महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश
भीष्म उवाच
एवमुक्तः स भगवान् मैत्रेयं प्रत्यभाषत ।
दिष्ट्यैवं त्वं विजानासि दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! मैत्रेयके इस प्रकार कहनेपर भगवान् वेदव्यास उनसे इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो ऐसी बातोंका ज्ञान रखते हो। भाग्यसे ही तुमको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है ॥ १ ॥
लोको ह्यार्यगुणानेव भूयिष्ठं तु प्रशंसति ।
रूपमानवयोमानश्रीमानाश्चाप्यसंशयम् ॥ २ ॥
दिष्ट्या नाभिभवन्ति त्वां दैवस्तेऽयमनुग्रहः ।
'संसारके लोग उत्तम गुणवाले पुरुषकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं। सौभाग्यकी बात है कि रूप, अवस्था और सम्पत्तिके अभिमान तुम्हारे ऊपर प्रभाव नहीं डालते हैं। यह तुमपर देवताओंका महान् अनुग्रह है। इसमें संशय नहीं है ॥ २ १/२ ॥
यत् ते भृशतरं दानाद् वर्तयिष्यामि तच्छृणु ॥ ३ ॥
यानीहागमशास्त्राणि याश्च काश्चित् प्रवृत्तयः ।
तानि वेदं पुरस्कृत्य प्रवृत्तानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
'अस्तु, अब मैं दानसे भी उत्तम धर्मका तुमसे वर्णन करता हूँ, सुनो। इस जगत्में जितने शास्त्र और जो कोई भी प्रवृत्तियाँ हैं, वे सब वेदको ही सामने रखकर क्रमशः प्रचलित हुए हैं ॥ ३-४ ॥
अहं दानं प्रशंसामि भवानपि तपःश्रुते ।
तपः पवित्रं वेदस्य तपः स्वर्गस्य साधनम् ॥ ५ ॥
'मैं दानकी प्रशंसा करता हूँ, तुम भी तपस्या और शास्त्रज्ञानकी प्रशंसा करते हो, वास्तवमें तपस्या पवित्र और वेदाध्ययन एवं स्वर्गका उत्तम साधन है ॥ ५ ॥
तपसा महदाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम् ।
तपसैव चापनुदेद् यच्चान्यदपि दुष्कृतम् ॥ ६ ॥
'मैंने सुना है कि तपस्या और विद्या दोनोंसे ही मनुष्य महान् पदको प्राप्त करता है। अन्यान्य जो पाप हैं, उन्हें भी तपस्यासे ही वह दूर कर सकता है ॥ ६ ॥
यद् यद्धि किंचित् संधाय पुरुषस्तप्यते तपः ।
सर्वमेतदवाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम् ॥ ७ ॥
‘जो कोई भी उद्देश्य लेकर पुरुष तपस्यामें प्रवृत्त होता है, वह सब उसे तप और विद्यासे प्राप्त हो जाता है; यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ७ ॥
दुरन्वयं दुष्प्रधर्षं दुरापं दुरतिक्रमम् ।
सर्वं वै तपसाभ्येति तपो हि बलवत्तरम् ॥ ८ ॥
‘जिससे सम्बन्ध स्थापित करना अत्यन्त कठिन है, जो दुर्धर्ष, दुर्लभ और दुर्लङ्घ्य है, वह सब तपस्यासे सुलभ हो जाता है; क्योंकि तपस्याका बल सबसे बड़ा है ॥ ८ ॥
सुरापोऽसम्मत्यादायी भ्रूणहा गुरुतल्पगः ।
तपसा तरते सर्वमेनस्खं प्रमुच्यते ॥ ९ ॥
‘शराबी, चोर, गर्भहत्यारा, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला पापी भी तपस्याद्वारा सम्पूर्ण संसारसे पार हो जाता है और अपने पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
सर्वविद्यस्तु चक्षुष्मानपि यादृशतादृशम् ।
तपस्विनं तथैवाहुस्ताभ्यां कार्यं सदा नमः ॥ १० ॥
‘जो सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवीण है, वही नेत्रवान् है और तपस्वी, चाहे जैसा हो उसे भी नेत्रवान् ही कहा जाता है। इन दोनोंको सदा नमस्कार करना चाहिये ॥
सर्वे पूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः ।
दानप्रदाः सुखं प्रेत्य प्राप्नुवन्तीह च श्रियम् ॥ ११ ॥
‘जो विद्याके धनी और तपस्वी हैं, वे सब पूजनीय हैं तथा दान देनेवाले भी इस लोकमें धन-सम्पत्ति और परलोकमें सुख पाते हैं ॥ ११ ॥
इमं च ब्रह्मलोकं च लोकं च बलवत्तरम् ।
अन्नदानैः सुकृतिनः प्रतिपद्यन्ति लौकिकाः ॥ १२ ॥
संसारके पुण्यात्मा पुरुष अन्न-दान देकर इस लोकमें भी सुखी होते हैं और मृत्युके बाद ब्रह्मलोक तथा दूसरे शक्तिशाली लोकको प्राप्त कर लेते हैं ॥
