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मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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मलूकदासजी की बानी
सतगुरु और निज रूप की महिमा
॥ शब्द १ ॥
अब मैं सतगुरु पूरा पाया।
मन तैं जनम जनम डहकाया¹ ॥ १ ॥
कई लाख तुम रंडी² छाँड़ी, केते बेटी बेटा।
कितने बैठे सिरदा³ करते, माया जाल लपेटा ॥ २ ॥
कितने के तुम पित्र कहाये, केते पित्र तुम्हारे।
गया बनारस कर कर थाके, देत देत पिंड हारे ॥ ३ ॥
कई लाख तुम लसकर जोड़े, केते घोड़े हाथी।
तेऊ गये बिलाय छिनक में, कोई रहा न साथी ॥ ४ ॥
आवागवन मिटाया सतगुरु, पूजी मन की आसा।
जीवन मुक्त किया परमेसुर, कहत मलूकादासा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
हमारा सतगुरु बिरले जानै।
सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै ॥ १ ॥
की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता।
की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता ॥ २ ॥
हमरे गुरु की अद्भुत लीला, ना कछु खाय न पीवै।
ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै ॥ ३ ॥
बिन तरवर फल फूल लगावै, सो तो वा का चेला।
छिन में रूप अनेक धरत है, छिन में रहै अकेला ॥ ४ ॥
(१) ठगाया। (२) स्त्री। (३) सिजदा, दंडवत।

प्रथम भाग: साखी संग्रह (गुरु, नाम, विरह व ज्ञान अंग)

२ मलूकदासजी की बानी
बिन दीपक उँजियारा देखे, एँड़ी समुँद थहावै ।
चींटी के पग कुंजर१ बाँधै, जा को गुरू लखावै ॥ ५ ॥
बिन पंखन उड़ि जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवै ।
सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै ॥ ६ ॥
बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई ।
कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३ ॥
नाम तुम्हारा निरमला, निरमोलक हीरा ।
तू साहेब समरत्थ, हम मल मुत्र कै कीरा ॥ १ ॥
पाप न राखै देह में, जब सुमिरन करिये ।
एक अच्छर के कहत ही, भौसागर तरिये ॥ २ ॥
अधम-उधारन सब कहैं, प्रभु बिरद तुम्हारा ।
सुनि सरनागत आइया, तब पार उतारा ॥ ३ ॥
तुझ सा गरुवा औ धनी, जा में बड़ई समाई ।
जरत उबारे पांडवा, बाव२ न लाई ॥ ४ ॥
कोटिक औगुन जन करै, प्रभु मनहि न आनै ।
कहत मलूकादास को, अपना करि जानै ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
हरि समान दाता कोउ नाहीं, सदा बिराजैं संतन माहीं ॥१॥
नाम बिसंभर बिस्व जियावै, साँझ बिहान रिजिक३ पहुंचावै ॥२॥
देइ अनेकन मुख पर ऐने,४ औगुन करै सो गुन कर मानै ॥३॥
काहू भाँति अजार५ न देई, जाही को अपना कर लेई ॥४॥
घरी घरी देता दीदार, जन अपने का खिजमतगार ॥५॥
तीन लोक जाके औसाफ६, जन का गुनह करै सब माफ ॥६॥
गरुवा ठाकुर है खुदाइ, कहै मलूक क्या करूँ बड़ाई ॥७॥
(१) हाथी । (२) गरम हवा । (३) अहार । (४) दर्पण । (५) दुख । (६) गुण ।

भेद बानी ३
॥ शब्द ५ ॥
सदा सोहागिन नारि सो, जा के राम भतारा।
मुख माँगे सुख देत हैं, जगजीवन प्यारा ॥ १ ॥
कबहुँ न चढ़ै रँडपुरा१, जानै सब कोई।
अजर अमर अबिनासिया, ता को नास न होई ॥ २ ॥
नर देंही दिन दोय की, सुन गुरजन मेरी।
क्या ऐसों का नेहरा, मुए बिपति घनेरी ॥ ३ ॥
ना उपजै ना बीनसे, संतन सुखदाई।
कहैं मलूक यह जानि के, मैं प्रीति लगाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
नैया मेरी नोके चलने लागी।
आँधी मेंह तनिक नहिं डोलै, साहु चढ़े बड़भागी ॥ १ ॥
रामराय डगमगी छोड़ाई, निर्भय कड़िया२ लैया।
गुन लहासि की हाजत३ नाहीं, आछा साज बनैया ॥ २ ॥
अवसर पड़े तो पर्वत बोझै, तँहूँ न होवै भारी।
धन सतगुरु यह जुगत बताई, तिन को मैं बलिहारी ॥ ३ ॥
सूखे पड़े तो कछु डर नाहीं, ना गहिरे का संसा।
उलटि जाय तो बार न बाँकै, या का अजब तमासा ॥ ४ ॥
कहत मलूक जो बिन सिर खेवै, सो यह रूप बखानै।
या नैया की अजब कथा, कोइ बिरला केवट जानै ॥ ५ ॥
भेद बानी
॥ शब्द १ ॥
मुरसिद मेरा दिल दरियाई, दिल गहि अंदर खोजा।
जा अंदर में सत्तर काबा, मक्का तीसो रोजा ॥ १ ॥
सातो तबक औलिया जा में, भेद न होय जुदाई।
सम्स कमर४ ठाढ़े निमाज में, दरसै जहाँ खोदाई ॥ २ ॥
(१) रँडापा। (२) डाँड़ा। (३) ज़रूरत। (४) सूरज और चाँद।

