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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 145 में से

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पृष्ठ 22

१८ प्रस्तावना
मन्त्रों और पत्नी-मन्त्रों से उस अङ्गराग को अभिमन्त्रित कर सीता का
मुख उन्होंने अलंकृत किया और इसके अनन्तर वह सोम राजा के पास
गयी। सीता को देखकर सोम राजा ने कहा कि मेरे पास आइये।
सीता ने कहा कि 'मैं आपके पास आती हूँ, परन्तु आप प्रतिज्ञा करें कि
मुझसे सम्बन्ध रखेंगे और आपके हाथ में जो है, उसे मुझे दे दीजिए।'
सोम राजा ने सीता को तीनों वेद दे दिये' ।१ इसके बाद इस अङ्गराग
की महिमा तथा इसके प्रयोग का वर्णन है।
इस उपाख्यान तथा वाल्मीकि रामायण के सम्बन्ध में श्री बुल्के का
तर्क है कि “सीता-सावित्री आदि कथाओं का इससे कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध
नहीं है, फिर भी सम्भव है कि अनसूया के अङ्गराग का वृत्तान्त इस
उपाख्यान से प्रभावित हो जो वाल्मीकि रामायण के २।११८।२० तथा
अध्यात्म रामायण के २।६।८६ में प्रस्तुत हुआ है। उनके अनुसार
गोस्वामी तुलसीदास जी भी तैत्तिरीयब्राह्मण के उपर्युक्त उपाख्यान से
परिचित थे और उन्होंने सीता की मर्यादा के विरुद्ध समझ कर इस
अङ्गराज की चर्चा नहीं की....”२ आदि।
श्री बुल्के की ऊपरिस्थित अङ्गराग-सम्बन्धी चर्चा का पूर्णरूपेण
उल्लेख करते हुए स्वामी करपात्री जी ने भारतीय परम्परा की दृष्टि से
इसकी आलोचना की है जिसे उन्हीं के शब्दों में नीचे प्रस्तुत किया जा
रहा है जिससे विद्वत् समाज उसके सम्बन्ध में उनकी दृष्टि को भी
जान ले—
“यहाँ बुल्के साहब ने तैत्तिरीयब्राह्मण में वर्णित सीता-सावित्री के
मन्त्राभिमन्त्रित स्थागर (अङ्गराग) से वाल्मीकि रामायण और
अध्यात्म-रामायण में उल्लिखित अङ्गराग की भिड़न्त भिड़ाकर स्थागर
का विकास इस रूप में माना है और तुलसीदास जी ने जान बूझकर
यह छिपा लिया, ऐसा बतलाया है। परन्तु यह कथन अयथार्थ है,
क्योंकि जो बात वाल्मीकि-रामायण और आध्यात्म-रामायण दोनों में
हो, महात्मा तुलसीदास उसका अपलाप नहीं कर सकते। अतः उनके
‘दिव्य वसन भूषण’ शब्द से अङ्गराग भी समझ लेना चाहिये। यहाँ
१. वहीं, पृष्ठ ८-६।
२. वहीं पृष्ठ ६।