंघाओं
की रक्षा दशमुख का वध करने वाले करें । पैरों की रक्षा विभीषण
को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले करें और मेरे सम्पूर्ण शरीर की रक्षा
श्रीराम करें ।
अथ व्यष्टिपरीत्या नैनाव्यक्तावलम्बनाया गतेः संसारसमुद्रसेतुरूपायः प्रदाता
सेतुकृत् जानुनी शिशोः प्रथमगतिसाधने मे पातु अनेन स्थूलदेहातिक्रम उक्तः
अस्यामवस्थायां ध्यायी विदेह इत्युच्यते १७ । तथा दश इन्द्रियाणि मुखानि
भोगद्वाराणि यस्य स दशमुखो लिङ्गात्मा तस्यान्तको नाशकः प्रविलापयिता
दशमुखान्तकः ईषद्वद्धोर्द्धगस्य शिशोः मन्दोर्ध्वगतिसाधने जंघे मे पातु, एतेन लिंग-
देहातिक्रम उक्तः अस्यामवस्थायां ध्यायी प्रकृतिलय इत्युच्यते १८ । तथा विगतं
भीषणं भयङ्करमज्ञानं यस्य स विभीषणो निरस्ताविद्यः तस्मै श्रीः 'एषास्य परमा
सम्पत्' । इति श्रुतिप्रसिद्ध आनन्दः तस्याः प्रदाता विभीषणश्रीदो निघृष्टतलतया
शीघ्रगतिहेतू पादौ मे पातु, एतेनानर्थनिवृत्तिपूर्विका आनन्दावाप्तिरुक्ता, अस्या-
मवस्थायां ध्यायी मुक्त इत्युच्यते १९ । रामः सर्वेश्वरतया ब्रह्माण्डमण्डपे रमणशीलो
मम जीवन्मुक्तभावं कामयमानस्य अखिलं वपुस्त्रिविधमपि शरीरं पातु समस्तयोग-
प्रतिपक्षनिरासेन ब्रह्मसाक्षात्कारक्षमं करोत्वित्यर्थः २० । तदेवं ब्रह्मणि राघवपदेना-
ध्यारोपितस्य प्रपञ्चस्य दंशरथात्मजादिपदत्रयेणापादितस्याधिष्ठानं प्राप्तुं ध्याना-
लम्बभूतं भगवतः समष्टिरूपं व्यष्टिरूपं च द्वाभ्यां श्लोकाभ्यां प्रदर्श्य व्यष्ट्युपासनां
चतुर्थेन समष्ट्युपासनां पञ्चमार्थेन च प्रदर्श्य शेषेणानर्थनिवृत्त्यानन्दावाप्ती
जीवन्मुक्तिसहिते निरूपिते इति अर्थश्च कृत्स्नः शास्त्रार्थोस्तीति प्रदर्शनेन रामायण-
द्रुमांकुरस्य रामकवचस्य गायत्रीबीजत्वमुपपादितम् । यथात्र कथांशः स्पष्टं
सूच्यते अध्यात्मांशस्तु परोक्षवृत्त्या गम्यते, एवं रामायणे तन्मूलभूते वेदे च तदुभयं
ज्ञेयम् ॥ ५ ॥
तथा हि :—"मन्त्रह्रदात्कथाकुल्या विद्याकेदारमागता ॥ मोक्ष (रस) स्य
च प्रसूर्मध्ये पीयते कर्ममार्गगैः ॥१॥ इदमाम्नायते—"तुग्रो (ह) भुज्युमश्विनोदमेघे
रयिन्न कश्चिन्ममृवां अवाहाः ॥ तमूहथुनौंभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोद-
काभिः ॥ १ ॥ तुग्रो नाम कश्चिद्राजा भुज्युसंज्ञं स्वपुत्रम् उदमेघे समुद्रे अवाहाः
प्रापितवान् । तत्र दृष्टान्तः—रयिं न कश्चिन्ममृवानिति । यथा कश्चिन्मृतः पुरुषो
रयिं धनं तद्वत् । न शब्दोऽत्र उपमार्थे तं तथाभूतं मां अश्विनौ युवां नौभिः
वह्नीभिर्नौकाभिः उसैन्धम् ऊहथुः तीरं प्रापयामासथुः । कीदृशीभिः- आत्मन्वतीभिः,
आत्मा स्वामी विद्यते यासां ताभिः स्वीयाभिः अन्तरिक्षे गगनतुल्येऽर्णवे प्लवन्ते
