मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ प्रस्तावना
अर्थात् राजकुमार कुश और लव दोनों भाई धर्म के ज्ञाता और
यशस्वी थे । उनका स्वर बड़ा ही मधुर था और वे मुनि के आश्रम पर
ही रहते थे । उनकी धारणा-शक्ति अद्भुत थी और वे दोनों ही वेदों में
पारङ्गत हो चुके थे । भगवान् वाल्मीकि ने उन्हें मेधावी देख कर वेदार्थ
का विस्तारपूर्वक ज्ञान कराने के लिये उन्हें सीता के चरित्र से युक्त
सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्य का, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्य-
वध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया ।
इस उद्धरण से यह पूर्णरूप से स्पष्ट है कि वेदार्थ के विस्तार के लिये
ही रामायण की रचना हुई । मन्त्ररामायण में भी वाल्मीकि रामायण
के इस वचन को उद्धृत करने के साथ ही अगस्त्यसंहिता के वचन को
उद्धृत करते हुए इसके लेखक नीलकण्ठ कहते हैं—"तथा रामायणस्य
वेदत्वोक्त्या प्रत्यक्षवेदमूलतत्त्वोपपादकम्—
"वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।
तस्माद्रामायणं देवि वेद एव न संशयः" ॥
इत्यगस्त्यसंहितावचनम्....१ ।
अर्थात् यह अगस्त्यसंहिता का वचन है कि वेदवेद्य परमात्मा जब
दशरथनन्दन राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी रामायण के
रूप में महर्षि प्राचेतस के मुख से अवतीर्ण हुए । इसलिये हे देवि, इसमें
संशय नहीं कि रामायण वेद ही है ।
इससे यह स्पष्ट है कि नीलकण्ठ के समय में भी रामायण अथवा
रामकथा के वेदमूलकत्व के सन्दर्भ में प्रश्न उपस्थित हुआ था और इसके
समाधान के लिये अर्थात् रामकथा की वेदमूलकता सिद्ध करने के लिए
उन्हें मन्त्ररामायण नामक ग्रन्थ की रचना करनी पड़ी ।
मन्त्ररामायण के रचयिता नीलकण्ठ का पूरा नाम नीलकण्ठ
चतुर्धर (आधुनिक भाषा में चौधरी) है। ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण विद्वान्
थे । इनके पिता का नाम गोविन्द सूरी तथा माता का नाम फुल्लाम्बिका
था और गोदावरी पर स्थित कूर्परग्राम के ये निवासी थे । आजकल
यह स्थान बम्बई राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित है और इसका
आधुनिक नाम कोपरगांव है । वहाँ से आकर ये काशी में बस गये और
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ २ ।