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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]

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[सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]

श्रीमहेश्वर उवाच

सांख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि यथावत् ते शुचिस्मिते ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मर्त्यः संसारेषु प्रवर्तते ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शुचिस्मिते! अब मैं तुमसे सांख्यज्ञानका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसे जानकर मनुष्य फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता ॥

ज्ञानेनैव विमुक्तास्ते सांख्याः संन्यासकोविदाः ।
शारीरं तु तपो घोरं सांख्याः प्राहुर्निरर्थकम् ॥
संन्यासकुशल सांख्यज्ञानी ज्ञानसे ही मुक्त हो जाते हैं। वे घोर शारीरिक तपको व्यर्थ बताते हैं ॥

पञ्चविंशतिकं ज्ञानं तेषां ज्ञानमिति स्मृतम् ।
मूलप्रकृतिरव्यक्तमव्यक्ताज्जायते महान् ॥
महतोऽभूदहंकारस्तस्मात् तन्मात्रपञ्चकम् ।
इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्रेभ्यो भवन्त्युत ॥
तेभ्यो भूतानि पञ्चभ्यः शरीरं वै प्रवर्तते ।
इति क्षेत्रस्य संक्षेपः चतुर्विंशतिरिष्यते ॥
पञ्चविंशतिरित्याहुः पुरुषेणेह संख्यया ॥
पचीस तत्त्वोंका ज्ञान ही सांख्यज्ञान माना गया है। मूलप्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं, अव्यक्तसे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है। महत्तत्त्वसे अहंकार प्रकट होता है और अहंकारसे पाँच तन्मात्राओंकी उत्पत्ति होती है। तन्मात्राओंसे दस इन्द्रियों और एक मनकी उत्पत्ति होती है। उनसे पाँच भूत प्रकट होते हैं और पाँच भूतोंसे इस शरीरका निर्माण होता है। यही क्षेत्रका संक्षेप स्वरूप है। इसीको चौबीस तत्त्वोंका समुदाय कहते हैं। इनमें पुरुषकी भी गणना कर लेनेपर कुल पचीस तत्त्व बताये गये हैं ॥

सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
तैः सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिस्त्वात्मजैर्गुणैः ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
विकाराः प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभिः ॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकृतिजनित गुण हैं। प्रकृति इन तीनों आत्मज गुणोंसे सम्पूर्ण लोककी सृष्टि करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति—इन्हें मनीषी पुरुषोंको प्रकृतिके विकार जानना चाहिये ॥

लक्षणं चापि सर्वेषां विकल्पस्त्वादितः पृथक् ।

विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु ।।
इन सबका लक्षण और आरम्भसे ही पृथक्-पृथक् विकल्प मैं विस्तारपूर्वक बताऊँगा, उसकी व्याख्या सुनो ।।

नित्यमेकमणु व्यापि क्रियाहीनमहेतुकम् ।
अग्राह्यमिन्द्रियैः सर्वैरेतदव्यक्तलक्षणम् ।।
अव्यक्तं प्रकृतिमूलं प्रधानं योनिरव्ययम् ।
अव्यक्तस्यैव नामानि शब्दैः पर्यायवाचकैः ।।
नित्य, एक, अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, क्रियाहीन, हेतुरहित और सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य होना—यह अव्यक्तका लक्षण है। अव्यक्त, प्रकृति, मूल, प्रधान, योनि और अविनाशी—इन पर्यायवाची शब्दोंद्वारा अव्यक्तके ही नाम बताये जाते हैं ।।

तत् सूक्ष्मत्वानिर्देश्यं तत् सदित्यभिधीयते ।
तन्मूलं च जगत् सर्वं तन्मूला सृष्टिरिष्यते ।।
वह अव्यक्त अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण अनिर्देश्य है—उसका वाणीद्वारा कोई संकेत नहीं किया जा सकता। वह 'सत्' कहलाता है। सम्पूर्ण जगत्का मूल वही है और सृष्टिका मूल भी उसीको बताया गया है ।।