४ मलूकदासजी की बानी
हवा हिरिस खुदी१ में खोवा, अनल हक्क जहँ जानी ।
बिन चिराग रोसन सब खाना, ता में तख्त सुभानी२ ॥ ३ ॥
बिना आब३ जहँ बहु गुल फूले, अब्र४ बिना जहँ बरसै ।
हूर बिना सरोद५ सब बाजै, चस्म बिना सब दरसै ॥ ४ ॥
ता दरगाह मुसल्ला डारे, बैठा कादिर काजी ।
न्याव करै सीने की जानै, सब को राखै राजी ॥ ५ ॥
जो देखै तो कमला होवै, तब कमाल पद पावै ।
साहेब मिलि तब साहिब होवै, ज्यों जल बूँद समावै ॥ ६ ॥
तिस के पल६ दीदार किये तें, नादिर होय फकीरा ।
मारे काल कलंदर दिल सों, दरदमंद धर धीरा ॥ ७ ॥
ऐसा होय तब पीर कहावै, मनी मान जब खोवै ।
तब मलूक रोसन-जमीर होय, पाँव पसारे सोवै ॥ ८ ॥
॥ शब्द २ ॥
अबधू का कहि तोहि बखानों ।
गगन मँडल में अनहद बोलै, जाति बरन नहिं जानौं ॥ १ ॥
अहो अहो मैं कहा कहों तोहि, नाँव न जानौं देवा ।
सुन्न महल की जुगति बतावे, केहि बिधि कीजे सेवा ॥ २ ॥
तीरथ भरमैँ बड़े कहावैँ, बाद करत हैं सोई ।
अंधधुंध चल जात निरंजन, मर्म न जानै कोई ॥ ३ ॥
अबिगत गति तुम्हरी अबिनासी, घट घट रहत चलाया ।
जहाँ तहाँ तेरी माया खेलै, सतगुरु मोहि लखाया ॥ ४ ॥
वेद पढ़े पढ़ि पंडित भूले, ज्ञानी कथि कथि ज्ञाना ।
कह मलूक तेरी अद्भुत लीला, सो काहू नहि जाना ॥ ५ ॥
(१) आशा, तृष्णा और अहङ्कार । (२) मालिक । (३) पानी । (४) बादल ।
(५) राग । (६) छिन मात्र ।

बिनती ५
बिनती
॥ शब्द १ ॥
अब तेरी सरन आयो राम ॥ १ ॥
जबै सुनिया साध के मुख, पतित - पावन नाम ॥ २ ॥
यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम ॥ ३ ॥
बिषय सेती भयो आजिज१, कह मलूक गुलाम ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
साँचा तू गोपाल, साँच तेरा नाम है।
जहवाँ सुमिरन होय, धन्य सो ठाम है ॥ १ ॥
साँचा तेरा भक्त, जो तुझको जानता।
तीन लोक को राज, मनै नहिं आनता ॥ २ ॥
झूठा नाता छोड़ि, तुझे लव लाइया।
सुमिरि तिहारो नाम, परम पद पाइया ॥ ३ ॥
जिन यह लाहा२ पायो, यह जग आइ कै।
उतरि गयो भव पार, तेरो गुन गाइ कै ॥ ४ ॥
तुही मातु तुही पिता, तुही हितु बंधु है।
कहत मलूकादास, बिना तुझ धुंध३ है ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
एक तुम्हें प्रभु चाहौं राज ॥ टेक ॥
भूपति रंक सेंति४ नहिं पूछों, चरन तुम्हार सँवारयो काज ॥१॥
पाँचो पंडव जरत उबारयो, द्रुपद सुता को राख्यो लाज ॥२॥
संत - बिरोधी ऐसो मारो, ज्यों तीतर पर छूटे बाज ॥३॥
तुम्हें छोड़ि जाने जो दूजा, तेहि पापी पर परिहै गाज ॥४॥
कहैं मलूक मेरो प्रान रमइया, तीन लोक ऊपर सिरताज ॥५॥
(१) लाचार। (२) लाभ । (३) अँधियारा । (४) मुफ्त ।

