मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 45 में से
संदर्भ में पढ़ें१० मलूकदासजी की बानी
अपने में है साहेब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहौ, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै चितै१ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तें तेरो जोर न लहिहै२, रच्छपाल अबिनासी ॥ ३ ॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, तातें कछु न बसाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
माया के गुलाम, गीदी क्या जानैं बंदगी ॥ टेक ॥
साधुन से धूम धाम, करत चोरन के काम ।
द्विजन को पूजा देयँ, गरीबन से रिन्दगी ॥ १ ॥
कपट को माला लिये, छापा मुद्रा तिलक दिये ।
बगल में पोथी दावे, लायो फरफंदगी ॥ २ ॥
कहत मलूकदास, छोडु दगाबाजी आस ।
भजहु गोविन्द राय, मेटैं तेरी गंदगी ॥ ३ ॥
॥ चेतावनी ॥
॥ शब्द १ ॥
जा दिन का डर मानता, सोइ बेला आई ।
भक्ति न कीन्ही राम की, ठकमूरी३ खाई ॥ १ ॥
जिन के कारन पचि मुवा, सब दुख की रासी ।
रोइ रोइ जन्म गँवाइया, परी मोह की फाँसी ॥ २ ॥
तन मन धन नहिं आपना, नहिं सुत औ नारी ।
बिछुरत बार न लागई, जिय देखु बिचारी ॥ ३ ॥
मनुष जन्म दुर्लभ अहै, बड़े पुन्ने पाया ।
सोउ अकारथ खोइया, नहिं ठौर लगाया ॥ ४ ॥
(१) नीची निगाह कर देख । (२) चलेगा । (३) चकाचौंधी, हवास पैतरे हो जाना ।