मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ मलूकदासजी की बानी
प्रेम
॥ शब्द १ ॥
कौन मिलावै जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय ॥टेक॥
मैं जो प्यासी पीव की, रटत फिरों पिउ पीव ।
जो जोगिया नहिं मिलिहै हो, तो तुरत निकासूँ जीव ॥ १ ॥
गुरुजी अहेरी मैं हिरनी, गुरु मारै प्रेम का बान ।
जेहि लागै सोइ जानई हो, और दरद नहिं जान ॥ २ ॥
कहैं मलूक सुनु जोगिनी रे, तनहिं में मनहिं समाय ।
तेरे प्रेम के कारने जोगी, सहज मिला मोहिं आय ॥ ३ ॥
॥ शब्द २ ॥
तेरा मैं दीदार - दिवाना ।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ, सुन साहेब रहमाना ॥ १ ॥
हुआ अलमस्त खबर नहिं तन की, पिया प्रेम पियाला ।
ठाढ़ होउँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला ॥ २ ॥
खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यों घर का बंदाजादा१।
नेकी की कुलाह२ सिर दीये, गले पैरहन३ साजा ॥ ३ ॥
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा ।
बाँग जिकिर४ तबही से बिसरी, जबसे यह दिल खोजा ॥ ४ ॥
कहैं मलूक अब कजा५ न करिहौं, दिल ही सों दिल लाया ।
मक्का हज्ज हिये में देखा, पूरा मुरसिद पाया ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
दर्द - दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा ।
एक अकीदा६ लै रहे, ऐसे मन - धीरा ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर यों झूमते, ज्यों माता हाथी ॥ २ ॥
(१) गुलाम । (२) टोपी । (३) मेखली । (४) सुमिरन । (५) छूटी हुई नमाज़
पढ़ना । (६) प्रतीत ।