६ मलूकदासजी की बानी
प्रेम
॥ शब्द १ ॥
कौन मिलावै जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय ॥टेक॥
मैं जो प्यासी पीव की, रटत फिरों पिउ पीव ।
जो जोगिया नहिं मिलिहै हो, तो तुरत निकासूँ जीव ॥ १ ॥
गुरुजी अहेरी मैं हिरनी, गुरु मारै प्रेम का बान ।
जेहि लागै सोइ जानई हो, और दरद नहिं जान ॥ २ ॥
कहैं मलूक सुनु जोगिनी रे, तनहिं में मनहिं समाय ।
तेरे प्रेम के कारने जोगी, सहज मिला मोहिं आय ॥ ३ ॥
॥ शब्द २ ॥
तेरा मैं दीदार - दिवाना ।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ, सुन साहेब रहमाना ॥ १ ॥
हुआ अलमस्त खबर नहिं तन की, पिया प्रेम पियाला ।
ठाढ़ होउँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला ॥ २ ॥
खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यों घर का बंदाजादा१।
नेकी की कुलाह२ सिर दीये, गले पैरहन३ साजा ॥ ३ ॥
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा ।
बाँग जिकिर४ तबही से बिसरी, जबसे यह दिल खोजा ॥ ४ ॥
कहैं मलूक अब कजा५ न करिहौं, दिल ही सों दिल लाया ।
मक्का हज्ज हिये में देखा, पूरा मुरसिद पाया ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
दर्द - दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा ।
एक अकीदा६ लै रहे, ऐसे मन - धीरा ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर यों झूमते, ज्यों माता हाथी ॥ २ ॥
(१) गुलाम । (२) टोपी । (३) मेखली । (४) सुमिरन । (५) छूटी हुई नमाज़
पढ़ना । (६) प्रतीत ।

प्रेम ७
उनकी नजर न आवते, कोइ राजा रंक ।
बंधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ॥ ३ ॥
साहेब मिल साहेब भये, कछु रही न तमाई१ ।
कहैं मलूक तिस घर गये, जहँ पवन न जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
मोरा पीर निरंजना, मैं खिजमतगार ।
तुहीं तुहीं निस दिन रटौं, ठाढ़ा दरबार ॥ १ ॥
महल मियाँ का दिलहिं में, औ महजिद काया ।
छुरी देता ज्ञान की, जब तैं लौ लाया ॥ २ ॥
तसबी फेरौं प्रेम की, हिया करौं निवाज ।
जहँ तहँ फिरौं दिदार को, उसही के काज ॥ ३ ॥
कहैं मलूक अलेख के, अब हाथ बिकाना ।
नाहीं खबर वजूद२ की, मैं फकीर दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
अब की लागी खेप हमारी ।
लेखा दिया साह अपने को, सहजै चीठी फारी ॥ १ ॥
सौदा करत बहुत जुग बीते, दिन दिन टूटी आई ।
अब की बार बेबाक भये हम, जम की तलब छोड़ाई ॥ २ ॥
चार पदारथ नफा भया मोहि, बनिजै कबहूँ न जइहौं ।
अब डहकाय बलाय हमारी, घर ही बैठे खइहौं ॥ ३ ॥
बस्तु अमोलक गुप्तै पाई, ताती वायु न लाऔं ।
हरि हीरा मेरा ज्ञान जौहरी, ताही सों परखाऔं ॥ ४ ॥
देव पितर औ राजा रानी, काहू से दीन न भाखौं ।
कह मलूक मेरे रामै पूँजी, जीव बराबर राखौं ॥ ५ ॥
(१) इच्छा चाह । (२) आपा, शरीर ।

