महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(पुत्रदर्शनपर्व)
(पुत्रदर्शनपर्व)
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका मृत बान्धवोंके शोकसे दुखी होना तथा गान्धारी और कुन्तीका व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध
जनमेजय उवाच
वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ ।
सभार्ये नृपशार्दूल वध्वा कुन्त्या समन्विते ॥ १ ॥
विदुरे चापि संसिद्धे धर्मराजं व्यपाश्रिते ।
वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले ॥ २ ॥
यत् तदाश्चर्यमिति वै करिष्यामीत्युवाच ह ।
व्यासः परमतेजस्वी महर्षिस्तद् वदस्व मे ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! जब अपनी धर्मपत्नी गान्धारी और बहू कुन्तीके साथ नृपश्रेष्ठ पृथिवीपति धृतराष्ट्र वनवासके लिये चले गये, विदुरजी सिद्धिको प्राप्त होकर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें प्रविष्ट हो गये और समस्त पाण्डव आश्रममण्डलमें निवास करने लगे, उस समय परम तेजस्वी व्यासजीने जो यह कहा था कि 'मैं आश्चर्यजनक घटना प्रकट करूँगा' वह किस प्रकार हुई? यह मुझे बताइये ॥ १—३ ॥
वनवासे च कौरव्यः कियन्तं कालमच्युतः ।
युधिष्ठिरो नरपतिर्न्यवसत् सजनस्तदा ॥ ४ ॥
अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर कितने दिनोंतक सब लोगोंके साथ वनमें रहे थे? ॥ ४ ॥
किमाहाराश्च ते तत्र ससैन्या न्यवसन् प्रभो ।
सान्तःपुरा महात्मान इति तद् ब्रूहि मेऽनघ ॥ ५ ॥
प्रभो! निष्पाप मुने! सैनिकों और अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वे महात्मा पाण्डव क्या आहार करके वहाँ निवास करते थे? ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तेऽनुज्ञातास्तदा राजन् कुरुराजेन पाण्डवाः ।
विविधान्यन्नपानानि विश्राम्यानुभवन्ति ते ।। ६ ।।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! कुरुराज धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको नाना प्रकारके अन्न-पान ग्रहण करनेकी आज्ञा दे दी थी; अतः वे वहाँ विश्राम पाकर सभी तरहके उत्तम भोजन करते थे ।। ६ ।।
मासमेकं विजह्रुस्ते ससैन्यान्तःपुरा वने ।
अथ तत्रागमद् व्यासो यथोक्तं ते मयानघ ।। ७ ।।
वे सेनाओं तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वहाँ एक मासतक वनमें विहार करते रहे। अनघ! इसी बीचमें जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है, वहाँ व्यासजीका आगमन हुआ ।। ७ ।।
तथा च तेषां सर्वेषां कथाभिर्नृपसंनिधौ ।
व्यासमन्वास्यतां राजन्नाजग्मुर्मुनयो परे ।। ८ ।।
राजन्! राजा धृतराष्ट्रके समीप व्यासजीके पीछे बैठे हुए उन सबलोगोंमें जब उपर्युक्त बातें होती रहीं, उसी समय वहाँ दूसरे-दूसरे मुनि भी आये ।। ८ ।।
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ।
विश्वावसुस्तुम्बुरुश्च चित्रसेनश्च भारत ।। ९ ।।
भारत! उनमें नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, विश्वावसु, तुम्बुरु तथा चित्रसेन भी थे ।। ९ ।।
तेषामपि यथान्यायं पूजां चक्रे महातपाः ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।। १० ।।
