सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

प्रथम काण्ड: बालकाण्ड एवं अयोध्याकाण्ड मन्त्र-रहस्य

प्रस्तावना १७
सीता के उल्लेख पर विचार करते हुए श्री बुल्के ने वैदिक वाङ्‌मय
से उद्धरण प्रस्तुत करते हुए इस नाम के वर्णन को अर्थ की दृष्टि से दो
कोटियों में रखा है—पहली कोटि में सीता-सावित्री उपाख्यान है जो
हमें तैत्तिरीय ब्राह्मण में प्राप्त होता है और दूसरी कोटि में 'सीता'
शब्द का प्रयोग जो लाङ्गल-पद्धति के अर्थ में वैदिक वाङ्‌मय के कई
स्थलों में हुआ है, दिया गया है।१ संक्षेप में श्री बुल्के के इस कथन की
आलोचना देनी समीचीन प्रतीत होती है।
कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीय ब्राह्मण (२।३।१०) में जो सीता-सावित्री
उपाख्यान है, वह श्री बुल्के के अनुसार काम्य प्रयोग का प्रभाव दिखलाने
के उद्देश्य से ही उद्धृत किया गया है।२ यह उपाख्यान सीता-सावित्री
तथा सोम राजा से सम्बन्धित है और इसमें सीता और श्रद्धा दोनों
प्रजापति की पुत्रियाँ मानी जाती हैं। इस उपाख्यान में सीता सोम
राजा के प्रेम को स्थागर नामक अङ्गराग के द्वारा प्राप्त करती हैं। इस
कथा का मूल रूप श्री बुल्के के अनुसार ऋग्वेद के सूर्या सूक्त में विद्यमान
है और उनकी मान्यतानुसार यह ऋग्वेद के ऐतरेयब्राह्मण तथा
कौषितकीब्राह्मण, तैत्तिरीयसंहिता, काठकसंहिता तथा मैत्रायणीसंहिता
में भी है। तैत्तिरीयसंहिता में इस कथा का कुछ परिवर्तित रूप प्राप्त
होता है जो श्री बुल्के के ही शब्दों में इस प्रकार है—"प्रजापति ने सोम
राजा की और इसके पश्चात् तीनों वेदों की सृष्टि की थी। सोम राजा
ने इन (वेदों) को हस्तगत किया। सीता-सावित्री सोम राजा को
(पतिस्वरूप) चाहती थीं, (लेकिन) वह (सोम राजा) श्रद्धा
(सीता की बहन) को चाहते थे। सीता ने अपने पिता प्रजापति के
पास जाकर कहा, 'आपको नमस्कार, मैं आपके पास आयी हूँ और
आपकी शरण लेती हूँ, मैं सोम राजा को पतिरूप में चाहती हूँ; परन्तु
वे श्रद्धा को चाहते हैं।' प्रजापति ने उसके लिये स्थागर नामक अङ्गराग
तैयार किया और पूर्व दिशा की ओर दस होतृ-मन्त्र पढ़कर, दक्षिण
की ओर चार होतृ-मन्त्र, पश्चिम की ओर पाँच होतृ-मन्त्र, उत्तर की ओर
छह होतृ-मन्त्र, ऊपर की ओर सात होतृ-मन्त्र पढ़कर तथा सम्भार-
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ७-२३।
२. वहीं, पृष्ठ ७।

१८ प्रस्तावना
मन्त्रों और पत्नी-मन्त्रों से उस अङ्गराग को अभिमन्त्रित कर सीता का
मुख उन्होंने अलंकृत किया और इसके अनन्तर वह सोम राजा के पास
गयी। सीता को देखकर सोम राजा ने कहा कि मेरे पास आइये।
सीता ने कहा कि 'मैं आपके पास आती हूँ, परन्तु आप प्रतिज्ञा करें कि
मुझसे सम्बन्ध रखेंगे और आपके हाथ में जो है, उसे मुझे दे दीजिए।'
सोम राजा ने सीता को तीनों वेद दे दिये' ।१ इसके बाद इस अङ्गराग
की महिमा तथा इसके प्रयोग का वर्णन है।
इस उपाख्यान तथा वाल्मीकि रामायण के सम्बन्ध में श्री बुल्के का
तर्क है कि “सीता-सावित्री आदि कथाओं का इससे कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध
नहीं है, फिर भी सम्भव है कि अनसूया के अङ्गराग का वृत्तान्त इस
उपाख्यान से प्रभावित हो जो वाल्मीकि रामायण के २।११८।२० तथा
अध्यात्म रामायण के २।६।८६ में प्रस्तुत हुआ है। उनके अनुसार
गोस्वामी तुलसीदास जी भी तैत्तिरीयब्राह्मण के उपर्युक्त उपाख्यान से
परिचित थे और उन्होंने सीता की मर्यादा के विरुद्ध समझ कर इस
अङ्गराज की चर्चा नहीं की....”२ आदि।
श्री बुल्के की ऊपरिस्थित अङ्गराग-सम्बन्धी चर्चा का पूर्णरूपेण
उल्लेख करते हुए स्वामी करपात्री जी ने भारतीय परम्परा की दृष्टि से
इसकी आलोचना की है जिसे उन्हीं के शब्दों में नीचे प्रस्तुत किया जा
रहा है जिससे विद्वत् समाज उसके सम्बन्ध में उनकी दृष्टि को भी
जान ले—
“यहाँ बुल्के साहब ने तैत्तिरीयब्राह्मण में वर्णित सीता-सावित्री के
मन्त्राभिमन्त्रित स्थागर (अङ्गराग) से वाल्मीकि रामायण और
अध्यात्म-रामायण में उल्लिखित अङ्गराग की भिड़न्त भिड़ाकर स्थागर
का विकास इस रूप में माना है और तुलसीदास जी ने जान बूझकर
यह छिपा लिया, ऐसा बतलाया है। परन्तु यह कथन अयथार्थ है,
क्योंकि जो बात वाल्मीकि-रामायण और आध्यात्म-रामायण दोनों में
हो, महात्मा तुलसीदास उसका अपलाप नहीं कर सकते। अतः उनके
‘दिव्य वसन भूषण’ शब्द से अङ्गराग भी समझ लेना चाहिये। यहाँ
१. वहीं, पृष्ठ ८-६।
२. वहीं पृष्ठ ६।