८ मलूकदासजी की बानी
भक्त महिमा
॥ शब्द १ ॥
सोई सहर सुबस बसे, जहँ हरि के दासा ।
दरस किये सुख पाइये, पूजै मन आसा ॥ १ ॥
साकट के घर साधजन, सुपने नहिं जाहीं ।
तेइ तेइ नगर उजाड़ हैं, जहँ साधू नाहीं ॥ २ ॥
मूरत पूजैं बहुत मति, नित नाम पुकारैं ।
कोटि कसाई तुल्य हैं, जो आतम मारैं ॥ ३ ॥
पर दुख दुखिया भक्त है, सो रामहिं प्यारा ।
एक पलक प्रभु आप तें, नहिं राखैं न्यारा ॥ ४ ॥
दीन-बंधु करुना-मयी, ऐसे रघुराजा ।
कहैं मलूक जन आपने को, कौन निवाजा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
देव पितर मेरे हरि के दास । गाजत हौं तिन के बिस्वास ॥ १ ॥
साधू जन पूजौं चित लाई । जिनके दरसन हिया जुड़ाई ॥ २ ॥
चरन पखारत होइ अनंदा । जन्म जन्म के काटे फंदा ॥ ३ ॥
भाव भक्ति करते निस्काम । निसि दिन सुमिरैं केवल राम ॥ ४ ॥
घर बन का उनके भय नाहीं । ज्यों पुरइनि रहता जल माहीं ॥ ५ ॥
भूत परेतन दैंव बहाई । देवखर लीपै मोर बलाई ॥ ६ ॥
बस्तु अनूठी संतन लाऊँ । कहैं मलूक सब भर्म नसाऊँ ॥ ७ ॥
मन और माया के चरित्र
॥ शब्द १ ॥
माया काली नागिनी, जिन डसिया सब संसार हो ॥ टेक ॥
इन्द्र डसा ब्रह्मा डसा, डसिया नारद ब्यास ।
बात कहत सिव को डसा, जेहि घरि एक१ बैठे पास हो ॥ १ ॥
(१) घड़ी भर।

मन और माया के चरित्र ९
कंस डसा सिसुपाल डसा, उन रावन डसिया जाय ।
दस सिर दै लंका मिली, सो छिन में दई बहाय हो ॥ २ ॥
बड़े बड़े गारुड़¹ डसे, कोउ इक थिर न रहाय ।
कच्छ² देस गोरख डसा, जा का अगम बिचार हो ॥ ३ ॥
चुनि चुनि खाये सूरमा, जा की करै जग आस ।
हम से गरीबन को गनै, कहत मलूकादास हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
क्या प्रपंच यह पंच रचा ॥ टेक ॥
आसा तृष्ना सब घट ब्यापी, मुनि गंधर्ब कोई न बचा ॥१॥
उठे बिहान पेट का धंधा, माया लाय किया जग अंधा ॥२॥
तन मन छीन कुटुंब ले लाया, छिप रही आप लोग भर्माया॥३॥
औंधी खोपरी फिरै बिचारे, भूले भक्ति छुधा के मारे ॥४॥
बिनती करत मलूकादासा, थकित भया तेरा देख तमासा॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
राम नाम क्यों लीजै मन राजा ।
काहु भाँति मेरे हाथ न आवै, महा बिकट दल साजा ॥ १ ॥
कई बार इन पैंड़े चलते, लस्कर लूटा मेरा ।
चहुँ जुग राज बिराजी करता, अदब न मानै तेरा ॥ २ ॥
येही सब घट दुन्द मचावै, मारै रैयत खासी ।
काहू नृप को नजर न आनै, एते मान मवासी ॥ ३ ॥
कह मलूक जिय ऐसी आवै, छल बल करि येही गहिये ।
इसहि मारि काया गढ़ लेके, तब खासे घर रहिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
हम से जनि लागे तू माया ।
थोरे से फिर बहुत होयगी, सुनि पैहें रघुराया ॥ १ ॥
(१) साँप के बिष उतारने का मन्त्र जानने वाले । (२) गोरखनाथ की जन्म भूमि ।
२

१० मलूकदासजी की बानी
अपने में है साहेब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहौ, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै चितै१ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तें तेरो जोर न लहिहै२, रच्छपाल अबिनासी ॥ ३ ॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, तातें कछु न बसाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
माया के गुलाम, गीदी क्या जानैं बंदगी ॥ टेक ॥
साधुन से धूम धाम, करत चोरन के काम ।
द्विजन को पूजा देयँ, गरीबन से रिन्दगी ॥ १ ॥
कपट को माला लिये, छापा मुद्रा तिलक दिये ।
बगल में पोथी दावे, लायो फरफंदगी ॥ २ ॥
कहत मलूकदास, छोडु दगाबाजी आस ।
भजहु गोविन्द राय, मेटैं तेरी गंदगी ॥ ३ ॥
॥ चेतावनी ॥
॥ शब्द १ ॥
जा दिन का डर मानता, सोइ बेला आई ।
भक्ति न कीन्ही राम की, ठकमूरी३ खाई ॥ १ ॥
जिन के कारन पचि मुवा, सब दुख की रासी ।
रोइ रोइ जन्म गँवाइया, परी मोह की फाँसी ॥ २ ॥
तन मन धन नहिं आपना, नहिं सुत औ नारी ।
बिछुरत बार न लागई, जिय देखु बिचारी ॥ ३ ॥
मनुष जन्म दुर्लभ अहै, बड़े पुन्ने पाया ।
सोउ अकारथ खोइया, नहिं ठौर लगाया ॥ ४ ॥
(१) नीची निगाह कर देख । (२) चलेगा । (३) चकाचौंधी, हवास पैतरे हो जाना ।

