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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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प्रस्तावना १७
सीता के उल्लेख पर विचार करते हुए श्री बुल्के ने वैदिक वाङ्‌मय
से उद्धरण प्रस्तुत करते हुए इस नाम के वर्णन को अर्थ की दृष्टि से दो
कोटियों में रखा है—पहली कोटि में सीता-सावित्री उपाख्यान है जो
हमें तैत्तिरीय ब्राह्मण में प्राप्त होता है और दूसरी कोटि में 'सीता'
शब्द का प्रयोग जो लाङ्गल-पद्धति के अर्थ में वैदिक वाङ्‌मय के कई
स्थलों में हुआ है, दिया गया है।१ संक्षेप में श्री बुल्के के इस कथन की
आलोचना देनी समीचीन प्रतीत होती है।
कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीय ब्राह्मण (२।३।१०) में जो सीता-सावित्री
उपाख्यान है, वह श्री बुल्के के अनुसार काम्य प्रयोग का प्रभाव दिखलाने
के उद्देश्य से ही उद्धृत किया गया है।२ यह उपाख्यान सीता-सावित्री
तथा सोम राजा से सम्बन्धित है और इसमें सीता और श्रद्धा दोनों
प्रजापति की पुत्रियाँ मानी जाती हैं। इस उपाख्यान में सीता सोम
राजा के प्रेम को स्थागर नामक अङ्गराग के द्वारा प्राप्त करती हैं। इस
कथा का मूल रूप श्री बुल्के के अनुसार ऋग्वेद के सूर्या सूक्त में विद्यमान
है और उनकी मान्यतानुसार यह ऋग्वेद के ऐतरेयब्राह्मण तथा
कौषितकीब्राह्मण, तैत्तिरीयसंहिता, काठकसंहिता तथा मैत्रायणीसंहिता
में भी है। तैत्तिरीयसंहिता में इस कथा का कुछ परिवर्तित रूप प्राप्त
होता है जो श्री बुल्के के ही शब्दों में इस प्रकार है—"प्रजापति ने सोम
राजा की और इसके पश्चात् तीनों वेदों की सृष्टि की थी। सोम राजा
ने इन (वेदों) को हस्तगत किया। सीता-सावित्री सोम राजा को
(पतिस्वरूप) चाहती थीं, (लेकिन) वह (सोम राजा) श्रद्धा
(सीता की बहन) को चाहते थे। सीता ने अपने पिता प्रजापति के
पास जाकर कहा, 'आपको नमस्कार, मैं आपके पास आयी हूँ और
आपकी शरण लेती हूँ, मैं सोम राजा को पतिरूप में चाहती हूँ; परन्तु
वे श्रद्धा को चाहते हैं।' प्रजापति ने उसके लिये स्थागर नामक अङ्गराग
तैयार किया और पूर्व दिशा की ओर दस होतृ-मन्त्र पढ़कर, दक्षिण
की ओर चार होतृ-मन्त्र, पश्चिम की ओर पाँच होतृ-मन्त्र, उत्तर की ओर
छह होतृ-मन्त्र, ऊपर की ओर सात होतृ-मन्त्र पढ़कर तथा सम्भार-
१. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ७-२३।
२. वहीं, पृष्ठ ७।