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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]

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[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

इदं मे तत्त्वतो देव वक्तुमर्हस्यशेषतः ।
हिंसामकृत्वा यो मर्त्यो ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मनुष्य ब्राह्मणकी हिंसा किये बिना ही ब्रह्महत्याके पापसे कैसे लिप्त हो जाता है, इस विषयको पूर्णतया ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थं वृत्तिकर्शितम् ।
ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! जो जीविकारहित ब्राह्मणको स्वयं ही भिक्षा देनेके लिये बुलाकर पीछे इनकार कर जाता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।

मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत ।
वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला पुरुष मध्यस्थ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

आश्रमे वाऽऽलये वापि ग्रामे वा नगरेऽपि वा ।
अग्निं यः प्रक्षिपेत् क्रुद्धस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो क्रोधमें भरकर किसी आश्रम, घर, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

गोकुलस्य तृषार्तस्य जलान्ते वसुधाधिप ।
उत्पादयति यो विघ्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
पृथ्वीनाथ! प्याससे तड़पते हुए गोसमुदायको जो पानीके निकट पहुँचनेमें बाधा डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् ।
दूषयत्यनभिज्ञाय तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो परम्परागत वैदिक श्रुतियों और ऋषिप्रणीत सच्छास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।

चक्षुषा वापि हीनस्य पङ्गोर्वापि जडस्य वा ।
हरेद् वै यस्तु सर्वस्वं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो अन्धे, पंगु और गूँगे मनुष्यका सर्वस्व हरण कर लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य अतिक्रम्य च शासनम्।
वर्तते यस्तु मूढात्मा तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो मूर्खतावश गुरुको ‘तू’ कहकर पुकारता है, हुंकारके द्वारा उनका तिरस्कार करता है तथा उनकी आज्ञाका उल्लंघन करके मनमाना बर्ताव करता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥
यावत्सारो भवेद् दीनस्तन्नाशे यस्य दुःस्थितिः।
तत् सर्वस्वं हरेद् यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो दीन मनुष्य किंचित् प्राप्त वस्तुओंको ही अपने लिये सार-सर्वस्व समझता है और उनके नाशसे जिसकी दुर्दशा हो जाती है, ऐसे मनुष्यका जो पुरुष सर्वस्व छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥

युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामपि दानानां यत् तु दानं विशिष्यते।
अभोज्यान्नांश्च ये विप्रास्तान् वदस्व सुरोत्तम॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवान्! जो दान सब दानोंसे श्रेष्ठ माना गया हो, उसको बतलाइये। सुरश्रेष्ठ! जिन ब्राह्मणोंका अन्न खाने योग्य न हो, उनका परिचय दीजिये॥

श्रीभगवानुवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ब्रह्मपुरस्सराः।
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति॥
श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता अन्नकी प्रशंसा करते हैं, अतः अन्नके समान दान न कोई हुआ है न होगा॥
अन्नमूर्जस्करं लोके ह्यन्नात् प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
अभोज्यान्नान् मया राजन् वक्ष्यमाणान् निबोध मे॥
क्योंकि अन्न ही इस जगत्में बल देनेवाला है तथा अन्नके ही आधारपर प्राण टिके रहते हैं। राजन्! अब मैं उन लोगोंका परिचय दे रहा हूँ, जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य नहीं माना गया है, ध्यान देकर सुनो॥
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रुद्धस्य निकृतस्य च।
अभिशप्तस्य षाण्ढस्य पाकभेदकरस्य च॥
चिकित्सकस्य दूतस्य तथा चोच्छिष्टभोजिनः।
उग्रान्नं सूतकान्नं च शूद्रोच्छेषणमेव च॥
द्विषदन्नं न भोक्तव्यं पतितान्नं च यच्छ्रुतम्।
यज्ञमें दीक्षित, कदर्य, क्रोधी, शठ, शापग्रस्त, नपुंसक, भोजनमें भेद करनेवाले, चिकित्सक, दूत, उच्छिष्टभोजी, वर्णसंकर तथा अशौचमें पड़े हुए मनुष्यका अन्न, शूद्रकी