प्रस्तावना १६
एक बात और ध्यान देने योग्य है, वह यह कि ऋषि सर्वज्ञकल्प होते
हैं, अतः स्वतन्त्र रूप से अनसूया-समर्पित अङ्गराग दिव्य वसन-भूषण
आदि का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने उल्लेख किया है। संसार में समान-
रूप से मिलती-जुलती अनेक घटनाएँ हो सकती हैं, अतः यह आवश्यक
नहीं कि सावित्री सीता द्वारा प्राप्त अङ्गराग का ही यहाँ आवर्तन किया
जाय । अतएव प्रजापति द्वारा सूर्या को दत्त अङ्गराग अन्य वस्तु है
और अनसूया द्वारा सीता को प्रदत्त अङ्गराग अन्य वस्तु । सावित्री
सीता का स्थागर केवल मुखलेप है तथा अनसूया द्वारा सीता के लिये
दी गयी वस्तु अङ्गराग है। मुखलेप.वशीकरण के लिये है, यह केवल
स्वाभाविक सौन्दर्य का अभिव्यञ्जक है और अङ्गराग सर्वाङ्ग-विलेपन
है, इसके साथ दिव्य मालाएँ, वस्त्र एवं आभूषण भी हैं....।"१
उपर्युक्त के अतिरिक्त 'सीता' शब्द का प्रयोग काठकसंहिता
(२०।३), कपिष्ठलसंहिता (३२।५-६), मैत्रायणीसंहिता (३।२।४-५)
तथा तैत्तिरीयसंहिता (५।२।५।५) में तथा शतपथब्राह्मण (१३।८।२।
६-७) आदि में हुआ है और यह पाश्चात्त्य विद्वानों की दृष्टि से लाङ्गल-
पद्धति के विषय में है२ । वे मानते हैं कि उन स्थलों पर सीता के
व्यक्तित्व का आरोप विद्यमान नहीं है। तथा इससे सीता को कृषि की
अधिष्ठात्री देवी के रूप में लिया जा सकता है३ । सीता की प्रार्थना
अथर्ववेद (३।१७।१) में विद्यमान है। इसकी अधिकांश सामग्री
ऋग्वेद के दो सूक्तों से ली गयी है। परन्तु यदि इन मन्त्रों पर हम
विचार करें तो यह लाङ्गलपद्धति-मात्र की स्तुति नहीं है—
“सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव ।
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥
(अथ० सं० ३।१७।८)
अर्थात् हे सीते, हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। हे सुन्दर भाग्यवाली
सीताभिमानिनी देवी, आप हमारे वैसे अभिमुख हों, जिस प्रकार से
हमलोगों के प्रति सुन्दर मनवाली हों एवं जिससे हमलोगों को शोभन
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायण-मीमांसा, पृष्ठ २६-३० ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ७ ।
३. वहीं, पृष्ठ ११-२३ ।

२० प्रस्तावना
फल देनेवाली हो । यह मात्र लाङ्गलपद्धतिमात्र की स्तुति नहीं हो
सकती१। क्या हम इसमें महाशक्ति की अभिव्यञ्जना नहीं पाते ? एक
प्रकार से इन सबके द्वारा इसमें आह्लादिनी सर्वशक्तिस्वरूपा तेजोमयी
शक्ति का निरूपण निर्देशित है। छान्दोग्य उपनिषद् (७।१।४) में
कहा गया है कि "इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः"। इसके अनु-
सार इतिहास पुराणादि भी वेद की कोटि में ही आ जाते हैं।
जहाँ तक वेदों के तात्पर्य का प्रश्न है, यह परब्रह्म परमेश्वर में ही
है। साथ ही अधिकांश मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्वारा कर्मकाण्ड और
उपासनाओं का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार ब्रह्म निर्गुण तथा
निराकार है, वैसे ही वह अचिन्त्य सौन्दर्य तथा माधुर्य आदि से पूर्ण
साकार रूप में भी वर्णित है। वह अपने लिये भी श्रीविग्रह का निर्माण
कर सकता है। अतएव यजुर्वेदसंहिता (५।२०) में निम्नाङ्कित मन्त्र
आता है—
"प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥
विद्वानों के अनुसार यहाँ पर आये 'भीमो मृगः' से नृसिंहावतार
का निदर्शन है तथा 'कुचरः' से भूमिचारी राम, कृष्ण आदि का अव-
तार इङ्गित है और 'त्रिषु विक्रमणेषु' से वामनावतार सूचित है। इस
प्रकार से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह नहीं कहा जा सकता
कि वैदिक वाङ्मय में रामकथा का निदर्शन नहीं है२।
रामकथा की उत्पत्ति के सन्दर्भ में भी विभिन्न मत विद्वानों ने
प्रस्तुत किये हैं और इस सन्दर्भ में उन पर संक्षेप में विचार प्रस्तुत
करना समीचीन ज्ञात होता है। डा० वेबर की मान्यता है कि रामकथा
का मूल रूप दशरथजातक में सुरक्षित है तथा इसमें सीताहरण तथा
रावण युद्ध का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है; अतः सीताहरण वाले इस
अंश का मूलस्रोत सम्भवतः होमर का काव्य है जिसमें पैरिस द्वारा
हेलेन का हरण वर्णित है और लङ्का-युद्ध का आधार है यूनानी सेना
द्वारा त्राय का अवरोध३ ।
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ २३ ।
२. वहीं, पृष्ठ ३६-३७ ।
३. द्रष्टव्य, ए० वेबर, आन दि रामायण, पृष्ठ ११ आदि ।

प्रस्तावना २१
किन्तु आज तक इस विषय पर आलोचना तथा समीक्षा करनेवाले
किसी विद्वान् ने इस विषय पर इस दृष्टि से विचार करने का कष्ट नहीं
किया कि क्या दशरथजातक से भी पूर्व बौद्ध पालि त्रिपिटक में राम-
कथा की ओर संकेत है और उसके परिप्रेक्ष्य में दशरथजातक की स्वयं
क्या स्थिति होती है और कालक्रम का क्या प्रश्न उपस्थित होता है।
अतः इस संकेत के सन्दर्भ में इस पूरे प्रकरण पर पुनः विचार
अपेक्षित है।
त्रिपिटक के सुत्तपिटक के दीघनिकाय नामक प्रथम निकाय का
प्रथम सुत्त 'ब्रह्मजालसुत्त'१ है। इसमें भगवान् बुद्ध ने भिक्षुको को
निरर्थक प्रलाप तथा युद्ध-कथा की चर्चा करने से मना किया है। प्रसङ्ग
यह है कि एक बार भगवान् बुद्ध भिक्षु-सङ्घ के साथ राजगृह से नालन्दा
जा रहे थे और उस समय सुप्रिय परिव्राजक भी अपने शिष्य ब्रह्मदत्त के
साथ उसी मार्ग पर आरूढ़ था। सुप्रिय अनेक प्रकार से बुद्ध, धर्म तथा
सङ्घ की निन्दा कर रहा था तथा ब्रह्मदत्त इसके विपरीत प्रशंसा।
रास्ते में रात को बुद्ध एक स्थान पर ठहर गये और सुप्रिय तथा
ब्रह्मदत्त भी वहाँ ठहरे और वे दोनों उसी प्रकार से चर्चा में लिप्त
रहे। भिक्षुओं ने इस सम्बन्ध में जब बुद्ध से प्रश्न किया तो उन्होंने
उत्तर दिया कि शीलवान् होने के कारण सामान्य जन उनकी प्रशंसा
करते हैं। बुद्ध ने उस समय शील की व्याख्या इसे प्रारम्भिक, मध्यम
तथा महाशील में करके की और प्रारम्भिक शील के अन्तर्गत जीव-
हिंसा, चोरी, अब्रह्मचर्य आदि से विरत रहने को परिगणित करते हुए
कहा कि इन सबसे विरत रहने के कारण ही सामान्य जन उनकी
प्रशंसा करते हैं। आगे उन्होंने 'सम्पप्पलाप', अर्थात् निरर्थक प्रलाप
से विरत रहने का उल्लेख किया२। इस 'सम्पप्पलाप' पद की व्याख्या
दीघनिकाय की अट्ठकथा (अर्थकथा) 'सुमङ्गलविलासिनी' में आचार्य
बुद्धघोष ने इस प्रकार से की है- "अनत्थविज्ञापिका कायवचीपयोग-
समुट्ठापिका अकुसलचेतना••••सम्पप्पलापो••••तस्स द्वे सम्भारा-भारत-
युद्ध-सीताहरणादिनिरत्थककथापुरक्खारता, तथारूपी कथाकथनं
१. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३-४० ।
२. वहीं, पृष्ठ ३-६ ।

२२ प्रस्तावना

च"१। इस प्रकार निरर्थक प्रलाप के अन्तर्गत भारतयुद्ध-कथा (महा-
भारत-कथा) तथा सीताहरण-कथा (रामायण-कथा) को अट्ठकथाकार
बुद्धघोष ने रखा है। आगे चलकर मध्यम शील के वर्णन के अन्तर्गत
यह आया है कि जिस प्रकार अन्य श्रमण तथा ब्राह्मण इस प्रकार की
व्यर्थ अथवा तिरश्चीन कथाओं में लगे रहते हैं, जैसे— राजकथा,
चोरकथा, महामात्यकथा, सेनाकथा, भयकथा, युद्धकथा....आदि; उस
प्रकार से श्रमण गोतम ऐसी व्यर्थ कथाओं में नहीं लगा रहता। अतः
लोग उसकी प्रशंसा करते हैं२। यहाँ पर हम देखते हैं कि इस सन्दर्भ
में 'युद्धकथा' शब्द आया है। 'सुमङ्गलविलासिनी' में ही इसकी
व्याख्या आचार्य बुद्धघोष इस प्रकार से करते हैं— "युद्धे पि भारत-
युद्धादीसु असुकेन असुको एवं मारितो एवं विद्धो ति कामस्सादवसेन
कथा तिरच्छानकथा"३। 'सुमङ्गलविलासिनी' के थाई (स्यामी)
संस्करण में 'भारतयुद्धादीसु' के स्थान पर 'भारतरामायुद्धादीसु' पाठ
है४ जो स्पष्ट रूप से महाभारत-कथा तथा रामायण-कथा इन दोनों की
ओर इङ्गित करता है।
भारतीय वाङ्मय के प्रसिद्ध इतिहास-लेखक विन्टरनित्स ने यह
स्थापना करते हुए कहा कि बौद्ध पालि त्रिपिटक में महाभारत अथवा
रामायण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उसी स्थल पर यह पाद-टिप्पणी दे
दी है कि 'युद्धकथा' का अर्थ अथवा अभिप्राय यदि रामायण अथवा
महाभारत प्रारम्भिक त्रिपिटक युग में ही अभिप्रेत होता तो मूल में ही
इन दोनों नामों का उल्लेख होता और मात्र युद्धकथा कह कर न छोड़
दिया जाता५। पर उनका यह कथन पूर्णतया भ्रान्ति-युक्त एवं निरर्थक
है, क्योंकि ऐसा न करने का तो कारण स्वयमेव स्पष्ट ही है कि उक्त
बौद्ध कथन में इन विशिष्टकथाओं के प्रति किसी भी प्रकार के आदर-
भाव की सम्भावना ही नहीं है। जिसे निरर्थक प्रलाप अथवा तिरश्चीन


१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६३-६४।
२. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ६।
३. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ १०७।
४. वहीं।
५. द्रष्टव्य, एम० विन्टरनित्स, हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर,
भा० १, पृष्ठ ४७१, टि० ४।

प्रस्तावना २३
कथा कहा जा रहा हो, उसके प्रति गौरवबुद्धि कैसे हो सकती है और
ऐसा न होने पर मूल में इनके नामोल्लेख करने का प्रसङ्ग ही नहीं
उठता।
यदि यह प्रश्न उठाया जाय कि आचार्य बुद्धघोष का समय पांचवी
शताब्दी है और उस समय तक रामायण तथा महाभारतादि ग्रन्थों की
प्रतिष्ठा हो चुकी थी, अतएव उनके द्वारा इस प्रकार का व्याख्यान
प्रस्तुत हुआ, तो इसका उत्तर यह है कि बौद्ध परम्परा यह मानती है
कि सम्राट् अशोक से पूर्व हुई बौद्ध सङ्गीतियों में मूल पालि त्रिपिटक के
साथ उसको अट्ठकथाओं का भी सङ्गायन हुआ था और अशोक के समय
पाटलिपुत्र में हुई तृतीय सङ्गीति के सन्दर्भ में अशोक के पुत्र महेन्द्र
अपने साथ मूल त्रिपिटक तथा उसकी अट्ठकथाओं को सिंहल द्वीप ले
गये थे। कालान्तर में उनका सिंहली अनुवाद प्रस्तुत किया गया और
बाद में आगे चल कर आचार्य बुद्धघोष ने इनका सिंहली भाषा से
पालि अथवा मागधी भाषा में अनुवाद-मात्र किया, कोई नवीन रचना
नहीं की। 'सुमङ्गलविलासिनी' के प्रारम्भ में ही आचार्य बुद्धघोष ने
इस तथ्य को प्रकट किया है¹।
इस प्रकार दशरथजातक से स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख युद्धकथा
के रूप में स्वयं त्रिपिटक में प्राप्त है। दशरथजातक तो स्वयं ही अट्ठकथा
का भाग है। जातक की मात्र गाथाएँ मूल त्रिपिटक का भाग मानी
जाती हैं, शेष कथा अट्ठकथा में दी गयी है। अतः ऊपर दिये गये 'युद्ध-
कथा' शब्द तथा उसके व्याख्यान के सन्दर्भ में डा० वेबर का सिद्धान्त
खण्डित हो जाता है कि दशरथजातक मात्र में रामकथा का मूल स्रोत
सुरक्षित है। युद्धकथा का सन्दर्भ यह व्यक्त करता है कि राम-रावण के
युद्ध की कथा रूप में रामकथा की प्रतिष्ठा समाज में उस समय हो चुकी थी
और काफी समय तक रामकथा अथवा इस कथा को व्यक्त करने वाले
काव्य को सीताहरण कहा जाता रहा। अतः सीताहरण तथा रावण
युद्ध की ओर पूर्व में ही 'युद्धकथा' से निदर्शन विद्यमान रहने के कारण
होमर के काव्य से इसके आने का प्रश्न ही नहीं उठता।
डा० याकोबी भी वेबर की भाँति ही रामकथा को दो भागों में
बाँट कर उसके दो आधारों को स्थापित करते हैं। उनके अनुसार प्रथम
१. द्रष्टव्य, सुमङ्गलविलासिनी, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३।

