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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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प्रस्तावना २३
कथा कहा जा रहा हो, उसके प्रति गौरवबुद्धि कैसे हो सकती है और
ऐसा न होने पर मूल में इनके नामोल्लेख करने का प्रसङ्ग ही नहीं
उठता।
यदि यह प्रश्न उठाया जाय कि आचार्य बुद्धघोष का समय पांचवी
शताब्दी है और उस समय तक रामायण तथा महाभारतादि ग्रन्थों की
प्रतिष्ठा हो चुकी थी, अतएव उनके द्वारा इस प्रकार का व्याख्यान
प्रस्तुत हुआ, तो इसका उत्तर यह है कि बौद्ध परम्परा यह मानती है
कि सम्राट् अशोक से पूर्व हुई बौद्ध सङ्गीतियों में मूल पालि त्रिपिटक के
साथ उसको अट्ठकथाओं का भी सङ्गायन हुआ था और अशोक के समय
पाटलिपुत्र में हुई तृतीय सङ्गीति के सन्दर्भ में अशोक के पुत्र महेन्द्र
अपने साथ मूल त्रिपिटक तथा उसकी अट्ठकथाओं को सिंहल द्वीप ले
गये थे। कालान्तर में उनका सिंहली अनुवाद प्रस्तुत किया गया और
बाद में आगे चल कर आचार्य बुद्धघोष ने इनका सिंहली भाषा से
पालि अथवा मागधी भाषा में अनुवाद-मात्र किया, कोई नवीन रचना
नहीं की। 'सुमङ्गलविलासिनी' के प्रारम्भ में ही आचार्य बुद्धघोष ने
इस तथ्य को प्रकट किया है¹।
इस प्रकार दशरथजातक से स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख युद्धकथा
के रूप में स्वयं त्रिपिटक में प्राप्त है। दशरथजातक तो स्वयं ही अट्ठकथा
का भाग है। जातक की मात्र गाथाएँ मूल त्रिपिटक का भाग मानी
जाती हैं, शेष कथा अट्ठकथा में दी गयी है। अतः ऊपर दिये गये 'युद्ध-
कथा' शब्द तथा उसके व्याख्यान के सन्दर्भ में डा० वेबर का सिद्धान्त
खण्डित हो जाता है कि दशरथजातक मात्र में रामकथा का मूल स्रोत
सुरक्षित है। युद्धकथा का सन्दर्भ यह व्यक्त करता है कि राम-रावण के
युद्ध की कथा रूप में रामकथा की प्रतिष्ठा समाज में उस समय हो चुकी थी
और काफी समय तक रामकथा अथवा इस कथा को व्यक्त करने वाले
काव्य को सीताहरण कहा जाता रहा। अतः सीताहरण तथा रावण
युद्ध की ओर पूर्व में ही 'युद्धकथा' से निदर्शन विद्यमान रहने के कारण
होमर के काव्य से इसके आने का प्रश्न ही नहीं उठता।
डा० याकोबी भी वेबर की भाँति ही रामकथा को दो भागों में
बाँट कर उसके दो आधारों को स्थापित करते हैं। उनके अनुसार प्रथम
१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३।