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे महातपस्वी कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबकी भी यथोचित पूजा की ।। १० ।।
निषेदुस्ते ततः सर्वे पूजां प्राप्य युधिष्ठिरात् ।
आसनेषु च पुण्येषु बर्हिणेषु वरेषु च ।। ११ ।।
युधिष्ठिरसे पूजा ग्रहण करके वे सब-के-सब मोरपंखके बने हुए पवित्र एवं श्रेष्ठ आसनोंपर विराजमान हुए ।। ११ ।।
तेषु तत्रोपविष्टेषु स तु राजा महामतिः ।
पाण्डुपुत्रैः परिवृतो निषसाद कुरूद्वह ।। १२ ।।
कुरुश्रेष्ठ! उन सबके बैठ जानेपर पाण्डवोंसे घिरे हुए परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र बैठे ।। १२ ।।
गान्धारी चैव कुन्ती च द्रौपदी सात्वती तथा ।
स्त्रियश्चान्यास्तथान्याभिः सहोपविविशुस्ततः ।। १३ ।।
गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा तथा दूसरी स्त्रियाँ अन्य स्त्रियोंके साथ आस-पास ही एक साथ बैठ गयीं ।। १३ ।।
तेषां तत्र कथा दिव्या धर्मिष्ठाश्चाभवन् नृप ।
ऋषीणां च पुराणानां देवासुरविमिश्रिताः ॥ १४ ॥
नरेश्वर! उस समय उन लोगोंमें धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली दिव्य कथाएँ होने लगीं। प्राचीन ऋषियों तथा देवताओं और असुरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली चर्चाएँ छिड़ गयीं ॥ १४ ॥
ततः कथान्ते व्यासस्तं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठः पुनरेव स तद् वचः ॥ १५ ॥
प्रीयमाणो महातेजाः सर्ववेदविदां वरः ।
बातचीतके अन्तमें सम्पूर्ण वेदवेत्ताओं और वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महर्षि व्यासजीने प्रसन्न होकर प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रसे पुनः वही बात कही ॥ १५ ½ ॥
विदितं मम राजेन्द्र यत् ते हृदि विवक्षितम् ॥ १६ ॥
दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै ।
‘राजेन्द्र! तुम्हारे हृदयमें जो कहनेकी इच्छा हो रही है, उसे मैं जानता हूँ। तुम निरन्तर अपने मरे हुए पुत्रोंके शोकसे जलते रहते हो ॥ १६ ½ ॥
गान्धार्याश्चैव यद् दुःखं हृदि तिष्ठति नित्यदा ॥ १७ ॥
कुन्त्याश्च यन्महाराज द्रौपद्याश्च हृदि स्थितम् ।
‘महाराज! गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदीके हृदयमें भी जो दुःख सदा बना रहता है, वह भी मुझे ज्ञात है ॥
यच्च धारयते तीव्रं दुःखं पुत्रविनाशजम् ॥ १८ ॥
सुभद्रा कृष्णभगिनी तच्चापि विदितं मम ।
‘श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेका जो दुःसह दुःख हृदयमें धारण करती है, वह भी मुझसे अज्ञात नहीं है ॥ १८ ½ ॥
श्रुत्वा समागममिमं सर्वेषां वस्तुतो नृप ॥ १९ ॥
संशयच्छेदनायाहं प्राप्तः कौरवनन्दन ।
‘कौरवनन्दन! नरेश्वर! वास्तवमें तुम सब लोगोंका यह समागम सुनकर तुम्हारे मानसिक संदेहोंका निवारण करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ १९ ½ ॥
इमे च देवगन्धर्वाः सर्वे चेमे महर्षयः ॥ २० ॥
पश्यन्तु तपसो वीर्यमद्य मे चिरसम्भृतम् ।
‘ये देवता, गन्धर्व और महर्षि सब लोग आज मेरी चिरसंचित तपस्याका प्रभाव देखें ॥ २० ½ ॥
तदुच्यतां महाप्राज्ञ कं कामं प्रददामि ते ॥ २१ ॥
