महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन
एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
के पूज्याः के नमस्कार्याः कथं वर्तेत केषु च ।
किमाचारः कीदृशेषु पितामह न रिष्यते ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! संसारमें कौन मनुष्य पूज्य हैं? किनको नमस्कार करना चाहिये? किनके साथ कैसा बर्ताव करना उचित है तथा कैसे लोगोंके साथ किस प्रकारका आचरण किया जाय तो वह हानिकर नहीं होता? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
ब्राह्मणानां परिभव सादयेदपि देवताः ।
ब्राह्मणांस्तु नमस्कृत्य युधिष्ठिर न रिष्यते ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका अपमान देवताओंको भी दुःखमें डाल सकता है। परंतु यदि ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके साथ विनयपूर्ण बर्ताव किया जाय तो कभी कोई हानि नहीं होती ॥ २ ॥
ते पूज्यास्ते नमस्कार्या वर्तेथास्तेषु पुत्रवत् ।
ते हि लोकानिमान् सर्वान् धारयन्ति मनीषिणः ॥ ३ ॥
अतः ब्राह्मणोंकी पूजा करे। ब्राह्मणोंको नमस्कार करे। उनके प्रति वैसा ही बर्ताव करे, जैसा सुयोग्य पुत्र अपने पिताके प्रति करता है; क्योंकि मनीषी ब्राह्मण इन सब लोकोंको धारण करते हैं ॥ ३ ॥
ब्राह्मणाः सर्वलोकानां महान्तो धर्मसेतवः ।
धनत्यागाभिरामाश्च वाक्संयमरताश्च ये ॥ ४ ॥
ब्राह्मण समस्त जगत्की धर्ममर्यादाका संरक्षण करनेवाले सेतुके समान हैं। वे धनका त्याग करके प्रसन्न होते हैं और वाणीका संयम रखते हैं ॥ ४ ॥
रमणीयाश्च भूतानां निधानं च धृतव्रताः ।
प्रणेतारश्च लोकानां शास्त्राणां च यशस्विनः ॥ ५ ॥
वे समस्त भूतोंके लिये रमणीय, उत्तम निधि, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, लोकनायक, शास्त्रोंके निर्माता और परम यशस्वी हैं ॥ ५ ॥
तपो येषां धनं नित्यं वाक् चैव विपुलं बलम् ।
प्रभवश्चैव धर्माणां धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ ६ ॥
सदा तपस्या उनका धन और वाणी उनका महान् बल है। वे धर्मोंकी उत्पत्तिके कारण, धर्मके ज्ञाता और सूक्ष्मदर्शी हैं॥ ६॥
धर्मकामाः स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतवः ।
यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥ ७ ॥
वे धर्मकी ही इच्छा रखनेवाले, पुण्यकर्मोंद्वारा धर्ममें ही स्थित रहनेवाले और धर्मके सेतु हैं। उन्हींका आश्रय लेकर चारों प्रकारकी सारी प्रजा जीवन धारण करती है॥ ७॥
पन्थानः सर्वनेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः ।
पितृपैतामहीं गुर्वीमुद्वहन्ति धुरं सदा ॥ ८ ॥
ब्राह्मण ही सबके पथप्रदर्शक, नेता और सनातन यज्ञ-निर्वाहक हैं। वे बाप-दादोंकी चलायी हुई भारी धर्म-मर्यादाका भार सदा वहन करते हैं॥ ८॥
धुरि ये नावसीदन्ति विषये सद्गवा इव ।
पितृदेवातिथिमुखा हव्यकव्याग्रभोजिनः ॥ ९ ॥
जैसे अच्छे बैल बोझ ढोनेमें शिथिलता नहीं दिखाते, उसी प्रकार वे धर्मका भार वहन करनेमें कष्टका अनुभव नहीं करते हैं। वे ही देवता, पितर और अतिथियोंके मुख तथा हव्य-कव्यमें प्रथम भोजनके अधिकारी हैं॥ ९॥
भोजनादेव लोकांस्त्रींस्त्रायन्ते महतो भयात् ।
दीपः सर्वस्य लोकस्य चक्षुश्चक्षुष्मतामपि ॥ १० ॥
ब्राह्मण भोजनमात्र करके तीनों लोकोंकी महान् भयसे रक्षा करते हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के लिये दीपकी भाँति प्रकाशक तथा नेत्रवालोंके भी नेत्र हैं॥ १०॥
सर्वशिक्षा श्रुतिधना निपुणा मोक्षदर्शिनः ।
गतिज्ञाः सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तकाः ॥ ११ ॥
ब्राह्मण सबको सीख देनेवाले हैं। वेद ही उनका धन है। वे शास्त्रज्ञानमें कुशल, मोक्षदर्शी, समस्त भूतोंकी गतिके ज्ञाता और अध्यात्म-तत्त्वका चिन्तन करनेवाले हैं॥ ११॥
आदिमध्यावसानानां ज्ञातारश्छिन्नसंशयाः ।
परावरविशेषज्ञा गन्तारः परमां गतिम् ॥ १२ ॥
