सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 45 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

मलूकदासजी की बानी
सतगुरु और निज रूप की महिमा
॥ शब्द १ ॥
अब मैं सतगुरु पूरा पाया।
मन तैं जनम जनम डहकाया¹ ॥ १ ॥
कई लाख तुम रंडी² छाँड़ी, केते बेटी बेटा।
कितने बैठे सिरदा³ करते, माया जाल लपेटा ॥ २ ॥
कितने के तुम पित्र कहाये, केते पित्र तुम्हारे।
गया बनारस कर कर थाके, देत देत पिंड हारे ॥ ३ ॥
कई लाख तुम लसकर जोड़े, केते घोड़े हाथी।
तेऊ गये बिलाय छिनक में, कोई रहा न साथी ॥ ४ ॥
आवागवन मिटाया सतगुरु, पूजी मन की आसा।
जीवन मुक्त किया परमेसुर, कहत मलूकादासा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
हमारा सतगुरु बिरले जानै।
सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै ॥ १ ॥
की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता।
की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता ॥ २ ॥
हमरे गुरु की अद्भुत लीला, ना कछु खाय न पीवै।
ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै ॥ ३ ॥
बिन तरवर फल फूल लगावै, सो तो वा का चेला।
छिन में रूप अनेक धरत है, छिन में रहै अकेला ॥ ४ ॥
(१) ठगाया। (२) स्त्री। (३) सिजदा, दंडवत।