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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

२२ प्रस्तावना

च"१। इस प्रकार निरर्थक प्रलाप के अन्तर्गत भारतयुद्ध-कथा (महा-
भारत-कथा) तथा सीताहरण-कथा (रामायण-कथा) को अट्ठकथाकार
बुद्धघोष ने रखा है। आगे चलकर मध्यम शील के वर्णन के अन्तर्गत
यह आया है कि जिस प्रकार अन्य श्रमण तथा ब्राह्मण इस प्रकार की
व्यर्थ अथवा तिरश्चीन कथाओं में लगे रहते हैं, जैसे— राजकथा,
चोरकथा, महामात्यकथा, सेनाकथा, भयकथा, युद्धकथा....आदि; उस
प्रकार से श्रमण गोतम ऐसी व्यर्थ कथाओं में नहीं लगा रहता। अतः
लोग उसकी प्रशंसा करते हैं२। यहाँ पर हम देखते हैं कि इस सन्दर्भ
में 'युद्धकथा' शब्द आया है। 'सुमङ्गलविलासिनी' में ही इसकी
व्याख्या आचार्य बुद्धघोष इस प्रकार से करते हैं— "युद्धे पि भारत-
युद्धादीसु असुकेन असुको एवं मारितो एवं विद्धो ति कामस्सादवसेन
कथा तिरच्छानकथा"३। 'सुमङ्गलविलासिनी' के थाई (स्यामी)
संस्करण में 'भारतयुद्धादीसु' के स्थान पर 'भारतरामायुद्धादीसु' पाठ
है४ जो स्पष्ट रूप से महाभारत-कथा तथा रामायण-कथा इन दोनों की
ओर इङ्गित करता है।
भारतीय वाङ्मय के प्रसिद्ध इतिहास-लेखक विन्टरनित्स ने यह
स्थापना करते हुए कहा कि बौद्ध पालि त्रिपिटक में महाभारत अथवा
रामायण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उसी स्थल पर यह पाद-टिप्पणी दे
दी है कि 'युद्धकथा' का अर्थ अथवा अभिप्राय यदि रामायण अथवा
महाभारत प्रारम्भिक त्रिपिटक युग में ही अभिप्रेत होता तो मूल में ही
इन दोनों नामों का उल्लेख होता और मात्र युद्धकथा कह कर न छोड़
दिया जाता५। पर उनका यह कथन पूर्णतया भ्रान्ति-युक्त एवं निरर्थक
है, क्योंकि ऐसा न करने का तो कारण स्वयमेव स्पष्ट ही है कि उक्त
बौद्ध कथन में इन विशिष्टकथाओं के प्रति किसी भी प्रकार के आदर-
भाव की सम्भावना ही नहीं है। जिसे निरर्थक प्रलाप अथवा तिरश्चीन


१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६३-६४।
२. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६।
३. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ १०७।
४. वहीं।
५. द्रष्टव्य, एम० विन्टरनित्स, हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर,
भा० १, पृष्ठ ४७१, टि० ४।