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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा ।

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[भगवान्‌के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन]

युधिष्ठिर उवाच

देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा ।
शरीरनाशे सम्प्राप्ते कथं प्रेतत्वकल्पना ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्‌! यदि कोई ब्राह्मण परदेश गया हो और वहीं कालकी प्रेरणासे उसका शरीर नष्ट हो जाय तो उसकी प्रेतक्रिया (अन्त्येष्टि-संस्कार) किस प्रकार सम्भव है? ॥

श्रीभगवानुवाच

श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया ।
पालाशवृन्दैः प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता ॥

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्‌! यदि किसी अग्निहोत्री ब्राह्मणकी इस प्रकार मृत्यु हो जाय तो उसका संस्कार करनेके लिये प्रेतकल्पमें बताये अनुसार उसकी काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। वह काष्ठ पलाशका ही होना उचित है ॥

त्रीणि षष्टिशतान्याहुरस्थीन्यस्य युधिष्ठिर ।
तेषां विकल्पना कार्या यथाशास्त्रं विनिश्चितम् ॥

युधिष्ठिर! मनुष्यके शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ बतायी गयी हैं। उन सबकी शास्त्रोक्त रीतिसे कल्पना करके उस प्रतिमाका दाह करना चाहिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

विशेषतीर्थं सर्वेषामशक्तानामनुग्रहात् ।
भक्तानां तारणार्थं तु वक्तुमर्हसि धर्मतः ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्‌! जो भक्त तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ हों, उन सबको तारनेके लिये कृपया किसी विशेष तीर्थका धर्मानुसार वर्णन कीजिये ॥

श्रीभगवानुवाच

पावनं सर्वतीर्थानां सत्यं गायन्ति सामगाः ।
सत्यस्य वचनं तीर्थमहिंसा तीर्थमुच्यते ॥

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्‌! सामवेदका गायन करनेवाले विद्वान्‌ कहते हैं कि सत्य सब तीर्थोंको पवित्र करनेवाला है। सत्य बोलना और किसी जीवकी हिंसा न करना—ये तीर्थ कहलाते हैं ॥

तपस्तीर्थं दया तीर्थं शीलं तीर्थं युधिष्ठिर ।
अल्पसंतोषकं तीर्थं नारी तीर्थं पतिव्रता ॥

युधिष्ठिर! तप, दया, शील, थोड़ेमें संतोष करना—ये सद्गुण भी तीर्थरूपमें ही हैं तथा पतिव्रता नारी भी तीर्थ है ।।

संतुष्टो ब्राह्मणस्तीर्थं ज्ञानं वा तीर्थमुच्यते ।
मद्भक्ताः सततं तीर्थं शङ्करस्य विशेषतः ।।
संतोषी ब्राह्मण और ज्ञानको भी तीर्थ कहते हैं। मेरे भक्त सदैव तीर्थरूप हैं और शंकरके भक्त विशेषतया तीर्थ हैं ।।

यतयस्तीर्थमित्येवं विद्वांसस्तीर्थमुच्यते ।
शरण्यपुरुषस्तीर्थमभयं तीर्थमुच्यते ।।
संन्यासी और विद्वान् भी तीर्थ कहे जाते हैं। दूसरोंको शरण देनेवाले पुरुष भी तीर्थ हैं। जीवोंको अभय दान देना भी तीर्थ ही कहलाता है ।।

त्रैलोक्येऽस्मिन् निरुद्विग्नो न बिभेमि कुतश्चन ।
न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेगः शूद्रलङ्घनात् ।।
मैं तीनों लोकोंमें उद्वेगशून्य हूँ। दिन हो या रात, मुझे कभी किसीसे भी भय नहीं होता; किंतु शूद्रका मर्यादा-भंग करना मुझे बुरा लगता है ।।

न भयं देवदैत्येभ्यो रक्षोभ्यश्चैव मे नृप ।
शूद्रवक्त्राच्च्युतं ब्रह्म भयं तु मम सर्वदा ।।
राजन्! देवता, दैत्य और राक्षसोंसे भी मैं नहीं डरता। परंतु शूद्रके मुखसे जो वेदका उच्चारण होता है, उससे मुझे सदा ही भय बना रहता है ।।

