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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

प्रस्तावना २५
“रामायणं महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम् ।
सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम्” ॥ ( १।१६ )
अर्थात् रामायण नामक महाकाव्य समस्त वेदों की सम्मति के अनुकूल
है। वह समस्त पापों का नाश तथा दुष्ट ग्रहों की बाधा का निवारण
करने वाला है।
यही सिद्धान्त मन्त्ररामायण द्वारा भी स्थापित किया गया है जिस
पर हम नीचे स्वतन्त्र रूप से विचार प्रस्तुत करेंगे। “गाथानृतं नारा-
शंसी” उल्लेख जो काठकसंहिता ( १४।५ ) में है उसका तात्पर्य यही है
कि ये वेदरूप ही हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूपी मन्त्र
नाराशंसी होते हैं; नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब
सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं, इसीलिये स्वार्थ में ये
अनृत कहे जाते हैं, अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य
नहीं होता है। ये भी अपौरुषेय ही होते हैं। सिद्धान्तभूत गाथाएँ अनृत
नहीं हैं। यतः वेदों में वास्तविक इतिहास या किसी घटना का उल्लेख
मानने से वेद की अपौरुषेयता भङ्ग होती है, अतः वहाँ विद्यमान घटना-
सम्बन्धी गाथाएँ गुणवाद तथा अर्थवादमात्र मानी जाती हैं। उनका
तात्पर्य ही सत्य होता है और उनका वाच्यार्थ अनृत है, यही ‘गाथा-
नृतम्’ कहने का अभिप्राय है।
मन्त्ररामायण : भारतीय सनातन परम्परा में वाल्मीकि रामायण
तथा पुराणों आदि का प्रामाण्य उनके वेदमूलक होने के ही कारण है
और उन सभी को यह परम्परा वेद के व्याख्यान-स्वरूप में ही मानती
है। भारतीय परम्परा के मनु तथा व्यास आदि के मतानुसार वेद
अनादि माने जाते हैं तथा आधुनिक इतिहासकार भी वेद को संसार
की सबसे प्राचीन पुस्तक के रूप में ग्रहण करते हैं। वाल्मीकि रामायण
का स्पष्ट उद्घोष है—
“कुशीलवौ तु धर्मज्ञो राजपुत्रौ यशस्विनौ ।
भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥
स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥
काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।
पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः” ॥ (वा.रा. १।४।५-७)