सत्त्वादयः प्रकृतिजा गुणास्तान् प्रब्रवीम्यहम् ।।
सुखं तुष्टिः प्रकाशश्च त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ।
रागद्वेषौ सुखं दुःखं स्तम्भश्च रजसो गुणाः ।।
सत्त्व आदि जो प्राकृत गुण हैं, उनको बता रहा हूँ। सुख, संतोष, प्रकाश—ये तीन सात्त्विक गुण हैं। राग-द्वेष, सुख-दुःख तथा उद्दण्डता—ये रजोगुणके गुण हैं ।।

अप्रकाशो भयं मोहस्तन्द्री च तमसो गुणाः ।।
श्रद्धा प्रहर्षो विज्ञानमसम्मोहो दया धृतिः ।
सत्त्वे प्रवृद्धे वर्धन्ते विपरीते विपर्ययः ।।
प्रकाशका अभाव, भय, मोह और आलस्यको तमोगुणके गुण समझो। श्रद्धा, हर्ष, विज्ञान, असम्मोह, दया और धैर्य—ये भाव सत्त्वगुणके बढ़नेपर बढ़ते हैं और तमोगुणके बढ़नेपर इनके विपरीत भाव अश्रद्धा आदिकी वृद्धि होती है ।।

कामक्रोधौ मनस्तापो लोभो मोहस्तथा मृषा ।
प्रवृद्धे परिवर्धन्ते रजस्येतानि सर्वशः ।।
विषादः संशयो मोहस्तन्द्री निद्रा भयं तथा ।
तमस्येतानि वर्धन्ते प्रवृद्धे हेत्वहेतुकम् ।।
काम, क्रोध, मानसिक संताप, लोभ, मोह (आसक्ति) तथा मिथ्याभाषण—ये सारे दोष रजोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं। विषाद, संशय, मोह, आलस्य, निद्रा, भय—ये तमोगुणकी वृद्धि होनेपर बढ़ते हैं ।।

एवमन्योन्यमेतानि वर्धन्ते च पुनः पुनः ।
हीयन्ते च तथा नित्यमभिभूतानि भूरिशः ॥
इस प्रकार ये तीनों गुण बारंबार परस्पर बढ़ते हैं और एक-दूसरेसे अभिभूत होनेपर सदा ही क्षीण होते हैं ॥
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं कायेन मनसापि वा ।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तदा ॥
यदा संतापसंयुक्तं चित्तक्षोभकरं भवेत् ।
वर्तते रज इत्येव तदा तदभिचिन्तयेत् ॥
इनमें शरीर अथवा मनसे जो प्रसन्नतायुक्त भाव हो, उसे सात्त्विक भाव है—ऐसा माने और अन्य भावोंकी उपेक्षा कर दे। जब चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला संतापयुक्त भाव हो, तब उसे रजोगुणकी प्रवृत्ति माने ॥
यदा सम्मोहसंयुक्तं यद् विषादकरं भवेत् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥
समासात् सात्त्विको धर्मः समासाद् राजसं धनम् ।
समासात् तामसः कामस्त्रिवर्गे त्रिगुणाः क्रमात् ॥
ब्रह्मादिदेवसृष्टिर्या सात्त्विकीति प्रकीर्त्यते ।
राजसी मानुषी सृष्टिः तिर्यग्योनिस्तु तामसी ॥
जब मोहयुक्त और विषाद उत्पन्न करनेवाला भाव अतर्क्य और अज्ञातरूपसे प्रकट हो, तब उसे तमोगुणका कार्य समझना चाहिये। धर्म सात्त्विक है, धन राजस है और काम तामस बताया गया है। इस प्रकार त्रिवर्गमें क्रमशः तीनों गुणोंकी स्थिति संक्षेपमें बतायी गयी है। ब्रह्मा आदि देवताओंकी जो सृष्टि है, वह सात्त्विकी बतायी जाती है। मनुष्योंकी राजसी सृष्टि है और तिर्यग्योनि तामसी कही गयी है ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥
देवमानुषतिर्यक्षु यद्भूतं सचराचरम् ।
आदिप्रभृति संयुक्तं व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्गुणैः ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि महदादीनि लिङ्गतः ।
विज्ञानं च विवेकश्च महतो लक्षणं भवेत् ॥
सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले पुरुष ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग आदि) में जाते हैं, रजोगुणी पुरुष मध्यलोक (मनुष्य-योनि) में स्थित होते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदिमें स्थित हुए तामस पुरुष अधोगतिको—कीट-पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरक आदिको प्राप्त होते हैं। देवता, मनुष्य तथा तिर्यक् आदि योनियोंमें जो चराचर प्राणी हैं, वे आदि कालसे ही इन तीनों गुणोंद्वारा संयुक्त एवं व्याप्त हैं। अब मैं महत् आदि