ब्राह्मण आदि, मध्य और अन्तके ज्ञाता, संशयरहित, भूत-भविष्यका विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा परम गतिको जानने और पानेवाले हैं॥ १२॥
विमुक्ता धूतपाप्मानो निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।
मानार्हा मानिता नित्यं ज्ञानविद्भिर्महात्मभिः ॥ १३ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मण सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त और निष्पाप हैं। उनके चित्तपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता। वे सब प्रकारके परिग्रहका त्याग करनेवाले और सम्मान पानेके योग्य हैं। ज्ञानी महात्मा उन्हें सदा ही आदर देते हैं॥ १३॥
चन्दने मलपङ्के च भोजनेऽभोजने समाः ।
समं येषां दुकूलं च तथा क्षौमाजिनानि च ॥ १४ ॥
वे चन्दन और मलकी कीचड़में, भोजन और उपवासमें समान दृष्टि रखते हैं। उनके लिये साधारण वस्त्र, रेशमी वस्त्र और मृगछाला समान हैं ॥ १४ ॥
तिष्ठेयुरप्यभुञ्जाना बहूनि दिवसान्यपि ।
शोषयेयुश्च गात्राणि स्वाध्यायैः संयतेन्द्रियाः ॥ १५ ॥
वे बहुत दिनोंतक बिना खाये रह सकते हैं और अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर स्वाध्याय करते हुए शरीरको सुखा सकते हैं ॥ १५ ॥
अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् ।
लोकानन्यान् सृजेयुस्ते लोकपालांश्च कोपिताः ॥ १६ ॥
ब्राह्मण अपने तपोबलसे जो देवता नहीं है, उसे भी देवता बना सकते हैं। यदि वे क्रोधमें भर जायँ तो देवताओंको भी देवत्वसे भ्रष्ट कर सकते हैं। दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालोंकी रचना कर सकते हैं ॥ १६ ॥
अपेयः सागरो येषामपि शापान्महात्मनाम् ।
येषां कोपाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ॥ १७ ॥
उन्हीं महात्माओंके शापसे समुद्रका पानी पीनेयोग्य नहीं रहा। उनकी क्रोधाग्नि दण्डकारण्यमें आजतक शान्त नहीं हुई ॥ १७ ॥
देवानापि ये देवाः कारणं कारणस्य च ।
प्रमाणस्य प्रमाणं च कस्तानभिभवेद् बुधः ॥ १८ ॥
वे देवताओंके भी देवता, कारणके भी कारण और प्रमाणके भी प्रमाण हैं। भला कौन मनुष्य बुद्धिमान् होकर भी ब्राह्मणोंका अपमान करेगा ॥ १८ ॥
येषां वृद्धश्च बालश्च सर्वः सम्मानमर्हति ।
तपोविद्याविशेषात्तु मानयन्ति परस्परम् ॥ १९ ॥
ब्राह्मणोंमें कोई बूढ़े हों या बालक सभी सम्मानके योग्य हैं। ब्राह्मणलोग आपसमें तप और विद्याकी अधिकता देखकर एक-दूसरेका सम्मान करते हैं ॥ १९ ॥
अविद्वान् ब्राह्मणो देवः पात्रं वै पावनं महत् ।
विद्वान् भूयस्तरो देवः पूर्णसागरसंनिभः ॥ २० ॥
विद्याहीन ब्राह्मण भी देवताके समान और परम पवित्र पात्र माना गया है। फिर जो विद्वान् है उसके लिये तो कहना ही क्या है। वह महान् देवताके समान है और भरे हुए महासागरके समान सद्गुण-सम्पन्न है ॥ २० ॥
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् ।
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥ २१ ॥
ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान् इस भूतलका महान् देवता है। जैसे अग्नि पञ्चभू-संस्कारपूर्वक स्थापित हो या न हो, वह महान् देवता ही है ॥ २१ ॥
श्मशाने ह्यपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हविर्यज्ञे च विधिवद् गृह एवातिशोभते ॥ २२ ॥
तेजस्वी अग्निदेव श्मशानमें हों तो भी दूषित नहीं होते। विधिवत् हविष्यसे सम्पादित होनेवाले यज्ञमें तथा घरमें भी उनकी अधिकाधिक शोभा होती है ॥ २२ ॥
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तते सर्वकर्मसु ।
सर्वथा ब्राह्मणो मान्यो दैवतं विद्धि तत्परम् ॥ २३ ॥
इस प्रकार यद्यपि ब्राह्मण सब प्रकारके अनिष्ट कर्मोंमें लगा हो तो भी वह सर्वथा माननीय है। उसे परम देवता समझो ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि
ब्राह्मणप्रशंसायामेकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसाविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