ताभिरन्तरिक्षप्रुद्भिः, अपोदकाभिरपगतजलाभिः इत्यश्विदेवत्यैकर्मणि विनि-
युक्तस्यास्य मन्त्रस्य याज्ञिकाभिमतोऽर्थः कर्मसमृद्ध्यर्थः “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं
यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रियमाणमृगभिवदति” इति ब्राह्मणाच्च । तत्कर्मारेवमेवायं
व्याख्येयः । तथा “ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः ।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति यइत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥” इति मन्त्रेण सर्वासा-
मृचां सर्वेन्द्रियदेवताधिष्ठानभूतपरमव्योमशब्दितान्तःकरण
मन्त्ररामायण ७
व्यवस्थाया आवश्यकत्वाच्चान्यदेवतयो मंत्रो रामकथां प्रकाशयितुमीष्टे । अथ
हठात्तत्परत्वं वर्ण्यते तर्हि एकस्य शब्दस्यानेकार्थता स्यात् सा चानिष्टेति चेत् ।
उच्यते यथा एकैव रेखा स्थानभेदात् एकदशशतसहस्रादिव्यपदेशान् लभते
एवमेकमेव पदं वाक्यं वा पदान्तरवाक्यान्तरसमभिव्याहारादनेकमर्थं प्रत्याययति
न च तावतानानार्थत्वं शब्दस्य संभवति, अपि तु वृत्तिभेद एव तथाहि
एकमप्यमृतपदम् “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥” इत्यत्र कैवल्यवाचि “अपाम
सोमममृता अभूम” इत्यत्र देवभाववाचि “प्रजामनुप्रजायसे तदुतेमर्त्यामृतम्
इत्यत्र सन्तानवाचि दृष्टम् । यथा वा “यज्ञेन यज्ञमयजंत देवा”
इति वाक्यम् ‘अवध्नन्पुरुषं पशुम्’ इत्यव्यवहितातीत
पि वैयर्थ्यं स्यात् । तथा सति दृष्टत्वादि मंत्राणामपि तत्कल्प्यं स्यात्तेन बाह्यन्तं
श्रुतिषोडशकर्मकाण्डोच्छेदौ स्यातां तस्मान्मन्त्राणां रामायणमूलत्वे संभवत्यपि
अध्यात्मपरत्वं न युज्यत इति चेत् । न, एकस्मिन्नेव विषये प्रतिपत्तृभेदेन
प्रतिपत्तिभेददर्शनात् । तथाहि एकं रज्जुखण्डं कश्चित्सर्प इति, कश्चिद्दण्ड इति;
कश्चिद्रज्जुरिति प्रत्यक्षेण प्रत्येति । एकं वा घटं कश्चिदसत्त्वेन कश्चिदनिर्वचनीयत्वेन
तर्कवलात्प्रत्येति, तथा “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतम-
भयमेतद् ब्रह्म” इति प्रजापतिवाक्यादेकमेवात्मानं देहादिविशिष्टमेषामृतादि-
गुणभाक्त्वेनविरोचनः प्रतिपेदे इन्द्रस्तु तत एव श्लेषेन देहत्रयातीतं तादृक्त्वेनेति
दृश्यते । यास्कोपि “बहुप्रजा निर्ऋतिमाविवेश” इत्यस्य बहुप्रजाः कृच्छ्रमापद्यत
इतिपरिव्राजकाः, वर्षकर्मेति नैरुक्ता इति एकमेव निर्ऋतिपदं द्वेधा व्याचष्टे ।
वर्षकर्मेत्यस्य व्याख्याभूमिमापद्यत इति तत्रैव ज्ञेयम् । तस्मादस्तिप्रतिपत्ति
भेदादर्थभेदो मंत्राणाम् । अत एव यास्कः स्थालीपुलाकन्यायेन कांश्चिन्मन्त्रान-
धिदैवतमध्यात्मं च व्याख्याय सर्वेषामचेतनदेवतानामभिरध्यात्मपरतया व्याख्यानं