२४ प्रस्तावना
भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ
प्रधान नायक है तथा द्वितीय भाग में दण्डकारण्य तथा रावणवध-
सम्बन्धी कथा मिलती है और इसका मूल स्रोत वेदों की देवता-सम्बन्धी
कथाएँ प्रतीत होती हैं१ ।
श्री बुल्के को डा० याकोबी का मत तर्क-सङ्गत प्रतीत नहीं होता२,
क्योंकि उन्होंने अपने मस्तिक में यह निश्चित धारणा बना ली है कि
रामकथा का कोई वैदिक आधार नहीं है और डा० याकोबी उसका
वैदिक आधारमात्र ही नहीं देते, अपितु यह भी मानते हैं कि ईरानीय
'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूल स्रोत एक ही है। हापकिन्स
के मतानुसार महाभारत के शान्तिपर्व में जो रामकथा प्राप्त होती है,
उससे डा० याकोबी के मत की पुष्टि होती है३ ।
दिनेशचन्द्र सेन भी रामकथा के दो प्रधान मूल स्रोतों की कल्पना
करते हैं और ये दो स्रोत उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के हैं।
प्रथम के अन्तर्गत वे दशरथजातक को रखते हैं तथा द्वितीय के अन्तर्गत
रावण-सम्बन्धी आख्यान को तथा इन दोनों के संयोग से रामकथा की
उत्पत्ति को प्रस्तुत करते हैं४ । पर इनके विचार भी श्री वेबर की भाँति
ही हैं जिनके विरुद्ध पूर्व में तर्क प्रस्तुत किये जा चुके हैं और यह प्रदर्शित
किया जा चुका है कि युद्धकथा के रूप में दशरथजातक के पूर्व ही
रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। रावण-सम्बन्धी स्वतन्त्र आख्यानों को
सिद्ध करने के लिये सेन ने बौद्ध तथा जैन वाङ्मय का सहारा लिया
है, जिनके विषय में यह कहा जा सकता है कि उन स्रोतों के बहुत ही
पूर्व रामकथा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। साथ ही बौद्धों तथा जैनों में
रामकथा के प्रति कोई गौरवबुद्धि नहीं थी और वे उसे अपने अनुसार
तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना चाहते थे ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि रामकथा के मूल स्रोत के रूप में वैदिक
वाङ्मय को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं दृष्टिगोचर होती ।
वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का उपबृंहण मानते हैं। उनकी यह
स्पष्टोक्ति है—
१. द्रष्टव्य, हर्मन याकोबो, दास रामायण, पृष्ठ ८६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १०५ ।
३. वहीं, पृष्ठ १०६ । ४. वहीं, पृष्ठ १०८ ।

प्रस्तावना २५
“रामायणं महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम् ।
सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम्” ॥ ( १।१६ )
अर्थात् रामायण नामक महाकाव्य समस्त वेदों की सम्मति के अनुकूल
है। वह समस्त पापों का नाश तथा दुष्ट ग्रहों की बाधा का निवारण
करने वाला है।
यही सिद्धान्त मन्त्ररामायण द्वारा भी स्थापित किया गया है जिस
पर हम नीचे स्वतन्त्र रूप से विचार प्रस्तुत करेंगे। “गाथानृतं नारा-
शंसी” उल्लेख जो काठकसंहिता ( १४।५ ) में है उसका तात्पर्य यही है
कि ये वेदरूप ही हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूपी मन्त्र
नाराशंसी होते हैं; नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब
सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं, इसीलिये स्वार्थ में ये
अनृत कहे जाते हैं, अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य
नहीं होता है। ये भी अपौरुषेय ही होते हैं। सिद्धान्तभूत गाथाएँ अनृत
नहीं हैं। यतः वेदों में वास्तविक इतिहास या किसी घटना का उल्लेख
मानने से वेद की अपौरुषेयता भङ्ग होती है, अतः वहाँ विद्यमान घटना-
सम्बन्धी गाथाएँ गुणवाद तथा अर्थवादमात्र मानी जाती हैं। उनका
तात्पर्य ही सत्य होता है और उनका वाच्यार्थ अनृत है, यही ‘गाथा-
नृतम्’ कहने का अभिप्राय है।
मन्त्ररामायण : भारतीय सनातन परम्परा में वाल्मीकि रामायण
तथा पुराणों आदि का प्रामाण्य उनके वेदमूलक होने के ही कारण है
और उन सभी को यह परम्परा वेद के व्याख्यान-स्वरूप में ही मानती
है। भारतीय परम्परा के मनु तथा व्यास आदि के मतानुसार वेद
अनादि माने जाते हैं तथा आधुनिक इतिहासकार भी वेद को संसार
की सबसे प्राचीन पुस्तक के रूप में ग्रहण करते हैं। वाल्मीकि रामायण
का स्पष्ट उद्घोष है—
“कुशीलवौ तु धर्मज्ञो राजपुत्रौ यशस्विनौ ।
भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥
स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥
काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।
पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः” ॥ (वा.रा. १।४।५-७)

२६ प्रस्तावना
अर्थात् राजकुमार कुश और लव दोनों भाई धर्म के ज्ञाता और
यशस्वी थे । उनका स्वर बड़ा ही मधुर था और वे मुनि के आश्रम पर
ही रहते थे । उनकी धारणा-शक्ति अद्भुत थी और वे दोनों ही वेदों में
पारङ्गत हो चुके थे । भगवान् वाल्मीकि ने उन्हें मेधावी देख कर वेदार्थ
का विस्तारपूर्वक ज्ञान कराने के लिये उन्हें सीता के चरित्र से युक्त
सम्पूर्ण रामायण नामक महाकाव्य का, जिसका दूसरा नाम पौलस्त्य-
वध अथवा दशाननवध था, अध्ययन कराया ।
इस उद्धरण से यह पूर्णरूप से स्पष्ट है कि वेदार्थ के विस्तार के लिये
ही रामायण की रचना हुई । मन्त्ररामायण में भी वाल्मीकि रामायण
के इस वचन को उद्धृत करने के साथ ही अगस्त्यसंहिता के वचन को
उद्धृत करते हुए इसके लेखक नीलकण्ठ कहते हैं—"तथा रामायणस्य
वेदत्वोक्त्या प्रत्यक्षवेदमूलतत्त्वोपपादकम्—
"वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।
तस्माद्रामायणं देवि वेद एव न संशयः" ॥
इत्यगस्त्यसंहितावचनम्....१ ।
अर्थात् यह अगस्त्यसंहिता का वचन है कि वेदवेद्य परमात्मा जब
दशरथनन्दन राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी रामायण के
रूप में महर्षि प्राचेतस के मुख से अवतीर्ण हुए । इसलिये हे देवि, इसमें
संशय नहीं कि रामायण वेद ही है ।
इससे यह स्पष्ट है कि नीलकण्ठ के समय में भी रामायण अथवा
रामकथा के वेदमूलकत्व के सन्दर्भ में प्रश्न उपस्थित हुआ था और इसके
समाधान के लिये अर्थात् रामकथा की वेदमूलकता सिद्ध करने के लिए
उन्हें मन्त्ररामायण नामक ग्रन्थ की रचना करनी पड़ी ।
मन्त्ररामायण के रचयिता नीलकण्ठ का पूरा नाम नीलकण्ठ
चतुर्धर (आधुनिक भाषा में चौधरी) है। ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण विद्वान्
थे । इनके पिता का नाम गोविन्द सूरी तथा माता का नाम फुल्लाम्बिका
था और गोदावरी पर स्थित कूर्परग्राम के ये निवासी थे । आजकल
यह स्थान बम्बई राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित है और इसका
आधुनिक नाम कोपरगांव है । वहाँ से आकर ये काशी में बस गये और
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ २ ।