पूजिताः पूजयन्त्येते मानिता मानयन्ति च ।
स दाता यत्र यत्रैति सर्वतः सम्प्रणूयते ॥ १३ ॥
‘दानी स्वयं पूजित और सम्मानित होकर दूसरोंका पूजन और सम्मान करते हैं। दाता जहाँ-जहाँ जाते हैं, सब ओर उनकी स्तुति की जाती है ॥ १३ ॥
अकर्ता चैव कर्ता च लभते यस्य यादृशम् ।
यदि चोर्ध्वं यद्यधो वा स्वाँल्लोकानभियास्यति ॥ १४ ॥
‘मनुष्य दान करता हो या न करता हो, वह ऊपरके लोकमें रहता हो या नीचेके लोकमें, जिसे कर्मानुसार जैसा लोक प्राप्त होगा, वह अपने उसी लोकमें जायगा ॥
प्राप्स्यसि त्वन्नपानानि यानि वाञ्छसि कानिचित् ।
मेधाव्यसि कुले जातः श्रुतवाननृशंसवान् ॥ १५ ॥
कौमारचारी व्रतवान् मैत्रेय निरतो भव ।
एतद् गृहाण प्रथमं प्रशस्तं गृहमेधिनाम् ॥ १६ ॥
‘मैत्रेयजी! तुम जो कुछ चाहोगे, उसके अनुसार तुमको अन्न-पानकी सामग्री प्राप्त होगी। तुम बुद्धिमान्, कुलीन, शास्त्रज्ञ और दयालु हो। तुम्हारी तरुण अवस्था है और तुम व्रतधारी हो। अतः सदा धर्म-पालनमें लगे रहो और गृहस्थोंके लिये जो सबसे उत्तम एवं मुख्य कर्तव्य है, उसे ग्रहण करो—ध्यान देकर सुनो ।।
यो भर्ता वासितातुष्टो भर्तुस्तुष्टा च वासिता ।
यस्मिन्नेवं कुले सर्वं कल्याणं तत्र वर्तते ॥ १७ ॥
‘जिस कुलमें पति अपनी पत्नीसे और पत्नी अपने पतिसे संतुष्ट रहती हो, वहाँ सदा कल्याण होता है ।।
अद्भिर्गात्रान्मलमिव तमोऽग्निप्रभया यथा ।
दानेन तपसा चैव सर्वपापमपोहति ॥ १८ ॥
‘जिस प्रकार जलसे शरीरका मल धुल जाता है और अग्निकी प्रभासे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार दान और तपस्यासे मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।। १८ ।।
(दानेन तपसा चैव विष्णोरभ्यर्चनेन च ।
ब्राह्मणः स महाभाग तरेत् संसारसागरात् ॥
स्वकर्मशुद्धसत्त्वानां तपोभिर्निर्मलात्मनाम् ।
विद्यया गतमोहानां तारणाय हरिः स्मृतः ॥
तदर्चनपरो नित्यं तद्भक्तस्तं नमस्कुरु ।
तद्भक्ता न विनश्यन्ति ह्यष्टाक्षरपरायणाः ॥
प्रणवोपासनपराः परमार्थपरास्त्विह ।
एतैः पावय चात्मानं सर्वपापमपोह्य च ॥)
‘महाभाग! ब्राह्मण दान, तपस्या और भगवान् विष्णुकी आराधनाके द्वारा संसारसागरसे पार हो जाता है। जिन्होंने अपने वर्णोचित कर्मोंका अनुष्ठान करके अन्तःकरणको शुद्ध बना लिया है, तपस्याद्वारा जिनका चित्त निर्मल हो गया है तथा विद्याके प्रभावसे जिनका मोह दूर हो गया है, ऐसे मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान् श्रीहरि माने गये हैं अर्थात् उनका स्मरण करते ही वे अवश्य उद्धार करते हैं। अतः तुम भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर हो सदा उनके भक्त बने रहो और निरन्तर उन्हें नमस्कार करो। अष्टाक्षर मन्त्रके जपमें तत्पर रहनेवाले भगवद्भक्त कभी नष्ट नहीं होते। जो इस जगत्में प्रणवोपासनामें संलग्न और परमार्थ-साधनमें तत्पर हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके संगसे सारा पाप दूर करके अपने आपको पवित्र करो ।।
स्वस्ति प्राप्नुहि मैत्रेय गृहान् साधु व्रजाम्यहम् ।
एतन्मनसि कर्तव्यं श्रेय एवं भविष्यति ॥ १९ ॥
‘मैत्रेय! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं सावधानीके साथ अपने आश्रमको जा रहा हूँ। मैंने जो कुछ बताया है, उसे याद रखना; इससे तुम्हारा कल्याण होगा’ ॥ १९ ॥
तं प्रणम्याथ मैत्रेयः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
स्वस्ति प्राप्नोतु भगवानित्युवाच कृताञ्जलिः ॥ २० ॥
तब मैत्रेयजीने व्यासजीको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! आप मंगल प्राप्त करें’ ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायां
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर २४ श्लोक हैं)