प्रवणोऽस्मि वरं दातुं पश्य मे तपसः फलम् ।
‘महाप्राज्ञ नरेश! बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा अभीष्ट मनोरथ प्रदान करूँ? आज मैं तुम्हें मनोवाञ्छित वर देनेको तैयार हूँ। तुम मेरी तपस्याका फल देखो’ ।। २१ १/२ ।।
एवमुक्तः स राजेन्द्रो व्यासेनामितबुद्धिना ।। २२ ।।
मुहूर्तमिव संचिन्त्य वचनायोपचक्रमे ।
अमित बुद्धिमान् महर्षि व्यासके ऐसा कहनेपर महाराज धृतराष्ट्रने दो घड़ीतक विचार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया ।। २२ १/२ ।।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतश्च सफलं जीवितं च मे ।। २३ ।।
यन्मे समागमोऽद्येह भवद्भिः सह साधुभिः ।
‘भगवन्! आज मैं धन्य हूँ, आपलोगोंकी कृपाका पात्र हूँ तथा मेरा यह जीवन भी सफल है; क्योंकि आज यहाँ आप-जैसे साधु-महात्माओंका समागम मुझे प्राप्त हुआ है ।। २३ १/२ ।।
अद्य चाप्यवगच्छामि गतिमिष्टामिहात्मनः ।। २४ ।।
ब्रह्मकल्पैर्भवद्भिर्यत् समेतोऽहं तपोधनाः ।
‘तपोधनो! आप ब्रह्मतुल्य महात्माओंका जो संग मुझे प्राप्त हुआ उससे मैं समझता हूँ कि यहाँ अपने लिये अभीष्ट गति मुझे प्राप्त हो गयी ।। २४ १/२ ।।
दर्शनादेव भवतां पूतोऽहं नात्र संशयः ।। २५ ।।
विद्यते न भयं चापि परलोकान्ममानघाः ।
‘इसमें संदेह नहीं कि मैं आपलोगोंके दर्शनमात्रसे पवित्र हो गया। निष्पाप महर्षियो! अब मुझे परलोकसे कोई भय नहीं है ।। २५ १/२ ।।
किं तु तस्य सुदुर्बुद्धेर्मन्दस्यापनयैर्भृशम् ।। २६ ।।
दूयते मे मनो नित्यं स्मरतः पुत्रगृद्धिनः ।
‘परन्तु अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले उस मन्दमति दुर्योधनके अन्यायोंसे जो मेरे सारे पुत्र मारे गये हैं, उन्हें पुत्रोंमें आसक्त रहनेवाला मैं सदा याद करता हूँ; इसलिये मेरे मनसे बड़ा दुःख होता है ।। २६ १/२ ।।
अपापाः पाण्डवा येन निकृताः पापबुद्धिना ।। २७ ।।
घातिता पृथिवी येन सहया सनराद्विपा ।
पापपूर्ण विचार रखनेवाले उस दुर्योधनने निरपराध पाण्डवोंको सताया तथा घोड़ों, मनुष्यों और हाथियोंसहित इस सारी पृथ्वीके वीरोंका विनाश करा डाला ।। २७ १/२ ।।
राजानश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः ।। २८ ।।
आगम्य मम पुत्रार्थे सर्वे मृत्युवशं गताः ।
अनेक देशोंके स्वामी महामनस्वी नरेश मेरे पुत्रकी सहायताके लिये आकर सब-के-सब मृत्युके अधीन हो गये ।। २८ १/२ ।।
ये ते पितॄंश्च दारांश्च प्राणांश्च मनसः प्रियान् ।। २९ ।।
परित्यज्य गताः शूराः प्रेतराजनिवेशनम् ।
वे सब शूरवीर भूपाल अपने पिताओं, पत्नियों, प्राणों और मनको प्रिय लगनेवाले भोगोंका परित्याग करके यमलोकको चले गये ।। २९ १/२ ।।
का नु तेषां गतिर्ब्रह्मन् मित्रार्थे ये हता मृधे ।। ३० ।।
तथैव पुत्रपौत्राणां मम ये निहता युधि ।
‘ब्रह्मन्! जो मित्रके लिये युद्धमें मारे गये उन राजाओंकी क्या गति हुई होगी? तथा जो रणभूमिमें वीरगतिको प्राप्त हुए हैं, उन मेरे पुत्रों और पौत्रोंको किस गतिकी प्राप्ति हुई होगी? ।। ३० १/२ ।।
दूयते मे मनोऽभीक्ष्णं घातयित्वा महाबलम् ।। ३१ ।।
भीष्मं शान्तनवं वृद्धं द्रोणं च द्विजसत्तमम् ।
