मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ मलूकदासजी की बानी
बिन दीपक उँजियारा देखे, एँड़ी समुँद थहावै ।
चींटी के पग कुंजर१ बाँधै, जा को गुरू लखावै ॥ ५ ॥
बिन पंखन उड़ि जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवै ।
सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै ॥ ६ ॥
बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई ।
कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३ ॥
नाम तुम्हारा निरमला, निरमोलक हीरा ।
तू साहेब समरत्थ, हम मल मुत्र कै कीरा ॥ १ ॥
पाप न राखै देह में, जब सुमिरन करिये ।
एक अच्छर के कहत ही, भौसागर तरिये ॥ २ ॥
अधम-उधारन सब कहैं, प्रभु बिरद तुम्हारा ।
सुनि सरनागत आइया, तब पार उतारा ॥ ३ ॥
तुझ सा गरुवा औ धनी, जा में बड़ई समाई ।
जरत उबारे पांडवा, बाव२ न लाई ॥ ४ ॥
कोटिक औगुन जन करै, प्रभु मनहि न आनै ।
कहत मलूकादास को, अपना करि जानै ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
हरि समान दाता कोउ नाहीं, सदा बिराजैं संतन माहीं ॥१॥
नाम बिसंभर बिस्व जियावै, साँझ बिहान रिजिक३ पहुंचावै ॥२॥
देइ अनेकन मुख पर ऐने,४ औगुन करै सो गुन कर मानै ॥३॥
काहू भाँति अजार५ न देई, जाही को अपना कर लेई ॥४॥
घरी घरी देता दीदार, जन अपने का खिजमतगार ॥५॥
तीन लोक जाके औसाफ६, जन का गुनह करै सब माफ ॥६॥
गरुवा ठाकुर है खुदाइ, कहै मलूक क्या करूँ बड़ाई ॥७॥
(१) हाथी । (२) गरम हवा । (३) अहार । (४) दर्पण । (५) दुख । (६) गुण ।