मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 45 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन और माया के चरित्र ९
कंस डसा सिसुपाल डसा, उन रावन डसिया जाय ।
दस सिर दै लंका मिली, सो छिन में दई बहाय हो ॥ २ ॥
बड़े बड़े गारुड़¹ डसे, कोउ इक थिर न रहाय ।
कच्छ² देस गोरख डसा, जा का अगम बिचार हो ॥ ३ ॥
चुनि चुनि खाये सूरमा, जा की करै जग आस ।
हम से गरीबन को गनै, कहत मलूकादास हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
क्या प्रपंच यह पंच रचा ॥ टेक ॥
आसा तृष्ना सब घट ब्यापी, मुनि गंधर्ब कोई न बचा ॥१॥
उठे बिहान पेट का धंधा, माया लाय किया जग अंधा ॥२॥
तन मन छीन कुटुंब ले लाया, छिप रही आप लोग भर्माया॥३॥
औंधी खोपरी फिरै बिचारे, भूले भक्ति छुधा के मारे ॥४॥
बिनती करत मलूकादासा, थकित भया तेरा देख तमासा॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
राम नाम क्यों लीजै मन राजा ।
काहु भाँति मेरे हाथ न आवै, महा बिकट दल साजा ॥ १ ॥
कई बार इन पैंड़े चलते, लस्कर लूटा मेरा ।
चहुँ जुग राज बिराजी करता, अदब न मानै तेरा ॥ २ ॥
येही सब घट दुन्द मचावै, मारै रैयत खासी ।
काहू नृप को नजर न आनै, एते मान मवासी ॥ ३ ॥
कह मलूक जिय ऐसी आवै, छल बल करि येही गहिये ।
इसहि मारि काया गढ़ लेके, तब खासे घर रहिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
हम से जनि लागे तू माया ।
थोरे से फिर बहुत होयगी, सुनि पैहें रघुराया ॥ १ ॥
(१) साँप के बिष उतारने का मन्त्र जानने वाले । (२) गोरखनाथ की जन्म भूमि ।
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