कर्तव्यमित्याशयेनाह-“माहाभाग्याद्देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयत एक-
स्यात्मनोन्ये देवाः प्रत्यंगानि भवन्त्यपि च सत्त्वानां प्रकृतिभिऋषयः स्तुवन्तोत्याहुः
प्रकृतिसार्वनाम्न्याच्चेतरेतरजन्मानो भवन्तीतरेतरप्रकृतयः कर्मजन्मान आत्म-
जन्मानः आत्मैवैषां रथो भवत्यात्माश्वा आत्मायुधमात्मेषवः सर्वं देवस्य देवस्य”
इति । एतदेवाभिप्रेत्य व्यासोपि आश्वमेधिकाध्यात्मे ‘वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता'
इत्यारभ्य ‘ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ ॥ शतक्रतुरदृश्येन वज्रेणेतीह
नः श्रुतम् ॥ इति । अत्र वृत्रशतक्रतुवज्रशब्दानज्ञानजीवविवकेषु प्रयुंक्त ।
वनादिरूपकेण च ब्रह्मान्यरूपयत्तत्रैव क्वचिदधिलोके दृष्टमत्यर्थं मंदाधिकारिणेः-
धिदेवपरतया व्याचष्टे यथोक्तम्-‘के ये ते स्त्रियो ज्ञाता विधाता ये च ते सिनाः
कृष्णाश्च तंतवस्ते रात्र्यहनी इत्यादिना । विद्वांस्तु-“द्वादशारं नहि
तज्जराय वर्वति चक्रं परिद्याममृतस्य ॥ आपुत्राग्नेमिथुनासो अत्र सप्त शतानि
विंशतिश्च तस्थुः” इत्यादीनामृचां संवत्सरोऽहोरात्रपरत्वेनानुवादसरूपत्वं
मा भूदिति इत्थं व्याचक्षते । षाडिन्द्रियाणि षडृतवः ऋतावृतौ द्वौ द्वामासाविव
प्रतीन्द्रियं रागद्वेषौ प्रतिमासं द्वौ पक्षाविव प्रतिरागं प्रतिद्वेषं च पक्षद्वयं यथा
धर्मे रागः शुक्लः अर्थे कृष्णः, एवं धर्मे द्वेषः, कृष्णः, अर्थे शुक्ल इति ।
प्रतिपक्षं पंचदश तिथयः ताश्च सूर्य्यचन्द्रयोः सन्निकर्षविप्रकर्षतारम्याद्भवन्ति
तत्र सूर्य आत्मा चन्द्रः षोडशकला मनोरूपी अहमर्थः कलाश्च प्राणः १ श्रद्धा २
खं ३ वायुः ४ ज्योतिः ५ आपो ६ भूः ७ इन्द्रियम् ८ मनः ९, अन्नम् १०
वीर्य्यम् ११, तपः १२, मंत्राः १३, कर्म १४ लोकाः १५, नाम १६ च ।
ता मंत्रार्थवादैरपि कर्मणि रुच्युत्पादनार्थमनुपपन्नोऽप्यर्थः
प्रजाया अमृतत्वमात्मावपोत्खननमित्यादिरुपन्यस्यते “प्रजामनुप्रजायसे तदु ते
मर्त्यामृतम्” इति, प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत् इति च । एवं च
कर्मस्तवकार्थवादानुसारिभाष्यकारीयं व्याख्यानममुख्यम् । अत एवोक्तं
भारते “इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं
प्रहरेत्” इति तत्र उपबृंहणं नाम एकत्र मन्त्रे तृचे सूक्ते वा दृष्टस्यार्थस्य
संक्षिप्तस्य नानास्थानेषु विप्रकीर्णानां तदनुगुणानामर्थानामुपसंहारेण पुष्टिकरत्वम् ।
तच्च येन कर्ममात्रं न श्रुतं तेन कर्तुमशक्यम्, अतस्तस्मादल्पश्रुताद्वे-
दस्य भयं युक्तम् । भगवानपि “यामिमां पुष्पितां वाचम्” इत्यादिनाऽर्थ-
वादानां मोहकत्वं ब्रुवन् तदनुसारिणो व्याख्यानस्यानादरणीयत्वं दर्शयति