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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 45 में से

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पृष्ठ 20

चेतावनी ११
साध सँगत कब करोगे, यह औसर बीता ।
कहै मलूका पाँच में, बैरी एक न जोता ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
राम मिलन क्यों पइये, मोहिं राखा ठगवन घेरि हो ॥
क्रोध तो काला नाग है, काम तो परघट काल ।
आप आप को खैंचते, मोहिं कर डाला बेहाल हो ॥ १ ॥
एक कनक और कामिनी, यह दोनों बटपार ।
मिसरी को छुरी गर लाय के, इन मारा सब संसार हो ॥ २ ॥
इन में कोई ना भला, सब का एक बिचार ।
पैंड़ा मारैं भजन का, कोइ कैसे के उतरै पार हो ॥ ३ ॥
उपजत बिनसत थकि पड़ा, जियरा गया उकताय ।
कहैं मलूक बहु भरमिया, मो पै अब नहिं भरमो जाय हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
इन्द्री खाय गई जग सारा ।
निस दिन चरा करे बन काया, कोई न हाँकनहारा ॥ १ ॥
पीप रक्त करै तन भँझरा, सरबस जाय नसाई ।
जैसी भाँति काठ घुन लागै, बहुरि रहै फोकलाई१ ॥ २ ॥
होता बीज औंट के लोहू, सो देंही का राजा ।
ऐसी बस्तु अकारथ खोवै, अपना करै अकाजा ॥ ३ ॥
मनुवा मार भजै भगवंतहिं, या मति कबहूँ न ठाना२ ।
जियरा दोय घरी के सुख को, कहत मलूक दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
अजब तमासा देखा तेरा । ता तें उदास भया मन मेरा ॥१॥
उतपति परलय नित उठ होई । जग में अमर न देखा कोई ॥२॥
माटी के पुतरे माया लाई । कोइ कहे बहिन कोई कहे भाई ॥३॥
(१) छिलका । (२) दृढ़ किया ।