मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना २१
किन्तु आज तक इस विषय पर आलोचना तथा समीक्षा करनेवाले
किसी विद्वान् ने इस विषय पर इस दृष्टि से विचार करने का कष्ट नहीं
किया कि क्या दशरथजातक से भी पूर्व बौद्ध पालि त्रिपिटक में राम-
कथा की ओर संकेत है और उसके परिप्रेक्ष्य में दशरथजातक की स्वयं
क्या स्थिति होती है और कालक्रम का क्या प्रश्न उपस्थित होता है।
अतः इस संकेत के सन्दर्भ में इस पूरे प्रकरण पर पुनः विचार
अपेक्षित है।
त्रिपिटक के सुत्तपिटक के दीघनिकाय नामक प्रथम निकाय का
प्रथम सुत्त 'ब्रह्मजालसुत्त'१ है। इसमें भगवान् बुद्ध ने भिक्षुको को
निरर्थक प्रलाप तथा युद्ध-कथा की चर्चा करने से मना किया है। प्रसङ्ग
यह है कि एक बार भगवान् बुद्ध भिक्षु-सङ्घ के साथ राजगृह से नालन्दा
जा रहे थे और उस समय सुप्रिय परिव्राजक भी अपने शिष्य ब्रह्मदत्त के
साथ उसी मार्ग पर आरूढ़ था। सुप्रिय अनेक प्रकार से बुद्ध, धर्म तथा
सङ्घ की निन्दा कर रहा था तथा ब्रह्मदत्त इसके विपरीत प्रशंसा।
रास्ते में रात को बुद्ध एक स्थान पर ठहर गये और सुप्रिय तथा
ब्रह्मदत्त भी वहाँ ठहरे और वे दोनों उसी प्रकार से चर्चा में लिप्त
रहे। भिक्षुओं ने इस सम्बन्ध में जब बुद्ध से प्रश्न किया तो उन्होंने
उत्तर दिया कि शीलवान् होने के कारण सामान्य जन उनकी प्रशंसा
करते हैं। बुद्ध ने उस समय शील की व्याख्या इसे प्रारम्भिक, मध्यम
तथा महाशील में करके की और प्रारम्भिक शील के अन्तर्गत जीव-
हिंसा, चोरी, अब्रह्मचर्य आदि से विरत रहने को परिगणित करते हुए
कहा कि इन सबसे विरत रहने के कारण ही सामान्य जन उनकी
प्रशंसा करते हैं। आगे उन्होंने 'सम्पप्पलाप', अर्थात् निरर्थक प्रलाप
से विरत रहने का उल्लेख किया२। इस 'सम्पप्पलाप' पद की व्याख्या
दीघनिकाय की अट्ठकथा (अर्थकथा) 'सुमङ्गलविलासिनी' में आचार्य
बुद्धघोष ने इस प्रकार से की है- "अनत्थविज्ञापिका कायवचीपयोग-
समुट्ठापिका अकुसलचेतना••••सम्पप्पलापो••••तस्स द्वे सम्भारा-भारत-
युद्ध-सीताहरणादिनिरत्थककथापुरक्खारता, तथारूपी कथाकथनं
१. द्रष्टव्य, दीघनिकाय, नालन्दा, भा० १, पृष्ठ ३-४० ।
२. वहीं, पृष्ठ ३-६ ।