त्त्वोंके लक्षण बताऊँगा। बुद्धिके द्वारा जो विवेक और ज्ञान होता है, वही शरीरमें महत्तत्त्वका लक्षण है।।
महान् बुद्धिमतिः प्रज्ञा नामानि महतो विदुः ।
अहङ्कारः स विज्ञेयो लक्षणेन समासतः ।।
अहङ्कारेण भूतानां सर्गो नानाविधो भवेत् ।
अहङ्कारनिवृत्तिर्हि निर्वाणायोपपद्यते ।।
महान्, बुद्धि, मति और प्रज्ञा—ये महत्तत्त्वके नाम माने गये हैं। संक्षेपसे लक्षणद्वारा अहंकारका विशेष ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अहंकारसे ही प्राणियोंकी नाना प्रकारकी सृष्टि होती है। अहंकारकी निवृत्ति मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली होती है ।।
खं वायुरग्निः सलिलं पृथिवी चेति पञ्चमी ।
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।।
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पाँचवीं पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं। ये ही समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।।
शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् ।
स्पर्शवत् प्राणिनां चेष्टा पवनस्य गुणाः स्मृताः ।।
शब्द, श्रवणेन्द्रिय तथा इन्द्रियोंके छिद्र—ये तीनों आकाशसे प्रकट हुए हैं। स्पर्श और प्राणियोंकी चेष्टा—ये वायुके गुण माने गये हैं ।।
रूपं पाकोऽक्षिणी ज्योतिश्चत्वारस्तेजसो गुणाः ।
रसः स्नेहस्तथा जिह्वा शैत्यं च जलजा गुणाः ।।
रूप, पाक, नेत्र और ज्योति—ये चार तेजके गुण हैं। रस, स्नेह, जिह्वा और शीतलता—ये चार जलके गुण हैं ।।
गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिव्यास्ते गुणास्त्रयः ।
इति सर्वगुणा देवि विख्याताः पाञ्चभौतिकाः ।।
गन्ध, घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये पृथिवीके तीन गुण हैं। देवि! इस प्रकार पाँचों भूतोंके समस्त गुण विख्यात हैं ।।
गुणान् पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तराणि तु ।
तस्मान्नैकगुणाश्चेह दृश्यते भूतसृष्टयः ।।
उपलभ्याप्सु ये गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
अपां गन्धगुणं प्राज्ञा नेच्छन्ति कमलेक्षणे ।।
उत्तरोत्तर भूत पूर्व-पूर्व भूतके गुण ग्रहण करते हैं। इसीलिये यहाँ प्राणियोंकी सृष्टि अनेक गुणोंसे युक्त दिखायी देती है। कमलेक्षणे! कुछ अयोग्य मनुष्य जो जलमें सुगन्ध या दुर्गन्ध पाकर गन्धको जलका गुण बताते हैं, उसे विद्वान् पुरुष नहीं स्वीकार करते हैं ।।
तद् गन्धत्वमपां नास्ति पृथिव्या एव तद् गुणः ।

भूमिर्गन्धे रसे स्नेहो ज्योतिश्चक्षुषि संस्थितम् ।।
जलमें गन्ध नहीं है, गन्ध पृथ्वीका ही गुण है। गन्धमें भूमि, रसमें जल तथा नेत्रमें तेजकी स्थिति है ।।

प्राणापानाश्रयो वायुः खेष्वाकाशः शरीरिणाम् ।
केशास्थिनखदन्तत्वक्पाणिपादशिरांसि च ।
पृष्ठोदरकटीग्रीवाः सर्वं भूम्यात्मकं स्मृतम् ।।
प्राण और अपानका आश्रय वायु है। देहधारियोंके शरीरमें जितने छिद्र हैं, उन सबमें आकाश व्याप्त है। केश, हड्डी, नख, दाँत, त्वचा, हाथ, पैर, सिर, पीठ, पेट, कमर और गर्दन—ये सब भूमिके कार्य माने गये हैं ।।