चेतावनी ११
साध सँगत कब करोगे, यह औसर बीता ।
कहै मलूका पाँच में, बैरी एक न जोता ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
राम मिलन क्यों पइये, मोहिं राखा ठगवन घेरि हो ॥
क्रोध तो काला नाग है, काम तो परघट काल ।
आप आप को खैंचते, मोहिं कर डाला बेहाल हो ॥ १ ॥
एक कनक और कामिनी, यह दोनों बटपार ।
मिसरी को छुरी गर लाय के, इन मारा सब संसार हो ॥ २ ॥
इन में कोई ना भला, सब का एक बिचार ।
पैंड़ा मारैं भजन का, कोइ कैसे के उतरै पार हो ॥ ३ ॥
उपजत बिनसत थकि पड़ा, जियरा गया उकताय ।
कहैं मलूक बहु भरमिया, मो पै अब नहिं भरमो जाय हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
इन्द्री खाय गई जग सारा ।
निस दिन चरा करे बन काया, कोई न हाँकनहारा ॥ १ ॥
पीप रक्त करै तन भँझरा, सरबस जाय नसाई ।
जैसी भाँति काठ घुन लागै, बहुरि रहै फोकलाई१ ॥ २ ॥
होता बीज औंट के लोहू, सो देंही का राजा ।
ऐसी बस्तु अकारथ खोवै, अपना करै अकाजा ॥ ३ ॥
मनुवा मार भजै भगवंतहिं, या मति कबहूँ न ठाना२ ।
जियरा दोय घरी के सुख को, कहत मलूक दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
अजब तमासा देखा तेरा । ता तें उदास भया मन मेरा ॥१॥
उतपति परलय नित उठ होई । जग में अमर न देखा कोई ॥२॥
माटी के पुतरे माया लाई । कोइ कहे बहिन कोई कहे भाई ॥३॥
(१) छिलका । (२) दृढ़ किया ।

१२ मलूकदासजी की बानी
झूठा नाता लोग लगावै । मन मेरे परतीत न आवै ॥४॥
जबहीं भेजे तबहिं बुलावै । हुकुम भया कोइ रहन न पावै ॥५॥
उलटत पलटत जग की अँचली१। जैसे फेरै पान तमोली ॥६॥
कहत मलूक रह्यो मोहिं घेरे । अब माया के जाउँ न नेरे ॥७॥
॥ शब्द ५ ॥
देखा सब जग ब्याकुल राम । नित उठि दग्‌धै क्रोध औ काम॥१॥
तुम तो प्रभु जी रहे छिपाय । पाँच मवासी दियो लगाय ॥२॥
एक घड़ी काहु कल ना देय । ज्ञान ध्यान आपुइ हरि लेय ॥३॥
देंह धरे का बड़ा जँजाल । जहँ तहँ फिरता गिरसे काल ॥४॥
आई अचानक करत घात । जिव लै भागत कहत बात ॥५॥
या पापी तें कोउ न बाच । नित उठि पेट नचावै नाच ॥६॥
या का उत्तर देवो मोहि । कैसे के कोउ मिलै तोहिं ॥७॥
जियत नरक है गर्भ बास । उपजत बिनसत बड़ी त्रास ॥८॥
कह मलूक यह बिनती मोरी । इन्हें छोड़ि बल जाऊँ तोरी ॥६॥
॥ शब्द ६ ॥
बाबा मुरदे मूँड़ उठाया ।
लागी अंग बाय दुनियाँ की, राम राय बिसराया ॥ १ ॥
आये पहिरि करम की बेड़ी, हाथ हाथ करि गाढ़ी ।
फूले फिरें जनु अमर भये हैं, प्रीति विषय सों बाढ़ी ॥ २ ॥
काहू के मन चार पाँच की, काहू के मन बीस ।
काहू के मन सात आठ की, सब बाँधे जगदीस ॥ ३ ॥
अब भये सौतिन२ हाथ केरे, घर बीघा३ सौ कीन्ह ।
मेरी मेरी कहि उमर गँवाई, कबहुँ राम ना चीन्ह ॥ ४ ॥
दिना चार के घोड़े सोड़े, दिना चार के हाथी ।
कहत मलूका दिना चार में, बिछुरि जायँगे साथी ॥ ५ ॥
(१) आँचल । (२) माया । (३) बिगहा ।