प्रस्तावना २७
यहीं पर इन्होंने महाभारत पर अपनी प्रख्यात टीका 'भारतभावप्रदीप'
की रचना की, जो विद्वानों में नीलकण्ठी के नाम से विख्यात है। इस
टीका को उन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में लिखा था¹।
महाभारत पर लिखी गयी अपनी इस प्रसिद्ध टीका के प्रारम्भ में
ही उन्होंने यह व्यक्त किया है कि इसके लिखने के पूर्व देश के विभिन्न
भागों से उन्होंने मूल ग्रन्थ महाभारत की अनेक पाण्डुलिपियों को
मँगाया था और उन्हें देखते हुए ही मूल के सर्वोपयुक्त पाठ का निर्धारण
किया था, साथ ही इस सन्दर्भ में प्राचीन व्याख्याकारों की व्याख्याओं
का भी अनुसरण किया था—
“बहून् समाहृत्य विभिन्नदेश्यान् कोशान् विनिश्चित्य च पाठमग्र्यम् ।
प्राचां गुरूणामनुसृत्य वाचम् आरभ्यते भारतभावदीपः”² ॥
इस सन्दर्भ में स्थान-स्थान पर वे पाठ-भेदों की ओर तथा अनेक
पाण्डुलिपियों में प्राप्त अधिक पाठ की ओर इङ्गित करते हैं और ऐसा
लगभग १२५ स्थानों में हुआ है। आज भी विभिन्न पाण्डुलिपियों का
परीक्षण करने पर पाठ-भेदों के सम्बन्ध में हमें वही सामग्री प्राप्त
होती है, जिसका निदर्शन इन्होंने अपनी टीका में किया है। इन पाठ-
भेदों के सम्बन्ध में अपने से पूर्व विद्यमान टीकाकारों की टीकाओं के
उद्धरण भी प्रमाण-स्वरूप ये उद्धृत करते हैं और यह इनका वैशिष्ट्य
महाभारत के प्रचलित मूल ग्रन्थ के सम्बन्ध में सूचना प्रस्तुत करने की
दिशा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भण्डारकर ओरियन्टल इन्स्टीट्यूट,
पूना, से प्रकाशित महाभारत में नीलकण्ठ द्वारा उद्धृत ऐसे पाठों को
पाद-टिप्पणी में दिया गया है और ये पर्याप्त संख्या में हैं। विभिन्न पर्वों
पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत करने के प्रसङ्ग में इन्होंने अपने से पूर्व
टीकाकारों में से देवबोध, विमलबोध, अर्जुन मिश्र, रत्नगर्भ तथा
सर्वज्ञनारायण आदि का नामोल्लेखपूर्वक स्मरण करते हुए उनके द्वारा
स्वीकृत मूल के पाठों को उद्धृत किया है—जैसे-महाभारत के
१।१५८।१४ पर व्याख्या करते हुए ये लिखते हैं—
१. द्रष्टव्य, आदिपर्वन्, वी० एस० सुकथंकर द्वारा सम्पादित,
पूना, प्रोलोगोमेना, पृष्ठ ६५ ।
२. वहीं।

२८ प्रस्तावना
“न नंहसा मूर्द्धिणो वा न च देवाञ्जनस्रजः ।
कुबेरस्य यथोष्णीषं किं मां समुपसर्पंथ” ॥
“इति प्राचीनः पाठो देवबोधादिभिर्व्याख्यातत्वात्” । कहीं-कहीं
इनके द्वारा इङ्गित किये गये ये पाठ तत्तत् टीकाओं में सम्प्रति प्राप्त
नहीं होते और इन्हें देखते हुए विद्वानों की यह भी धारणा है कि मात्र
सम्मान-प्रदर्शन हेतु तो ऐसा नहीं हुआ है ? साथ ही देवबोध को ये
‘प्राचीन’ कहते हैं और ऐसा तभी सम्भव प्रतीत होता है जब इनके
तथा देवबोध के बीच कम से कम चार या पाँच शताब्दियों का अन्तर
काल की दृष्टि से रहा हो । देवबोध की ओर निर्देश आगे भी है—
“मधुपर्किकाः मधुपर्क-समये पठन्त इति देवबोधः” । इसी प्रकार दूसरे
व्याख्याकार अर्जुन मिश्र को उद्धृत करते हुए ये कहते हैं—“जारूथ्यान्
त्रिगुणदक्षिणान् इत्यर्जुन मिश्रः ।” किन्हीं-किन्हीं पाण्डुलिपियों की ओर
सङ्केत ‘क्वचित्पुस्तके’ लिखकर किया गया है—“अत्र यत्तद्देवा
ददुरित्यादिना त्रिपथगां नदीमित्यन्तों नारायणोपाख्यानग्रन्थोऽध्याय-
द्वयात्मकः क्वचित्पुस्तके पठ्यते” । अर्जुन मिश्र ने भी देवबोध को उद्धृत
किया है और इससे हम इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँच सकते हैं कि
काल की दृष्टि से इन टीकाकारों में यह क्रम बनता है—देवबोध, अर्जुन
मिश्र, नीलकण्ठ । कहीं-कहीं नीलकण्ठ द्वारा विचित्र रूप में भी व्याख्याएँ
प्रस्तुत हुई हैं' ।
नीलकण्ठ ने इस टीका के अतिरिक्त गणेशगीता पर भी टीका
लिखी थी । मन्त्ररामायण के अतिरिक्त इनका मन्त्रभागवत नामक
ग्रन्थ भी अति प्रसिद्ध है, जिसमें भागवत की कथा से सम्बद्ध मन्त्र
ऋग्वेद से इस प्रकार क्रमबद्ध रूप से संगृहीत हैं, जिनसे सम्पूर्ण भागवत
की कथा प्रस्तुत हो जाती है और इसके ऊपर इन्होंने अपने सिद्धान्ता-
नुसार इन मन्त्रों से भागवत की कथा निःसृत करने हेतु अपनी व्याख्या
लिखी है । इनके पुत्र का भी नाम गोविन्द था, जिनके पुत्र (अर्थात्
नीलकण्ठ के पौत्र ) शिव ने पैठण में निवास करते हुए 'धर्मतत्त्व-प्रकाश'
नामक ग्रन्थ की रचना १७४६ ई० में की थी । नीलकण्ठ की ‘शिव-
ताण्डव-टीका’ का रचनाकाल १६८० ई० तथा ‘गणेशगीता' की टीका
का रचनाकाल १६६३ ई० है । ‘भारत-भाव प्रदीप’ के नाना हस्तलेखों
१. वहीं,पृष्ठ ६५-६७ ।