यत् किंचिदपि कायेऽस्मिन् धातुदोषमलाश्रितम् ।
तत् सर्वं भौतिकं विद्धि देहैरेवास्य स्वामिकम् ।।
इस शरीरमें जो कुछ भी धातु, दोष और मल-सम्बन्धी वस्तुएँ हैं, उन सबको पांचभौतिक समझो। शरीरोंके द्वारा ही इस विश्वपर पंचभूतोंका स्वामित्व है ।।

बुद्धीन्द्रियाणि कर्णत्वक्चक्षुर्जिह्वाथ नासिका ।
कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादौ मेढ्रं गुदस्तथा ।।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
बुद्धीन्द्रियार्थान् जानीयाद् भूतेभ्यस्त्वभिनिःसृतान् ।।
कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, वाक्, मेढ्र (लिंग) और गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—इन्हें ज्ञानेन्द्रियोंके विषय समझें। ये पाँचों भूतोंसे प्रकट हुए हैं ।।

वाक्यं क्रिया गतिः प्रीतिरुत्सर्गश्चेति पञ्चधा ।
कर्मेन्द्रियार्थान् जानीयात् ते च भूतोद्भवा मताः ।।
इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते ।
प्रार्थनालक्षणं तच्च इन्द्रियं तु मनः स्मृतम् ।।
वाक्य, क्रिया, गति, प्रीति और उत्सर्ग—ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय जानें। ये भी पञ्चभूतोंसे उत्पन्न हुए माने गये हैं। समस्त इन्द्रियोंका स्वामी या प्रेरक मन कहलाता है। उसका लक्षण है प्रार्थना (किसी वस्तुकी चाह)। मनको भी इन्द्रिय ही माना गया है ।।

नियुङ्क्ते च सदा तानि भूतानि मनसा सह ।
नियमे च विसर्गे च मनसः कारणं प्रभुः ।।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना धृतिः ।
भूताभूतविकारश्च शरीरमिति संस्थितम् ।।
जो प्रभु (आत्मा) मनके नियन्त्रण और सृष्टिमें कारण है, वही मनसहित सम्पूर्ण भूतोंको सदा विभिन्न कार्योंमें नियुक्त करता है। इन्द्रिय, इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव, चेतना,

धृति तथा भूताभूत-विकार—ये सब मिलकर शरीर हैं।।
शरीराच्च परो देही शरीरं च व्यपाश्रितः।
शरीरिणः शरीरस्य सोऽन्तरं वेत्ति वै मुनिः।।
शरीरसे परे शरीरधारी आत्मा है, जो शरीरका ही आश्रय लेकर रहता है। जो शरीर और शरीरीका अन्तर जानता है, वही मुनि है।।
रसः स्पर्शश्च गन्धश्च रूपं शब्दविवर्जितम्।
अशरीरं शरीरेषु दिदृक्षेत् निरिन्द्रियम्।।
रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्दसे रहित, इन्द्रियहीन अशरीरी आत्माको शरीरके भीतर देखनेकी इच्छा करे।।
अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येष्वमरमाश्रितम्।
यः पश्येत् परमात्मानं बन्धनैः स विमुच्यते।।
जो सम्पूर्ण मर्त्य शरीरोंमें अव्यक्त भावसे स्थित एवं अमर है, उस परमात्माको जो देखता है, वह बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।।
स हि सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।
वसत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वितः।।
नैव चोर्ध्वं न तिर्यक् च नाधस्तान्न कदाचन।
इन्द्रियैरिह बुद्ध्या वा न दृश्येत कदाचन।।
नाना भावोंसे युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला ही सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें निवास करता है। वह न ऊपर, न अगल-बगलमें और न नीचे ही कभी दिखायी देता है। वह यहाँ इन्द्रियों अथवा बुद्धिके द्वारा कदापि दिखायी नहीं देता।।
नवद्वारं पुरं गत्वा सततं नियतो वशी।
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च।।
तमेवाहुरणुभ्योऽणुं तं महद्भ्यो महत्तरम्।
बहुधा सर्वभूतानि व्याप्य तिष्ठति शाश्वतम्।।
क्षेत्रज्ञमेकतः कृत्वा सर्वं क्षेत्रमथैकतः।
एवं संविमृशेज्ज्ञानी संयतः सततं हृदि।।
नौ द्वारवाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियमपूर्वक निवास करता है। सबको वशमें रखता है। सम्पूर्ण लोकोंमें चराचर प्राणियोंका शासन करनेवाला ईश्वर भी वही है। उसे अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान् कहते हैं। वह नाना प्रकारके सभी प्राणियोंको व्याप्त करके सदा स्थित रहता है। क्षेत्रज्ञको एक ओर करके दूसरी ओर सम्पूर्ण क्षेत्रको पृथक् करके रखे। संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञानी पुरुष सदा इस प्रकार अपने हृदयमें विचार करता रहे—जड और चेतनकी पृथक्ताका विवेचन किया करे।।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।

