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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

४ मलूकदासजी की बानी
हवा हिरिस खुदी१ में खोवा, अनल हक्क जहँ जानी ।
बिन चिराग रोसन सब खाना, ता में तख्त सुभानी२ ॥ ३ ॥
बिना आब३ जहँ बहु गुल फूले, अब्र४ बिना जहँ बरसै ।
हूर बिना सरोद५ सब बाजै, चस्म बिना सब दरसै ॥ ४ ॥
ता दरगाह मुसल्ला डारे, बैठा कादिर काजी ।
न्याव करै सीने की जानै, सब को राखै राजी ॥ ५ ॥
जो देखै तो कमला होवै, तब कमाल पद पावै ।
साहेब मिलि तब साहिब होवै, ज्यों जल बूँद समावै ॥ ६ ॥
तिस के पल६ दीदार किये तें, नादिर होय फकीरा ।
मारे काल कलंदर दिल सों, दरदमंद धर धीरा ॥ ७ ॥
ऐसा होय तब पीर कहावै, मनी मान जब खोवै ।
तब मलूक रोसन-जमीर होय, पाँव पसारे सोवै ॥ ८ ॥
॥ शब्द २ ॥
अबधू का कहि तोहि बखानों ।
गगन मँडल में अनहद बोलै, जाति बरन नहिं जानौं ॥ १ ॥
अहो अहो मैं कहा कहों तोहि, नाँव न जानौं देवा ।
सुन्न महल की जुगति बतावे, केहि बिधि कीजे सेवा ॥ २ ॥
तीरथ भरमैँ बड़े कहावैँ, बाद करत हैं सोई ।
अंधधुंध चल जात निरंजन, मर्म न जानै कोई ॥ ३ ॥
अबिगत गति तुम्हरी अबिनासी, घट घट रहत चलाया ।
जहाँ तहाँ तेरी माया खेलै, सतगुरु मोहि लखाया ॥ ४ ॥
वेद पढ़े पढ़ि पंडित भूले, ज्ञानी कथि कथि ज्ञाना ।
कह मलूक तेरी अद्भुत लीला, सो काहू नहि जाना ॥ ५ ॥
(१) आशा, तृष्णा और अहङ्कार । (२) मालिक । (३) पानी । (४) बादल ।
(५) राग । (६) छिन मात्र ।