तस्मात् सप्रणवं शूद्रो मन्नामापि न कीर्तयेत् ।
प्रणवं हि परं लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।।
इसलिये शूद्रको मेरे नामका भी प्रणवके साथ उच्चारण नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदवेत्ता विद्वान् इस संसारमें प्रणवको सर्वोत्कृष्ट वेद मानते हैं ।।

द्विजशुश्रूषणं धर्मः शूद्राणां भक्तितो मयि ।
शूद्र मुझमें भक्ति रखते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवा करे—यही उनका परम धर्म है ।।

द्विजशुश्रूषया शूद्रः परं श्रेयोऽधिगच्छति ।
द्विजशुश्रूषणादन्यन्नास्ति शूद्रस्य निष्कृतिः ।।
द्विजोंकी सेवासे ही शूद्र परम कल्याणके भागी होते हैं। इसके सिवा उनके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है ।।

सृष्ट्वा पितामहः शूद्रमभिभूतं तु तामसैः ।
द्विजशुश्रूषणं धर्मं शूद्राणां तु प्रयुक्तवान् ।
नश्यन्ति तामसा भावाः शूद्रस्य द्विजभक्तितः ।।

ब्रह्माजीने शूद्रोंको तामस गुणोंसे युक्त उत्पन्न करके उनके लिये द्विजोंकी सेवारूप धर्मका उपदेश किया। द्विजोंकी भक्तिसे शूद्रके तामस भाव नष्ट हो जाते हैं।।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतं मूर्ध्ना गृह्णामि शूद्रतः ।।
शूद्र भी यदि भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पण करता है तो मैं उसके भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहारको सादर शीश चढ़ाता हूँ ।।

अग्रजो वापि यः कश्चित् सर्वपापसमन्वितः ।
यदि मां सततं ध्यायेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।
सम्पूर्ण पापोंसे युक्त होनेपर भी यदि कोई ब्राह्मण सदा मेरा ध्यान करता रहता है तो वह अपने सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।

विद्याविनयसम्पन्ना ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
मयि भक्तिं न कुर्वन्ति चाण्डालसदृशा हि ते ।।
विद्या और विनयसे सम्पन्न तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् होनेपर भी जो ब्राह्मण मुझमें भक्ति नहीं करते, वे चाण्डालके समान हैं ।।

वृथा दानं वृथा तप्तं वृथा चेष्टं वृथा हुतम् ।
वृथाऽऽतिथ्यं च तत् तस्य यो न भक्तो मम द्विजः ।।
जो द्विज मेरा भक्त नहीं है, उसके दान, तप, यज्ञ, होम और अतिथि-सत्कार—ये सब व्यर्थ हैं ।।

स्थावरे जङ्गमे वापि सर्वभूतेषु पाण्डव ।
समत्वेन यदा कुर्यान्मद्भक्तो मित्रशत्रुषु ।।
पाण्डुनन्दन! जब मनुष्य समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंमें एवं मित्र और शत्रुमें समान दृष्टि कर लेता है, उस समय वह मेरा सच्चा भक्त होता है ।।

आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथाऽऽर्जवम् ।
अद्रोहश्चैव भूतानां मद्गतानां व्रतं नृप ।।
राजन्! क्रूरताका अभाव, अहिंसा, सत्य, सरलता तथा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना—यह मेरे भक्तोंका व्रत है ।।

नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तं श्रद्धयान्वितः ।
तस्याक्षयाऽभवँल्लोकाः श्वपाकस्यापि पार्थिव ।।
पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य मेरे भक्तको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है ।।

किं पुनर्ये यजन्ते मां सदारं विधिपूर्वकम् ।
मद्भक्ता मद्गतप्राणाः कथयन्तश्च मां सदा ।।

फिर जो साक्षात् मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे रहते हैं तथा जो सदा मेरे ही नाम और गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं, वे यदि लक्ष्मीसहित मेरी विधिवत् पूजा करते हैं तो उनकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है? ।।