‘महाबली शान्तनुनन्दन भीष्म तथा वृद्ध ब्राह्मणप्रवर द्रोणाचार्यका वध कराकर मेरे मनको बारंबार दुःसह संताप प्राप्त होता है ।। ३१ १/२ ।।
मम पुत्रेण मूढेन पापेनाकृतबुद्धिना ।। ३२ ।।
क्षयं नीतं कुलं दीप्तं पृथिवीराज्यमिच्छता ।
‘अपवित्र बुद्धिवाले मेरे पापी एवं मूर्ख पुत्रने समस्त भूमण्डलके राज्यका लोभ करके अपने दीप्तिमान् कुलका विनाश कर डाला ।। ३२ १/२ ।।
एतत् सर्वमनुस्मृत्य दह्यमानो दिवानिशम् ।। ३३ ।।
न शान्तिमधिगच्छामि दुःखशोकसमाहतः ।
इति मे चिन्तयानस्य पितः शान्तिर्न विद्यते ।। ३४ ।।
‘ये सारी बातें याद करके मैं दिन-रात जलता रहता हूँ। दुःख और शोकसे पीड़ित होनेके कारण मुझे शान्ति नहीं मिलती है। पिताजी! इन्हीं चिन्ताओंमें पड़े-पड़े मुझे कभी शान्ति नहीं प्राप्त होती’ ।। ३३-३४ ।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा विविधं तस्य राजर्षेः परिदेवितम् ।
पुनर्नवीकृतः शोको गान्धार्या जनमेजय ।। ३५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजर्षि धृतराष्ट्र-का वह भाँति-भाँतिसे विलाप सुनकर गान्धारीका शोक फिरसे नया-सा हो गया ।। ३५ ।।
कुन्त्या द्रुपदपुत्र्याश्च सुभद्रायास्तथैव च ।
तासां च वरनारीणां वधूनां कौरवस्य ह ।। ३६ ।।
कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा तथा कुरुराजकी उन सुन्दरी बहुओंका शोक भी फिरसे उमड़ आया ।। ३६ ।।
पुत्रशोकसमाविष्टा गान्धारी त्विदमब्रवीत् ।
श्वशुरं बद्धनयना देवी प्राञ्जलिरुत्थिता ॥ ३७ ॥
आँखोंपर पट्टी बाँधे गान्धारी देवी श्वशुरके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं और पुत्रशोकसे संतप्त होकर इस प्रकार बोलीं ॥ ३७ ॥
षोडशेमानि वर्षाणि गतानि मुनिपुङ्गव ।
अस्य राज्ञो हतान् पुत्रान् शोचतो न शमो विभो ॥ ३८ ॥
मुनिवर! प्रभो! इन महाराजको अपने मरे हुए पुत्रोंके लिये शोक करते आज सोलह वर्ष बीत गये; किंतु अबतक इन्हें शान्ति नहीं मिली ॥ ३८ ॥
पुत्रशोकसमाविष्टो निःश्वसन् ह्येष भूमिपः ।
न शेते वसतीः सर्वा धृतराष्ट्रो महामुने ॥ ३९ ॥
'महामुने! ये भूमिपाल धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे संतप्त हो सदा लम्बी साँस खींचते और आहें भरते रहते हैं। इन्हें रातभर कभी नींद नहीं आती ॥ ३९ ॥
लोकानन्यान् समर्थोऽसि स्रष्टुं सर्वांस्तपोबलात् ।
किमु लोकान्तरगतान् राज्ञो दर्शयितुं सुतान् ॥ ४० ॥
'आप अपने तपोबलसे इन सब लोकोंकी दूसरी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं, फिर लोकान्तरमें गये हुए पुत्रोंको एक बार राजासे मिला देना आपके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ४० ॥
इयं च द्रौपदी कृष्णा हतज्ञातिसुता भृशम् ।
शोचत्यतीव सर्वासां स्नुषाणां दयिता स्नुषा ॥ ४१ ॥
'यह द्रुपदकुमारी कृष्णा मुझे अपनी समस्त पुत्र-वधुओंमें सबसे अधिक प्रिय है। इस बेचारीके भाई-बन्धु और पुत्र सभी मारे गये हैं; जिससे यह अत्यन्त शोकमग्न रहा करती है ॥ ४१ ॥
तथा कृष्णस्य भगिनी सुभद्रा भद्रभाषिणी ।
सौभद्रवधसंतप्ता भृशं शोचति भाविनी ॥ ४२ ॥
'सदा मंगलमय वचन बोलनेवाली श्रीकृष्णकी बहन भाविनी सुभद्रा सर्वदा अपने पुत्र अभिमन्युके वधसे संतप्त हो निरन्तर शोकमें ही डूबी रहती है ॥
