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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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प्रस्तावना २७
यहीं पर इन्होंने महाभारत पर अपनी प्रख्यात टीका 'भारतभावप्रदीप'
की रचना की, जो विद्वानों में नीलकण्ठी के नाम से विख्यात है। इस
टीका को उन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में लिखा था¹।
महाभारत पर लिखी गयी अपनी इस प्रसिद्ध टीका के प्रारम्भ में
ही उन्होंने यह व्यक्त किया है कि इसके लिखने के पूर्व देश के विभिन्न
भागों से उन्होंने मूल ग्रन्थ महाभारत की अनेक पाण्डुलिपियों को
मँगाया था और उन्हें देखते हुए ही मूल के सर्वोपयुक्त पाठ का निर्धारण
किया था, साथ ही इस सन्दर्भ में प्राचीन व्याख्याकारों की व्याख्याओं
का भी अनुसरण किया था—
“बहून् समाहृत्य विभिन्नदेश्यान् कोशान् विनिश्चित्य च पाठमग्र्यम् ।
प्राचां गुरूणामनुसृत्य वाचम् आरभ्यते भारतभावदीपः”² ॥
इस सन्दर्भ में स्थान-स्थान पर वे पाठ-भेदों की ओर तथा अनेक
पाण्डुलिपियों में प्राप्त अधिक पाठ की ओर इङ्गित करते हैं और ऐसा
लगभग १२५ स्थानों में हुआ है। आज भी विभिन्न पाण्डुलिपियों का
परीक्षण करने पर पाठ-भेदों के सम्बन्ध में हमें वही सामग्री प्राप्त
होती है, जिसका निदर्शन इन्होंने अपनी टीका में किया है। इन पाठ-
भेदों के सम्बन्ध में अपने से पूर्व विद्यमान टीकाकारों की टीकाओं के
उद्धरण भी प्रमाण-स्वरूप ये उद्धृत करते हैं और यह इनका वैशिष्ट्य
महाभारत के प्रचलित मूल ग्रन्थ के सम्बन्ध में सूचना प्रस्तुत करने की
दिशा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भण्डारकर ओरियन्टल इन्स्टीट्यूट,
पूना, से प्रकाशित महाभारत में नीलकण्ठ द्वारा उद्धृत ऐसे पाठों को
पाद-टिप्पणी में दिया गया है और ये पर्याप्त संख्या में हैं। विभिन्न पर्वों
पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत करने के प्रसङ्ग में इन्होंने अपने से पूर्व
टीकाकारों में से देवबोध, विमलबोध, अर्जुन मिश्र, रत्नगर्भ तथा
सर्वज्ञनारायण आदि का नामोल्लेखपूर्वक स्मरण करते हुए उनके द्वारा
स्वीकृत मूल के पाठों को उद्धृत किया है—जैसे-महाभारत के
१।१५८।१४ पर व्याख्या करते हुए ये लिखते हैं—
१. द्रष्टव्य, आदिपर्वन्, वी० एस० सुकथंकर द्वारा सम्पादित,
पूना, प्रोलोगोमेना, पृष्ठ ६५ ।
२. वहीं।