चेतावनी १३
॥ शब्द ७ ॥
मुवा सकल जग देखिया, मैं तो जियत न देखा कोय हो॥टेक॥
मुवा मुई को व्याहता रे, मुवा ब्याह करि देय ।
मुए बराते जात हैं, एक मुवा बधाई लेय हो ॥ १ ॥
मुवा मुए से लड़न को, मुवा जोर लै जाय ।
मुरदे मुरदे लड़ि मरे, एक मुरदा मन पछिताय हो ॥ २ ॥
अंत एक दिन मरौगे रे, गलि गुलि जैहै चाम ।
ऐसी झूठी देह तैं, काहैं लेव न साँचा नाम हो ॥ ३ ॥
मरने मरना भाँति है रे, जो मरि जानै कोय ।
राम दुआरे जो मरै, फिर बहुरि न मरना होय हो ॥ ४ ॥
इनकी यह गति जानिके, मैं जहँ तहँ फिरौं उदास ।
अजर अमर प्रभु पाइया, कहत मलूकादास हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
सोते सोते जन्म गँवाया ।
माया मोह में सानि पड़ो सो, राम नाम नहिं पाया ॥ १ ॥
मीठी नींद सोये सुख अपने, कबहूँ नहिं अलसाने ।
गाफिल होके महल में सोये, फिर पाछे पछिताने ॥ २ ॥
अजहूँ उठो कहाँ तुम बैठे, बिनती सुनो हमारी ।
चहूँ ओर मैं आहट पाया, बहुत भई भुइँ भारी ॥ ३ ॥
बंदीछोर रहत घट भीतर, खबर न काहू पाई ।
कहत मलूक राम के पहरा, जागो मेरे भाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
अवधू याही करो बिचार ।
दस औतार कहाँ तैं आये, किन रे गढ़े करतार ॥ १ ॥
केहि उपदेस भये तुम जोगी, केहि बिधि आतम जारा ।
केहि कारन तुम काया सताई, केहि बिधि आतम मारा ॥ २ ॥

१४ मलूकदासजी की बानी
थोथे बाँट बाँधि के भोंदू, येहि बिधि जाव न पारा ।
ऋद्धि सिद्धि में बूड़ि मरोगे, पकड़ो खेवनहारा ॥ ३ ॥
अगल बगल का पैंडा पकड़ा, दिन दिन चढ़ता भारा ।
कहत मलूक सुनो रे भोंदू, अबिगत मूल बिसारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
नाम हमारा खाक है, हम खाकी बंदे ।
खाकहिं ते पैदा किये, अति गाफिल गंदे ॥ १ ॥
कबहुँ न करते बन्दगी, दुनिया में भूले ।
आसमान को ताकते, घोड़े चढ़ि फूले ॥ २ ॥
जोरू लड़के खुस किये, साहेब बिसराया ।
राह नेकी की छोड़ि के, बुरा अमल कमाया ॥ ३ ॥
हरदम तिस को याद कर, जिन वजूद संवारा ।
सबै खाक दर खाक है, कुछ समझ गँवारा ॥ ४ ॥
हाथी घोड़े खाक के, खाक खानखानी १।
कहैं मलूक रहि जायगा, औसाफ निसानी ॥ ५ ॥
॥ उपदेश ॥
॥ शब्द १ ॥
अब तो अजपा जपु मन मेरे ॥ टेक ॥
सुर नर असुर टहलुवा जा के, मुनि गंधर्ब जा के चेरे ॥१॥
दस औतार देखि मत भूलो, ऐसे रूप घनेरे ॥२॥
अलख पुरुप के हाथ बिकाने, जब तें नैन निहारे ॥३॥
अबिगत अगम अगोचर अबधू, संग फिरत हैं तेरे ॥४॥
कह मलूक तू चेत अवेता, काल न आवै नेरे ॥५॥
(१) बादशायत ।

उपदेश १५
॥ शब्द २ ॥
ऐ अजीज ईमान तू, काहे को खोवै ।
हिय राखै दरगाह में, तो प्यारा होवै ॥ १ ॥
यह दुनियाँ नाचीज के, जो आसिक होवै ।
भूलै जात खोदाय को, सिर धुन धुन रोवै ॥ २ ॥
इस दुनियाँ नाचीज के, तालिब हैं कुत्ते ।
लज्जत में मोहित हुए, दुख सहे बहुते ॥ ३ ॥
जब लगि अपने आप को, तहकीक न जानै ।
दास मलूका रब्ब को, क्योंकर पहिचानै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साधो भाई अपनी करनी नाहीं ॥ टेक ॥
जे करनी का करैं भरोसा, ते जम के घर जाहीं ॥ १ ॥
ना जानूँ धौं कहाँ मुए थे, ना जानूँ कहँ आये ।
ना जानूँ हरि गर्भ बसेरा, कौने भाँति बनाये ॥ २ ॥
महा कठिन यह हरि की माया, या तें कौन बचावै ।
जौन कहै जड़ मूलहिं त्यागी, तिन को हाथ लगावै ॥ ३ ॥
यह संसार बड़ो भौसागर, प्रलय काल ते भारी ।
बूड़त तें या सोई बाचै, जेहि राखै करतारी ॥ ४ ॥
लच्छ गऊ दे अन्न खात थे, राजा नृग से प्यारे ।
पुन्न करत जमा और गँवाई, लै गिरगिट कै डारे ॥ ५ ॥
गौतम नारि बड़ी पतिबरता, बहुते कीन्हे दाना ।
करनी करि बैकुंठ न पैठी, काहे भई पषाना ॥ ६ ॥
मारहु मान छेम करि बैठो, छोड़ो गर्व गुमाना ।
आपा मेटो राम भजो तुम, कहत मलूक दिवाना ॥ ७ ॥
॥ शब्द ४ ॥
आपा खोज रे जिय भाई ।
आपा खोजे त्रिभुवन सूझै, अंधकार मिटि जाई ॥ १ ॥

