मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ प्रस्तावना
भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ
प्रधान नायक है तथा द्वितीय भाग में दण्डकारण्य तथा रावणवध-
सम्बन्धी कथा मिलती है और इसका मूल स्रोत वेदों की देवता-सम्बन्धी
कथाएँ प्रतीत होती हैं१ ।
श्री बुल्के को डा० याकोबी का मत तर्क-सङ्गत प्रतीत नहीं होता२,
क्योंकि उन्होंने अपने मस्तिक में यह निश्चित धारणा बना ली है कि
रामकथा का कोई वैदिक आधार नहीं है और डा० याकोबी उसका
वैदिक आधारमात्र ही नहीं देते, अपितु यह भी मानते हैं कि ईरानीय
'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूल स्रोत एक ही है। हापकिन्स
के मतानुसार महाभारत के शान्तिपर्व में जो रामकथा प्राप्त होती है,
उससे डा० याकोबी के मत की पुष्टि होती है३ ।
दिनेशचन्द्र सेन भी रामकथा के दो प्रधान मूल स्रोतों की कल्पना
करते हैं और ये दो स्रोत उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के हैं।
प्रथम के अन्तर्गत वे दशरथजातक को रखते हैं तथा द्वितीय के अन्तर्गत
रावण-सम्बन्धी आख्यान को तथा इन दोनों के संयोग से रामकथा की
उत्पत्ति को प्रस्तुत करते हैं४ । पर इनके विचार भी श्री वेबर की भाँति
ही हैं जिनके विरुद्ध पूर्व में तर्क प्रस्तुत किये जा चुके हैं और यह प्रदर्शित
किया जा चुका है कि युद्धकथा के रूप में दशरथजातक के पूर्व ही
रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। रावण-सम्बन्धी स्वतन्त्र आख्यानों को
सिद्ध करने के लिये सेन ने बौद्ध तथा जैन वाङ्मय का सहारा लिया
है, जिनके विषय में यह कहा जा सकता है कि उन स्रोतों के बहुत ही
पूर्व रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। साथ ही बौद्धों तथा जैनों में
रामकथा के प्रति कोई गौरवबुद्धि नहीं थी और वे उसे अपने अनुसार
तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना चाहते थे ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि रामकथा के मूल स्रोत के रूप में वैदिक
वाङ्मय को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं दृष्टिगोचर होती ।
वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का उपबृंहण मानते हैं। उनकी यह
स्पष्टोक्ति है—
१. द्रष्टव्य, हर्मन याकोबो, दास रामायण, पृष्ठ ८६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १०५ ।
३. वहीं, पृष्ठ १०६ । ४. वहीं, पृष्ठ १०८ ।