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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

प्रस्तावना १६
एक बात और ध्यान देने योग्य है, वह यह कि ऋषि सर्वज्ञकल्प होते
हैं, अतः स्वतन्त्र रूप से अनसूया-समर्पित अङ्गराग दिव्य वसन-भूषण
आदि का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने उल्लेख किया है। संसार में समान-
रूप से मिलती-जुलती अनेक घटनाएँ हो सकती हैं, अतः यह आवश्यक
नहीं कि सावित्री सीता द्वारा प्राप्त अङ्गराग का ही यहाँ आवर्तन किया
जाय । अतएव प्रजापति द्वारा सूर्या को दत्त अङ्गराग अन्य वस्तु है
और अनसूया द्वारा सीता को प्रदत्त अङ्गराग अन्य वस्तु । सावित्री
सीता का स्थागर केवल मुखलेप है तथा अनसूया द्वारा सीता के लिये
दी गयी वस्तु अङ्गराग है। मुखलेप.वशीकरण के लिये है, यह केवल
स्वाभाविक सौन्दर्य का अभिव्यञ्जक है और अङ्गराग सर्वाङ्ग-विलेपन
है, इसके साथ दिव्य मालाएँ, वस्त्र एवं आभूषण भी हैं....।"१
उपर्युक्त के अतिरिक्त 'सीता' शब्द का प्रयोग काठकसंहिता
(२०।३), कपिष्ठलसंहिता (३२।५-६), मैत्रायणीसंहिता (३।२।४-५)
तथा तैत्तिरीयसंहिता (५।२।५।५) में तथा शतपथब्राह्मण (१३।८।२।
६-७) आदि में हुआ है और यह पाश्चात्त्य विद्वानों की दृष्टि से लाङ्गल-
पद्धति के विषय में है२ । वे मानते हैं कि उन स्थलों पर सीता के
व्यक्तित्व का आरोप विद्यमान नहीं है। तथा इससे सीता को कृषि की
अधिष्ठात्री देवी के रूप में लिया जा सकता है३ । सीता की प्रार्थना
अथर्ववेद (३।१७।१) में विद्यमान है। इसकी अधिकांश सामग्री
ऋग्वेद के दो सूक्तों से ली गयी है। परन्तु यदि इन मन्त्रों पर हम
विचार करें तो यह लाङ्गलपद्धति-मात्र की स्तुति नहीं है—
“सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव ।
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥
(अथ० सं० ३।१७।८)
अर्थात् हे सीते, हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। हे सुन्दर भाग्यवाली
सीताभिमानिनी देवी, आप हमारे वैसे अभिमुख हों, जिस प्रकार से
हमलोगों के प्रति सुन्दर मनवाली हों एवं जिससे हमलोगों को शोभन
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायण-मीमांसा, पृष्ठ २६-३० ।
२. द्रष्टव्य, फादर कामिल बुल्के, रामकथा, पृष्ठ ७ ।
३. वहीं, पृष्ठ ११-२३ ।