१६ मलूकदासजी की बानी
जोई मन सोई परमेसुर, कोइ बिरला अबधू जानै ।
जौन जोगीसुर सब घट ब्यापक, सो यह रूप बखानै ॥ २ ॥
सबद अनाहद होत जहाँ तें, तहाँ ब्रह्म कर बासा ।
गगन मँडल में करत कलोलै, परम जोति परगासा ॥ ३ ॥
कहत मलूका निरगुन के गुन, कोइ बड़भागी गावै ।
क्या गिरही औ क्या बैरागी, जेहि हेरि देयँ सो पावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
किरपा कर गुरु जुगत बताई । आपा खोजो भरम नसाई ॥१॥
आपा खोजे त्रिभुवन सूझै । गुरु परताप काल से जूझै ॥२॥
सबद ब्रह्म का करै बिचार । सोई चलै जियत होइ छार ॥३॥
संतन की सेवा चित लावै । पाहन पूजि न मन भरमावै॥४॥
कामिनि कनक कलह का भंडा। इन ठगनिन सारा जग डंडा॥५॥
होत न हँसै मरत ना रोवै । ता को रंड कबहुँ न बिगोवै॥६॥
परम तत्त जो दृढ़ कर रहै । माया मोह में कबहुँ न बहै ॥७॥
गुरु के बचन करै परतीत । सोई सिद्ध जाय जग जीत ॥८॥
सत संतोष हिये में राखै । सो जन नाम रसायन चाखै ॥६॥
काटे कटै न जारे जरै । अर्ध नाम भजन करि तरै ॥१०॥
न्यारे होयँ पिता और माई । अगिनि बुझै सीतल होइ जाई॥११॥
मनुवाँ मारि करै नौ खंड । कबहुँ न सहै देंह का दंड ॥१२॥
गुरु गोबिंद सार मत दीन्ह । भला भया जो आतम चीन्ह ॥१३॥
बड़े भाग से आतम जागा । कहत मलूक सकल भ्रम भागा ॥१४॥
॥ शब्द ६ ॥
आपा मेटि न हरि भजे, तेई नर डूबे ।
हरि का मर्म न पाइया, कारन कर ऊबे ॥ १ ॥
करें भरोसा पुत्र का, साहेब बिसराया ।
बूड़ गये तरबोर१ को, कहुँ खोज न पाया ॥ २ ॥
(१) अथाह ।

द्वितीय भाग: शब्द एवं पद संग्रह (अजपा जाप व उपसंहार)

उपदेश १७
साध मंडली बैठि के, मूढ़ जाति बखानी ।
हम बड़ हम बड़ करि मुए, बूड़े बिन पानी ॥ ३ ॥
तब के बाँधे तेई नर, अजहूँ नहिं छूटे।
पकरि पकरि भलि भाँति से, जमदूतन लूटे ॥ ४ ॥
काम क्रोध सब त्यागि के, जो रामै गावै ।
दास मलूका यों कहै, तेहि अलख लखावै ॥ ५ ॥
॥ शब्द ७॥
गर्व न कीजे बावरे, हरि गर्व प्रहारी ।
गर्वहिं तें रावन गया, पाया दुख भारी ॥ १ ॥
जरन खुदी१ रघुनाथ के, मन नाहिं सोहाती ।
जा के जिय अभिमान है, ताकी तोरत छाती ॥ २ ॥
एक दया और दीनता, ले रहिये भाई ।
चरन गहो जाय साध के, रीझै रघुराई ॥ ३ ॥
यही बड़ा उपदेस है, परद्रोह न करिये ।
कहैं मलूक हरि सुमिर के, भौसागर तरिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतम को जारे ।
ना वह रीझै धोती टाँगे, ना काया के पखारे ॥ १ ॥
दाया करै धरम मन राखै, घर में रहै उदासी ।
अपना सा दुख सब का जानै, ताहि मिलै अबिनासी ॥ २ ॥
सहै कुसब्द बादहू त्यागै, छाँड़ै गर्व गुमाना ।
यही रीझ मेरे निरंकार की, कहत मलूक दिवाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६ ॥
सब से लालच का मत खोटा ।
लालच तें बैपारी सिट्ठी, दिन दिन आवै टोटा२ ॥ १ ॥
(१) ईर्षा और आपा । (२) घाटा ।
३