प्रस्तावना २६
का समय १६८७ ई० से लेकर १६६५ ई० है, अतः इनका समय १६५०
ई०-१७०० ई० मानना उचित प्रतीत होता है¹।
जैसा ऊपर कहा जा चुका है, मन्त्ररामायण में नीलकण्ठ ने ऋग्वेद
के मन्त्रों को देते हुए उनसे पूरी रामकथा अथवा रामायण कथा को
निकाला है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पूरी रामकथा
इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान हैं। इन मन्त्रों का सङ्कलन भी इन्होंने
स्वयं किया है और उनसे सम्पूर्ण रामकथा को व्यक्त करनेवाली 'मन्त्र-
रहस्य-प्रकाशिका' नामक व्याख्या लिखी है, जैसा कि इस व्याख्या के
अन्त में वे स्वयं कहते हैं— “इति श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणमर्यादाधुरन्धर-
चतुर्धरवंशावतंस-गोविन्दसूरिसूनोः श्रीनीलकण्ठस्य कृति स्वोद्धृतमन्त्र-
रामायणव्याख्या मन्त्ररहस्यप्रकाशिकाख्या समाप्तिगमत्” । इस प्रकार
से इन वैदिक मन्त्रों पर इनके द्वारा प्रस्तुत इस व्याख्या का नाम
'मन्त्ररहस्यप्रकाशिका' है। इस प्रकार मन्त्रों के सङ्कलन तथा उन पर
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक की
समस्त कथा को इन वैदिक मन्त्रों में विद्यमान प्रदर्शित किया है। ये
मन्त्र १५७ हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत व्याख्या-स्थलों के कुछ अंशों का
सारांश इस प्रकार—
मन्त्र ७ की व्याख्या यह प्रकट करती है कि वाल्मीकि रामायण
आर्ष काव्य है। महर्षि वाल्मीकि ने वेदों के छन्दों को अनुष्टुप् छन्द में
समन्वित करते हुए प्रायः समस्त रामायण की रचना की है। इसमें वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण माना गया है— अधिकं समस्वरन् श्रुतिं
दिव्यां दृष्टिं वा प्राप्य रम्यं काव्यं कृतवन्त इत्यर्थः । अर्थात् श्रुति के
अनुसार अथवा दिव्य दृष्टि को प्राप्त करके श्री वाल्मीकि के द्वारा रम्य
(रामायण) काव्य की रचना हुई। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने वेद
की ऋचाओं को ही प्रमाण मानकर जिसकी (रामायण की) रचना की
तथा शोक व्यक्त किया ( 'मा निषाद••••' इत्यादि के द्वारा ), एवं श्रुति
अथवा नारदोपदिष्ट महापुरुष ( श्रीराम ) का उन ऋचाओं के अनुरूप
अनुष्टुप् छन्द द्वारा ही संस्मरण कर वर्णन किया, वही श्लोक-रूप से
१. द्रष्टव्य, बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास,
पृष्ठ ७० ।

३० प्रस्तावना
रामायण कहा गया है । यहाँ अनुशरण, शोक और स्मरण, ये तीन
वाल्मीकि रामायण के श्लोकों के श्रुतिमूलक कारण हैं ।
रभसस्येत्यादि मन्त्र में 'दुष्कृत' यह अन्तिम पद है । इसमें बत्तीस
वर्ण हैं । कार्यहानि को देखकर इस मन्त्र के द्वारा शोक व्यक्त है और
शोक के कारण को शाप-रूप प्रतिफल प्राप्त हुआ है । इस मन्त्र का भाव
ही 'मा निषाद.....' इत्यादि श्लोक में व्यक्त हुआ है । यह श्लोक अनुष्टुप्
छन्द में है। इस छन्द में गायत्री और पंक्ति ये दो छन्द सन्निविष्ट हैं।
जगती छन्द के भी आ जाने से यहाँ अनुष्टुप् छन्द ही लिया जायेगा ।
अथवा अनुष्टुप्, त्रिष्टुप् तथा जगती छन्दों के प्रति पादों का सन्निवेश
अनुष्टुप् छन्द में ही हुआ है। अतः सभी छन्दों का मूल अनुष्टुप् छन्द
हुआ। इसी छन्द को प्राचेतस् ऋषि वाल्मीकि ने आदि-काव्य का
आधार बनाकर वेदमूलक रामायण की रचना की है ।
मन्त्र संख्या १० द्वारा यह व्यक्त किया गया है कि वेद का परम
तत्त्व 'ऋत' एवं सत्य है । वाल्मीकि ने रामकथा के रूप में ऋत एवं
सत्य तत्त्व को प्रतिष्ठित करते हुए अनृत एवं असत् तत्त्वों की निन्दा
प्रस्तुत की है । रामायण या रामकथा परम तत्त्व को प्राप्त कराने में
तन्तुरूप से कार्य करती है । विष्णु की स्तुति के लिये प्रयुक्त शब्द (वायु
रूप ) कवियों के जिह्वाग्र में स्थित भोग और मोक्षसाधिका विष्णु की
माया के द्वारा रामकथा के रूप में अत्यन्त विस्तृत है । इस मन्त्र में
'वरुणस्य' के तात्पर्य वरुणपुत्र प्राचेतस् नाम से अभिहित वाल्मीकि ही
हैं। 'धीर' शब्द से भी इन्हीं वाल्मीकि का अभिधान किया गया है।
अतः उन्होंने समग्र रूप से रामकथा का वर्णन किया है।
इसी प्रकार मन्त्र संख्या ३३ को सीता का स्तुति विषयक सिद्ध
किया गया है। 'सीता' शब्द की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए नीलकण्ठ
कहते हैं— "स्यति सर्वेषां रक्षसामन्तं करोतीति सीता", अर्थात् जो
सभी राक्षसों का नाश कर दे वह सीता है। वे आगे कहते हैं— ऐसी
सीता हमारे ऐश्वर्य को बढ़ाती हुई प्रतिपक्ष (अशुभ कर्मों) का नाश
करें ।
मन्त्ररामायण के रचयिता अपने समालोचकों को लक्ष्य करके कहते
हैं— "नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति इति न्यायेन त्वयि

