मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेम ७
उनकी नजर न आवते, कोइ राजा रंक ।
बंधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ॥ ३ ॥
साहेब मिल साहेब भये, कछु रही न तमाई१ ।
कहैं मलूक तिस घर गये, जहँ पवन न जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
मोरा पीर निरंजना, मैं खिजमतगार ।
तुहीं तुहीं निस दिन रटौं, ठाढ़ा दरबार ॥ १ ॥
महल मियाँ का दिलहिं में, औ महजिद काया ।
छुरी देता ज्ञान की, जब तैं लौ लाया ॥ २ ॥
तसबी फेरौं प्रेम की, हिया करौं निवाज ।
जहँ तहँ फिरौं दिदार को, उसही के काज ॥ ३ ॥
कहैं मलूक अलेख के, अब हाथ बिकाना ।
नाहीं खबर वजूद२ की, मैं फकीर दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
अब की लागी खेप हमारी ।
लेखा दिया साह अपने को, सहजै चीठी फारी ॥ १ ॥
सौदा करत बहुत जुग बीते, दिन दिन टूटी आई ।
अब की बार बेबाक भये हम, जम की तलब छोड़ाई ॥ २ ॥
चार पदारथ नफा भया मोहि, बनिजै कबहूँ न जइहौं ।
अब डहकाय बलाय हमारी, घर ही बैठे खइहौं ॥ ३ ॥
बस्तु अमोलक गुप्तै पाई, ताती वायु न लाऔं ।
हरि हीरा मेरा ज्ञान जौहरी, ताही सों परखाऔं ॥ ४ ॥
देव पितर औ राजा रानी, काहू से दीन न भाखौं ।
कह मलूक मेरे रामै पूँजी, जीव बराबर राखौं ॥ ५ ॥
(१) इच्छा चाह । (२) आपा, शरीर ।