अकर्तालेपको नित्यो मध्यस्थः सर्वकर्मणाम् ॥
पुरुष प्रकृतिमें स्थित रहकर ही उससे उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है। वह अकर्ता, निर्लेप, नित्य और समस्त कर्मोंका मध्यस्थ है॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
अजरोऽयमचिन्त्योऽयमव्यक्तोऽयं सनातनः ।
देही तेजोमयो देहे तिष्ठतीत्यपरे विदुः ॥
अपरे सर्वलोकांश्च व्याप्य तिष्ठन्तमीश्वरम् ।
ब्रुवते केचिदत्रैव तिलतैलवदास्थितम् ॥
कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष (जीवात्मा) सुख-दुःखके भोक्तापनमें हेतु कहा जाता है। दूसरे लोग ऐसा मानते हैं कि तेजोमय आत्मा इस शरीरके भीतर स्थित है। यह अजर, अचिन्त्य, अव्यक्त और सनातन है। कुछ विचारक सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हुए परमेश्वरको ही तिलमें तेलकी भाँति इस शरीरमें जीवात्मारूपसे विद्यमान बताते हैं॥
अपरे नास्तिका मूढा भिन्नत्वात् स्थूललक्षणैः ।
नास्त्यात्मेति विनिश्चित्य प्रजास्ते निरयालयाः ॥
एवं नानाविधानेन विमृशन्ति महेश्वरम् ॥
दूसरे मूर्ख नास्तिक मनुष्य स्थूल लक्षणोंसे भिन्न होनेके कारण आत्माकी सत्ता ही नहीं मानते हैं। 'आत्मा नहीं है' ऐसा निश्चय कर वे लोग नरकके निवासी होते हैं। इस प्रकार महेश्वरके विषयमें नाना प्रकारसे विचार करते हैं॥

उमोवाच

ऊहवान् ब्राह्मणो लोके नित्यमक्षरमव्ययम् ।
अस्त्यात्मा सर्वदेहेषु हेतुस्तत्र सुदुर्गमः ॥
उमाने कहा— भगवन्! लोकमें जो विचारशील ब्राह्मण है, वह तो यही बताता है कि सम्पूर्ण शरीरमें नित्य, अक्षर, अविनाशी आत्मा अवश्य है। परंतु इसकी सत्यतामें क्या कारण है, इसे जानना अत्यन्त कठिन है॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ऋषिभिश्चापि देवैश्च व्यक्तमेष न दृश्यते ।
दृष्ट्वा तु तं महात्मानं पुनस्तन्न निवर्तते ॥
तस्मात् तद्दर्शनादेव विन्दते परमां गतिम् ।
इति ते कथितो देवि सांख्यधर्मः सनातनः ॥
कपिलादिभिराचार्यैः सेवितः परमर्षिभिः ॥

**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! ऋषि और देवता भी इस परमात्माको प्रत्यक्ष नहीं देख पाते हैं। जो वास्तवमें उन परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, वह पुनः इस संसारमें नहीं लौटता है। देवि! अतः उस परमात्माके दर्शनसे ही परमगतिकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार यह सनातन सांख्यधर्म तुम्हें बताया गया है; जो कपिल आदि आचार्यों एवं महर्षियोंद्वारा सेवित है ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)