मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० प्रस्तावना
फल देनेवाली हो । यह मात्र लाङ्गलपद्धतिमात्र की स्तुति नहीं हो
सकती१। क्या हम इसमें महाशक्ति की अभिव्यञ्जना नहीं पाते ? एक
प्रकार से इन सबके द्वारा इसमें आह्लादिनी सर्वशक्तिस्वरूपा तेजोमयी
शक्ति का निरूपण निर्देशित है। छान्दोग्य उपनिषद् (७।१।४) में
कहा गया है कि "इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः"। इसके अनु-
सार इतिहास पुराणादि भी वेद की कोटि में ही आ जाते हैं।
जहाँ तक वेदों के तात्पर्य का प्रश्न है, यह परब्रह्म परमेश्वर में ही
है। साथ ही अधिकांश मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्वारा कर्मकाण्ड और
उपासनाओं का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार ब्रह्म निर्गुण तथा
निराकार है, वैसे ही वह अचिन्त्य सौन्दर्य तथा माधुर्य आदि से पूर्ण
साकार रूप में भी वर्णित है। वह अपने लिये भी श्रीविग्रह का निर्माण
कर सकता है। अतएव यजुर्वेदसंहिता (५।२०) में निम्नाङ्कित मन्त्र
आता है—
"प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥
विद्वानों के अनुसार यहाँ पर आये 'भीमो मृगः' से नृसिंहावतार
का निदर्शन है तथा 'कुचरः' से भूमिचारी राम, कृष्ण आदि का अव-
तार इङ्गित है और 'त्रिषु विक्रमणेषु' से वामनावतार सूचित है। इस
प्रकार से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह नहीं कहा जा सकता
कि वैदिक वाङ्मय में रामकथा का निदर्शन नहीं है२।
रामकथा की उत्पत्ति के सन्दर्भ में भी विभिन्न मत विद्वानों ने
प्रस्तुत किये हैं और इस सन्दर्भ में उन पर संक्षेप में विचार प्रस्तुत
करना समीचीन ज्ञात होता है। डा० वेबर की मान्यता है कि रामकथा
का मूल रूप दशरथजातक में सुरक्षित है तथा इसमें सीताहरण तथा
रावण युद्ध का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है; अतः सीताहरण वाले इस
अंश का मूलस्रोत सम्भवतः होमर का काव्य है जिसमें पैरिस द्वारा
हेलेन का हरण वर्णित है और लङ्का-युद्ध का आधार है यूनानी सेना
द्वारा त्राय का अवरोध३ ।
१. द्रष्टव्य, स्वामी करपात्री जी, रामायणमीमांसा, पृष्ठ २३ ।
२. वहीं, पृष्ठ ३६-३७ ।
३. द्रष्टव्य, ए० वेबर, आन दि रामायण, पृष्ठ ११ आदि ।