प्रस्तावना ३१
वेदार्थानभिज्ञे सति न रामायणमपराद्ध्यति"१ ।
इस प्रकार मन्त्ररामायण के कर्त्ता ने सम्पूर्ण रामकथा तथा इसके
पात्रों का निदर्शन वैदिक वाङ्मय से कराया है ।
इस ग्रन्थ के प्रारम्भ में रामरक्षास्तोत्र उद्धृत है और उसकी
व्याख्या प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थ के प्रयोजन को रामकथा का वेदमूलकत्व
सिद्ध करना ही अभिहित किया गया है । "इसके प्रारम्भ में रामायण के
गायत्री-स्वरूप का उल्लेख है । गायत्रीरामायण, विद्यारण्य कृत
रामायण रहस्य, तत्त्वसंग्रहरामायण, गोविन्दराज-कृत भूषणटीका आदि
रामायण के गायत्री-स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । तर्क यह है कि
रामायण के २४००० श्लोकों में प्रत्येक सहस्र के प्रथम श्लोक का पहला
अक्षर उद्धृत करने से गायत्री का मन्त्र बन जाता है—
‘प्रतिश्लोकसहस्रादौ मन्त्रवर्णाः समुद्धृताः ।’
किन्तु वास्तव में कोई भी गायत्रीरामायण के प्रत्येक सहस्र समूह
का प्रथम श्लोक समुद्धृत नहीं करता । विद्यारण्य ने वाल्मीकि
रामायण के प्रथम सर्ग को भी गायत्री-स्वरूप कहा है—
“गायत्र्याश्च स्वरूपं तद्रामायणमिति स्मृतम्”२ ।
नीलकण्ठ द्वारा रचित इस ग्रन्थ के विद्वान् सम्पादक डा० राम
कुमार राय हैं। उन्होंने प्रत्येक वैदिक मन्त्र के सन्दर्भ दे दिये हैं, साथ ही
मन्त्ररहस्य-प्रकाशिका व्याख्या के अनुसार उन मन्त्रों का हिन्दी अनु-
वाद भी प्रस्तुत कर दिया है । इससे यह ग्रन्थ अत्यन्त बोधगम्य बन
गया है । मन्त्ररामायण का संस्करण आज से बहुत पहले श्री वेङ्कटेश्वर
स्टीम प्रेस, बम्बई, से मुद्रित हुआ था और यह कार्य इतना पहले हुआ
था कि इसकी प्रतियाँ अत्यन्त दुर्लभ हो गयीं थी तथा विद्वद्वर्ग इसे भूल
सा गया था कि आज से कई शताब्दी पूर्व नीलकण्ठ ने रामकथा अथवा
रामायण की वेदमूलकता प्रतिपादित करने का श्लाघनीय प्रयत्न किया
था । प्रस्तुत संस्करण इस कमी को हटाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका
अदा करेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है ।
आशा है मन्त्ररामायण का यह संस्करण विद्वानों द्वारा आहत होगा ।
वाराणसी, ७ जनवरी १६८८ लक्ष्मीनारायण तिवारी
१. द्रष्टव्य, मन्त्ररामायण, पृष्ठ ६ ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ १७४-१७५ ।

इस पृष्ठ पर मुद्रित पाठ अत्यधिक फीका, धुंधला और कंट्रास्ट की कमी (washed out / illegible) के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है (संभवतः यह पिछले पृष्ठ की केवल हल्की छाप या अत्यधिक ओवर-एक्सपोज़्ड स्कैन है)।

पाठ के अक्षर और पंक्तियाँ अपठनीय होने के कारण इसका प्रामाणिक और शुद्ध देवनागरी लिप्यंतरण (transcription) संभव नहीं है। कृपया बेहतर रिज़ॉल्यूशन अथवा स्पष्ट कंट्रास्ट वाली प्रतिलिपि (image) उपलब्ध कराएं।

॥ श्रीः ॥
श्रीजानकीवल्लभो जयतितराम्।
अथ मन्त्ररामायणम्
सटीकम् ।
रामायणद्रुमं नौमि रामरक्षानवांकुरम् ।
गायत्रीबीजमाम्नायमूलं मोक्षमहाफलम् ॥१॥
राम रक्षा रूपी नवीन अंकुर वाले, गायत्री बीज वाले, वेदरूपी
मूलवाले और मोक्ष रूपी महान फलवाले रामायण रूपी वृक्ष को मैं
नमस्कार करता हूं ।
ऐसा कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में चौबीस
सहस्र श्लोक गायत्रीमंत्र के २४ अक्षरों के आधार पर संगृहीत किये
हैं । रामायण के वेदत्व के विषय में अगस्त्य संहिता आदि प्रमाण हैं ।
गायत्री मंत्र में सविता देवता की स्तुति की गयी है । सविता को भग-
वान् नारायण की ज्योति भी कहा जाता है । भगवान के नानारूपो
में अवतार लेकर क्रीडा करने वाले रामादि रूपों की रामायण में
उपासना की गयी है और यह आवागमन से रहित कैवल्य की ओर
ले जाने वाला है ।
अत्र रामरक्षायाः रामायणद्रुमांकुरत्वं स्पष्टमवगम्यते, तत्स्थानां राघवा-
दिपदानां क्रमेण रामायणार्थसूचकत्वात् तस्याः गायत्रीबीजत्वं वेदमूलत्वं चोप-
पादनीयम् तेन रामायणस्यापि तदुभयं सिद्धयति । अत एव रामायणे चतुर्विंश-
त्साहस्र्यां चतुर्विंशतिगायत्र्यक्षराणि वाल्मीकिना संगृहीतानीत्यभियुक्तप्रसिद्धं

२ मन्त्ररामायण
संगच्छते । तथा रामायणस्य वेदत्वोक्त्या प्रत्यक्षवेदमूलतत्त्वोपपादकम् 'वेदवेद्ये-
परे पुंसिजाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत्साक्षाद्रामायणात्मना ॥
तस्माद्रामायणं देवि वेद एव न संशयः” इत्यगस्त्यसंहितावचनम् “स तु मेधा-
विनो दृष्ट्वा वेदार्थपरिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥ काव्यं
रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्” इति तस्य वेदोपबृंहणप्रयोजनकत्वं
प्रतिपादयदार्षं वचनं च संगच्छते । तत्र गायत्र्यर्थस्तावत्सवितुः ब्रह्माण्डवृक्ष-
प्रसवभूमेः तत् प्रसवितृरूपं भूर्स्थानीयं वरेण्यं वरणीयं मोक्षकामैर्ब्रह्माण्डवृक्ष-
प्रविलापनेनानुसर्तव्यम् एवं च “तदिति वा एतस्यमहतो भूतस्य नाम भवति”
इति श्रुतेस्तत्पदोदिते ब्रह्मणि सवितृपदेन कार्यमात्रमध्यारोप्य वरेण्यपदेन तदपोद्य
निष्प्रपञ्चं ब्रह्मणः पारमार्थिकं रूपं निरूपितं तथा तस्यैव सवितुर्भर्गः अभिर्गति-
रस्येति व्युत्पत्त्या सूर्यमण्डलान्तःस्थं नारायणाख्यं ज्योतिः “य एषोन्तरादित्ये
हिरण्मयः पुरुषः” इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं मायाविक्षेपमुपास्यं निर्दिष्टं धीमहीत्य-
नेनान्वयात् तथा देवस्येति तस्यैव ब्रह्माण्डान्तर्नानावतारैः क्रीडतो रामकृष्णादि-
रूपं तृतीयं रूपमुक्तं तथा धीमहीति विरोधपूर्वकं स्वार्थमुभयार्थमीश्वरार्थं चेति
चतुर्द्धा भजनं दर्शितं तथा तृतीयपादे बहिर्मुखस्वभावायाबुद्धेः अन्तर्मुखतया
प्रकर्षेण प्रेरणे प्रत्यगात्मप्रधाने कैवल्यरूपेपदस्य हेतुत्वप्रदर्शनेन तस्यैव सकलकर्मो-
पास्तिफलप्रयोजकत्वमुक्तम् एवं च गायत्र्यां काण्डत्रयं दर्शितं तथा च मैत्रायणी-
श्रुतिः— “तत्सचितुर्वरेण्यमित्यसौ वा आदित्यः सविता स वा एवं प्रवरणीय
आत्मकामेनेत्याहुर्ब्रह्मवादिनः” इति । भर्गोदेवस्य धीमहीति सविता वै देवस्त-
तोयोस्य भर्गस्तं चिन्तयामीत्याहुर्ब्रह्मवादिन इति । धियो योनः प्रचोदयादिति
बुद्धयो वै धियस्ता योस्माकं प्रचोदयादित्याहुर्ब्रह्मवादिन.” इति अत्रात्मकामेन
प्रवरणीय इति सवितुः प्रत्यगात्मत्वं ज्ञानकाण्डार्थ उक्तः चिन्तयामीति चिन्ता-
योग्यत्वमुपासनाकाण्डार्थ उक्तः । धिय इत्यनेकाकारधीप्रेरकत्वं कर्मकाण्डार्थ उक्तः
तत्राद्य उपेयः परो सन्निकृष्टविप्रकृष्टौ तत्प्राप्त्युपायौ । एवं वेदमातुर्गायत्र्याः
काण्डत्रयात्मकत्वेन तज्जानां वेदानां तन्मूलकानां रामायणादीनां च तथात्वं
ज्ञेयम् एत एवार्था राघवादिविशतिनामभी रामरक्षायामक्षरार्थद्वारा प्रदर्श्यन्ते ।
तथाहि :—
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ।
कौशल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ॥ १ ॥
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ॥ २ ॥