इयं च भूरिश्रवसो भार्या परमसम्मता ।
भर्तृव्यसनशोकार्ता भृशं शोचति भाविनी ॥ ४३ ॥
यस्यास्तु श्वशुरो धीमान् बाह्लिकः स कुरूद्वहः ।
निहतः सोमदत्तश्च पित्रा सह महारणे ॥ ४४ ॥
'ये भूरिश्रवाकी परम प्यारी पत्नी बैठी है, जो पतिकी मृत्युके शोकसे व्याकुल हो अत्यन्त दुःखमें मग्न रहती है। इसके बुद्धिमान् श्वशुर कुरुश्रेष्ठ बाह्लिक भी मारे गये हैं।
भूरिश्रवाके पिता सोमदत्त भी अपने पिताके साथ ही उस महासमरमें वीरगतिको प्राप्त हुए थे॥ ४३-४४॥
श्रीमतोऽस्य महाबुद्धेः संग्रामेष्वपलायिनः ।
पुत्रस्य ते पुत्रशतं निहतं यद् रणाजिरे ॥ ४५ ॥
तस्य भार्याशतमिदं दुःखशोकसमाहतम् ।
पुनः पुनर्धयानं शोकं राज्ञो ममैव च ॥ ४६ ॥
तेनारम्भेण महता मामुपास्ते महामुने ।
'आपके पुत्र, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले, परम बुद्धिमान् जो ये श्रीमान् महाराज हैं, इनके जो सौ पुत्र समरांगणमें मारे गये थे, उनकी ये सौ स्त्रियाँ बैठी हैं। ये मेरी बहुएँ दुःख और शोकके आघात सहन करती हुई मेरे और महाराजके भी शोकको बारंबार बढ़ा रही हैं। महामुने! ये सब-की-सब शोकके महान् आवेगसे रोती हुई मुझे ही घेरकर बैठी रहती हैं॥ ४५-४६ १/२॥
ये च शूरा महात्मानः श्वशुरा मे महारथाः ॥ ४७ ॥
सोमदत्तप्रभृतयः का नु तेषां गतिः प्रभो ।
'प्रभो! जो मेरे महामनस्वी श्वशुर शूरवीर महारथी सोमदत्त आदि मारे गये हैं, उन्हें कौन-सी गति प्राप्त हुई है? ॥ ४७ १/२ ॥
तव प्रसादाद् भगवन् विशोकोऽयं महीपतिः ॥ ४८ ॥
यथा स्याद् भविता चाहं कुन्ती चेयं वधूस्तव ।
'भगवन्! आपके प्रसादसे ये महाराज, मैं और आपकी बहू कुन्ती—ये सब-के-सब जैसे भी शोकरहित हो जायँ, ऐसी कृपा कीजिये॥ ४८ १/२॥
इत्युक्तवत्यां गान्धार्यां कुन्ती व्रतकृशानना ॥ ४९ ॥
प्रच्छन्नजातं पुत्रं तं सस्मारादित्यसंनिभम् ।
जब गान्धारीने इस प्रकार कहा, तब व्रतसे दुर्बल मुखवाली कुन्तीने गुप्तरूपसे उत्पन्न हुए अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी पुत्र कर्णका स्मरण किया॥ ४९ १/२॥
तामृषिर्वरदो व्यासो दूरश्रवणदर्शनः ॥ ५० ॥
अपश्यद् दुःखितां देवीं मातरं सव्यसाचिनः ।
दूरतककी देखने-सुनने और समझनेवाले वरदायक ऋषि व्यासने अर्जुनकी माता कुन्तीदेवीको दुःखमें डूबी हुई देखा॥ ५० १/२॥
तामुवाच ततो व्यासो यत् ते कार्यं विवक्षितम् ॥ ५१ ॥
तद् ब्रूहि त्वं महाभागे यत् ते मनसि वर्तते ।
तब भगवान् व्यासने उनसे कहा—'महाभागे! तुम्हें किसी कार्यके लिये यदि कुछ कहनेकी इच्छा हो, तुम्हारे मनमें यदि कोई बात उठी हो तो उसे कहो॥ ५१ १/२॥
श्वशुराय ततः कुन्ती प्रणम्य शिरसा तदा ॥ ५२ ॥
उवाच वाक्यं सव्रीडा विवृण्वाना पुरातनम् ॥ ५३ ॥
तब कुन्ती ने मस्तक झुकाकर श्वशुरको प्रणाम किया और लज्जित हो प्राचीन गुप्त रहस्यको प्रकट करते हुए कहा ॥ ५२-५३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि धृतराष्ट्रादिकृतप्रार्थने
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें धृतराष्ट्र आदिकी की हुई प्रार्थनाविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