जूठन, शत्रु का अन्न और जो पतितका अन्न माना गया है, उसे भी नहीं खाना चाहिये ।।
तथा च पिशुनस्यान्नं यज्ञविक्रयिणस्तथा ।।
शैलूषं तन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ।
अम्बष्ठकनिषादानां रङ्गावतरकस्य च ।।
सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ।
सूतानां शौण्डिकानां च वैद्यस्य रजकस्य च ।।
स्त्रीजितस्य नृशंसस्य तथा माहिषिकस्य च ।
अनिर्दशानां प्रेतानां गणिकानां तथैव च ।।
इसी प्रकार चुगलखोर, यज्ञका फल बेचनेवाले, नट और कपड़ा बुननेवाले जुलाहेका अन्न एवं कृतघ्नका अन्न, अम्बष्ठ, निषाद, रंगभूमिमें नाटक खेलनेवाले, सुनार, वीणा बजाकर जीनेवाले, हथियार बेचनेवाले, सूत, शराब बेचनेवाले, वैद्य, धोबी, स्त्रीके वशमें रहनेवाले, क्रूर और भैंस चरानेवालेका अन्न भी अग्राह्य माना गया है। जिनके यहाँ मरणाशौचके दस दिन न बीते हों, उनका तथा वेश्याओंका अन्न नहीं खाना चाहिये ।।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविक्रन्तिनः ।।
राजाका अन्न तेजका, शूद्रका अन्न ब्राह्मणत्वका, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न सुयशका नाश करता है ।।
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकीर्तितम् ।
पूयं चिकित्सकस्यान्नं शुक्लं तु वृषलीपतेः ।।
विष्टा वार्धुषिक्स्यान्नं तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।
किसी समूहका और वेश्याका अन्न भी लोकनिन्दित माना गया है। वैद्यका अन्न पीब तथा व्यभिचारिणीके पतिका अन्न वीर्यके समान एवं व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान माना गया है, इसलिये उसका त्याग कर देना चाहिये ।।
अमत्यान्नमथैतेषां भुक्त्वा तु त्र्यहं क्षियेत् ।
मत्या भुक्त्वा सकृद् वापि प्राजापत्यं चरेद् द्विजः ।।
यदि अनजानमें इनका अन्न ग्रहण कर लिया गया हो तो तीन दिनतक उपवास करना चाहिये; किंतु जान-बूझकर एक बार भी इनका अन्न खा लेनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रतका आचरण करना चाहिये ।।
दानानां च फलं यद् वै शृणु पाण्डव तत्त्वतः ।
जलदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः ।।
पाण्डुनन्दन! अब मैं दानोंका यथार्थ फल बतला रहा हूँ, सुनो। जल-दान करनेवालेको तृप्ति होती है और अन्न देनेवालेको अक्षय सुख मिलता है ।।
तिलदश्च प्रजामिष्टां दीपश्चक्षुरुत्तमम् ।

भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ॥
तिलका दान करनेवाला मनुष्य मनके अनुरूप संतान, दीप-दान करनेवाला पुरुष उत्तम नेत्र, भूमि देनेवाला भूमि और सुवर्ण-दान करनेवाला दीर्घ आयु पाता है ।।

गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् ।
वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ॥
गृह देनेवालेको सुन्दर भवन और चाँदी दान करनेवालेको उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें और अश्वदान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है ।।

अनडुहः श्रियं जुष्टां गोदो गोलोकमश्रुते ।
यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः ॥
गाड़ी ढोनेवाले बैलका दान करनेवाला मनोऽनुकूल लक्ष्मीको पाता है और गो-दान करनेवाला पुरुष गोलोकके सुखका अनुभव करता है। सवारी और शय्या-दान करनेवाले पुरुषको स्त्रीकी तथा अभय दान देनेवालेको ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।।

धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाम्यताम् ।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ॥
धान्य दान करनेवाला मनुष्य शाश्वत सुख पाता है और वेद प्रदान करनेवाला पुरुष परब्रह्मकी समताको प्राप्त होता है। वेदका दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है ।।

हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु ।
योऽर्चितः प्रतिगृह्णाति दद्यादुचितमेव च ।
तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं च विपर्यये ॥
जो सोना, पृथ्वी, गौ, अश्व, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि वस्तुओंको सम्मानपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायानुसार आदरपूर्वक दान करता है, वे दोनों ही स्वर्गमें जाते हैं; परंतु जो इसके विपरीत अनुचितरूपसे देते और लेते हैं, उन दोनोंको नरकमें गिरना पड़ता है ।।

अनृतं न वदेद् विद्वांस्तपस्तप्त्वा न विस्मयेत् ।
नार्तोऽप्यभिभवेद् विप्रान् न दत्त्वा परिकीर्तयेत् ॥
विद्वान् पुरुष कभी झूठ न बोले, तपस्या करके उसपर गर्व न करे, कष्टमें पड़ जानेपर भी ब्राह्मणोंका अनादर न करे तथा दान देकर उसका बखान न करे ।।

यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् ।
आयुर्विप्रावमानेन दानं तु परिकीर्तनात् ॥
झूठ बोलनेसे यज्ञका क्षय होता है, गर्व करनेसे तपस्याका क्षय होता है, ब्राह्मणके अपमानसे आयुका और अपने मुँहसे बखान करनेपर दानका नाश हो जाता है ।।

एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते ।
एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम् ॥

जीव अकेले जन्म लेता है, अकेले मरता है तथा अकेले ही पुण्यका फल भोगता है और अकेले ही पापका फल भोगता है ।।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुवर्तते ।।
बन्धु-बान्धव मनुष्यके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान पृथ्वीपर डालकर मुँह फेरकर चल देते हैं। उस समय केवल धर्म ही जीवके पीछे-पीछे जाता है ।।
अनागतानि कार्याणि कर्तुं गणयते मनः ।
शारीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तकः ।।
तस्माद् धर्मसहायस्तु धर्मं संचिनुयात् सदा ।
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।।
मनुष्यका मन भविष्यके कार्योंको करनेका हिसाब लगाया करता है, किंतु काल उसके नाशवान् शरीरको लक्ष्य करके मुसकराता रहता है; इसलिये धर्मको ही सहायक मानकर सदा उसीके संग्रहमें लगे रहना चाहिये; क्योंकि धर्मकी सहायतासे मनुष्य दुस्तर नरकके पार हो जाता है ।।
येषां तडागानि बहूदकानि
सभाश्च कूपाश्च शुभाः प्रपाश्च ।
अन्नप्रदानं मधुरा च वाणी
यमस्य ते निर्विषया भवन्ति ।।
जिन्होंने अधिक जलसे भरे हुए अनेक सरोवर, धर्मशालाएँ, कुएँ और सुन्दर पौंसले बनवाये हैं तथा जो सदा अन्नका दान करते हैं और मीठी वाणी बोलते हैं, उनपर यमराजका जोर नहीं चलता ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)