१८ मलूकदासजी की बानी
हाथ पसारे आँधर जाता, पानी परहि न भाई ।
माँगे तैं मकु मीच भली, अस जीने कौन बड़ाई ॥ २ ॥
माँगे तैं जग नाक सिकोरे, गोबिंद भला न मानै ।
अनमाँगे राम गले लगावै, बिरला जन कोइ जानै ॥ ३ ॥
जब लग जिव का लोभ न छूटै, तब लग तजै न माया ।
घर घर द्वार फिरै माया के, पूरा गुरु नहिं पाया ॥ ४ ॥
यह मैं कही जे हरि रँग राते, संसारी को नाहीं ।
संसारी तो लालच बंधा, देस देसान्तर जाहीं ॥ ५ ॥
जो माँगे सो कछू न पावै, बिन माँगे हरि देता ।
कहैं मलूक निःकाम भजै जे, ते आपन करि लेता ॥ ६ ॥
॥ शब्द १० ॥
मन तैं इतने भरम गँवावो ।
चलत बिदेस बिप्र जनि पूछो, दिन का दोष न लावो ॥ १ ॥
संझा होय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे ।
जौन कहैं असुरन की बेरिया, मूढ़ दई के मारे ॥ २ ॥
आप भले तो सबहि भलो है, बुरा न काहू कहिये ।
जा के मन कछु बसै बुराई, ता सों भागे रहिये ॥ ३ ॥
लोक बेद का पैंड़ा औरहि, इनकी कौन चलावै ।
आतम मारि पषानै पूजैं, हिरदै दया न आवै ॥ ४ ॥
रहो भरोसे एक राम के, सूरे का मत लीजै ।
संकट पड़े हरज नहिं मानो, जिय का लोभ न कीजै ॥ ५ ॥
किरिया करम अचार भरम है, यही जगत का फंदा ।
माया जाल में बाँधि अँड़ाया१, क्या जानै नर अंधा ॥ ६ ॥
यह संसार बड़ा भौसागर, ता को देखि सकाना२ ।
सरन गये तोहिं अब क्या डर है, कहत मलूक दिवाना ॥ ७ ॥
(१) गिराया। (२) डरा।

उपदेश ५६
॥ शब्द ११ ॥
है हजूर नहिं दूर, हमा-जा भर पूर ।
ज़ाहिरा जहान, जा का ज़हूर पुर नूर ॥ १ ॥
बेसबूह बेनमून, बेवगून ओस्त ।
हमा ओस्त हमा अज़ोस्त, जान-जानाँ दोस्त ॥ २ ॥
शबो रोज़ ज़िकर, फ़िकरही में मशग़ूल ।
तेही दरगाह बीच, पड़े हैं क़बूल ॥ ३ ॥
साहेब है मेरा पीर, क़ुदरत क्या कहिये ।
कहता मलूक बंदा, तक पनाह रहिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
राम कहो राम कहो राम कहो बावरे ।
अवसर न चूक भोंदू, पायो भला दाँव रे ॥ १ ॥
जिन तो को तन दीन्हो, ता को न भजन कीन्हो ।
जनम सिरानो जात, लोहे कैसो ताव रे ॥ २ ॥
रामजी को गाय गाय, रामजी को रिझाव रे ।
रामजी के चरन कमल, चित्त माहिं लाव रे ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास, छोड़ दे तैं झूठी आस ।
आनँद मगन होइ के, हरि गुन गाव रे ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
रस रे निर्गुन राग से, गावै कोइ जाग्रत जोगी ।
अलग रहै संसार से, सो (इस) रस का भोगी ॥ १ ॥
भरम करम सब छाँड़, अनूठा यह मत पूरा ।
सहजै धुन लागी रहै, बाजै अनहद तूरा ॥ २ ॥
लहरैं उठतीं ज्ञान की, बरसै रिमझिम मोती ।
गगन गुफा में बैठ के, देखै जगमग जोती ॥ ३ ॥
सिव नगरी आसन किया, सुन ध्यान लगाया ।
तीनों दसा बिसार के, चौथा पद पाया ॥ ४ ॥