मन्त्ररामायण ३

मेरे शिर की रक्षा राघव करें, मस्तक की रक्षा दशरथपुत्र करें।
कौशल्यापुत्र मेरे नेत्रों की रक्षा करें। विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानो
की रक्षा करें। यज्ञ के रक्षक मेरी नासिका की रक्षा करें। मुख की
रक्षा सौमित्रिवत्सल करें। जिह्वा की रक्षा विद्यानिधि करें, तथा भरत
से पूजित (राम) मेरे कण्ठ की रक्षा करें।

रंघति नाशं गच्छतीति रघुः व्यष्टिसमष्टिरूपो अन्नमयःकोशःतत्र विदितो
राघवःब्रह्माण्डाभिमानी मम ब्रह्माण्डरूपं शिरः पातु १ स एव दशरथस्य दशभि-
रिन्द्रियाश्वैर्य्युक्तस्य मनोमयकोशरूपस्य आत्मैवात्मा कार्यं प्राणमयः कोशस्तज्जः
तेन अन्नमयादान्तरः प्राणमयः ततोप्यान्तरो मनोमय इति पूर्वयोः प्रविलापनं
सिद्धम्, स च वासनातन्तुसन्तानात्मा मनोमयः ब्रह्माण्डासृष्टिकमेणार्वाचीनं
भालदेशं ब्रह्मलिपिस्यानं मे पातु २ कुशलैव कौशल्या स्वार्थे ष्यञ् सर्वाथाविद्योतन-
समर्थाबुद्धिस्तस्यां भवः कौसल्येयो विज्ञानमयः ततोप्यान्तरः स मम दर्शनसाधने
दृशी पातु एतेन मनोमयस्याप्यपवाद उक्तः ३ । विश्वस्य मित्रं निरुपाधिप्रेम-
गोचरतया प्रेयान् आनन्दमयाख्य आत्मैव विश्वामित्रः तस्यापि प्रियः 'सुषुप्तोसता
सौम्यतदासम्पन्नो भवति' इतिश्रुतेः प्राप्तः सन्नात्यन्तिकदुःखनिवृत्तिकरस्तदधिष्ठान-
भूत आनन्दः पुच्छंब्रह्मापरपर्यायो मम श्रुती स्वाधिगमद्वारभूते पातु तदेवं प्रथमेन
पादेन रामे ब्रह्माण्डमारोप्य अन्यपादनत्रयेणापोह्य च रामस्य शुद्धं रूपं गायत्री-
प्रथमपादोक्तं दर्शितम् अयं चार्थः कृत्स्नोपि वेदान्त प्रसिद्ध इति मूलवाक्यानि
नोदाहृतानि ४। यज्ञत्राता अव्यभिचारेण ऋतुफलप्रदः फलमतउपपत्तेः इति
न्यायादिति भावः । स मे ऋतुफलभूतदिव्यगन्धरसानुपलब्धिकरणं घ्राणरसना-
दिकं पातु ५ सौमित्रिवत्सलः सुष्ठु मित्रं जीवपक्षिणः सखा ईश्वरः तस्यापत्यं
सौमित्रिर्हिरण्यगर्भः तत्र वत्सलः तेन तत्तादात्म्यं प्राप्तानामुपासकानां अनुग्रह-
कर्तेत्युक्तम् सौमित्रेर्मुख्यकार्यत्वात्तद्वत्सलो मे मुखं पातु ६ । तावेतापन्तर्यामिसूत्रा-
त्मानौ विद्यैकलभ्यौ न तु शुष्कतर्कगम्यौ इति विद्यावाप्तिद्वारभूतां मम जिह्वां
विद्यानिधिः विद्यासम्प्रदायप्रवर्त्तकः पातु ७ । विद्यापि यज्ञाद्यपूर्वप्राप्या "विधि-
द्विषन्ति यज्ञेन" इत्यादिश्रुतेः "अतो भरतैः कर्मठैर्वन्दितः शरणीकृतः भरन्ति-
कर्मफलं सञ्चिन्वन्ति ते भरताः यजमानाः भरतमुद्धर' इति मन्त्रलिंङ्गात् यज्ञश्च
कण्ठस्थ्यैरेव मन्त्रैः स्तोत्रशस्त्रादिभिर्निर्वर्त्यत इति यज्ञप्रियो मे मन्त्रोच्चारणस्थानं
कण्ठं पातु तदेवं यज्ञादिजन्येन पुण्येन प्राप्तोपासनामार्गः मगृह्यं सूत्रमीशं वा
क्रममुक्तिद्वारं प्राप्नोतीति श्लोकद्वयतात्पर्यम् ॥८॥१-२॥

स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेश कार्मुकः !

"हनुमत्प्रभुः"!
It must say "हनुमत्प्रभुः मे सक्थिनी अङ्कदेशं पातु"!
Yes! It is "हनुमत्प्रभुः मे सक्थिनी"!

Let's check line 23:
"तस्यैव चतुर्द्धा भजनमाह मध्यमिवित।" -> wait, is it "मध्यमिति ।"?
Look at the characters:
म (ma)
ध्य (dhya)
मि (mi)
ति (ti)
It's clearly "मध्यमिति ।"! (The dot inside is just text).

Let's check line 7:
"मानुषभावेऽपि ऐश्वरदिव्यायुधानां शाङ्गादीनां धारित्वादिव्यायुध आयुध-"
Wait, is it "शार्ङ्गादीनां"?
Look above the 'शा': there is a repha 'र्'!
Yes, there is a distinct curved hook above शा: "शार्ङ्गादीनां"!
And after 'धारित्वा': is it 'द्दिव्यायुध' or 'दिव्यायुध'?
It looks like "धारित्वाद्दिव्यायुध" or "धारित्वादिव्यायुध"?
There is a single 'द' with 'ि': "धारित्वादिव्यायुध".

Let's check line 8:
"निधानस्थानभूतो स्कन्धौ मे पातु ९। तथा भुजबलेनैव भग्नेशकार्मु