बहुवर्षसहस्राणि तपस्तपति यो नरः ।
नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ।।
अनेकों हजार वर्षोंतक तपस्या करनेवाला मनुष्य भी उस पदको प्राप्त नहीं होता, जो मेरे भक्तोंको अनायास ही मिल जाता है ।।

मामेव तस्माद् राजेन्द्र ध्यायन् नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यत्येव परं पदम् ।।
इसलिये राजेन्द्र! तुम सदा सजग रहकर निरन्तर मेरा ही ध्यान करते रहो, इससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी और तुम निश्चय ही परम पदका साक्षात्कार कर सकोगे ।।

ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाध्वर्युरेव च ।
सामवेदेन चोद्गाता पुण्येनाभिष्टुवन्ति माम् ।।
अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वणा द्विजाः ।
स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवताः स्मृताः ।।
जो होता बनकर ऋग्वेदके द्वारा, अध्वर्यु होकर यजुर्वेदके द्वारा, उद्गाता बनकर परम पवित्र सामवेदके द्वारा मेरा स्तवन करते हैं तथा अथर्ववेदीय द्विजोंके रूपमें जो अथर्ववेदके द्वारा हमेशा मेरी स्तुति किया करते हैं, वे भगवद्भक्त माने गये हैं ।।

वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवताः ।
देवताः ब्राह्मणाधीनास्तस्माद् विप्रास्तु देवताः ।।
यज्ञ सदा वेदोंके अधीन हैं और देवता यज्ञों तथा ब्राह्मणोंके अधीन होते हैं, इसलिये ब्राह्मण देवता हैं ।।

अनाश्रित्योच्छ्रयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् ।
रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।।
किसीका सहारा लिये बिना कोई ऊँचे नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान आश्रयका सहारा लेना चाहिये। देवतालोग भगवान् रुद्रके आश्रयमें रहते हैं, रुद्र ब्रह्माजीके आश्रित हैं ।।

ब्रह्मा मामाश्रितो राजन् नाहं कंचिदुपाश्रितः ।
ममाश्रयो न कश्चित् तु सर्वेषामाश्रयो ह्यहम् ।।
ब्रह्माजी मेरे आश्रयमें रहते हैं, किंतु मैं किसीके आश्रित नहीं हूँ। राजन्! मेरा आश्रय कोई नहीं है। मैं ही सबका आश्रय हूँ ।।

एवमेतन्मया प्रोक्तं रहस्यमिदमुत्तमम् ।
धर्मप्रियस्य ते नित्यं राजन्नेवं समाचर ।।

राजन्! इस प्रकार ये उत्तम रहस्यकी बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, क्योंकि तुम धर्मके प्रेमी हो। अब तुम इस उपदेशके ही अनुसार सदा आचरण करो॥
इदं पवित्रमाख्यानं पुण्यं वेदेन सम्मितम्।
यः पठेन्मामकं धर्ममहन्यहनि पाण्डव॥
धर्मोऽपि वर्धते तस्य बुद्धिश्चापि प्रसीदति।
पापक्षयमुपेत्यैव कल्याणं च विवर्धते॥
यह पवित्र आख्यान पुण्यदायक एवं वेदके समान मान्य है। पाण्डुनन्दन! जो मेरे बताये हुए इस वैष्णव-धर्मका प्रतिदिन पाठ करेगा, उसके धर्मकी वृद्धि होगी और बुद्धि निर्मल। साथ ही उसके समस्त पापोंका नाश होकर परम कल्याणका विस्तार होगा॥
एतत् पुण्यं पवित्रं च पापनाशनमुत्तमम्।
श्रोतव्यं श्रद्धया युक्तैः श्रोत्रियैश्च विशेषतः॥
यह प्रसंग परम पवित्र, पुण्यदायक, पापनाशक और अत्यन्त उत्कृष्ट है। सभी मनुष्योंको, विशेषतः श्रोत्रिय विद्वानोंको श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करना चाहिये॥
श्रावयेद् यस्त्विदं भक्त्या प्रयतोऽथ शृणोति वा।
स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनाता और पवित्रचित्त होकर सुनता है, वह मेरे सायुज्यको प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका नहीं है॥
यश्चेमं श्रावयेच्छाद्धे मद्भक्तो मत्परायणः।
पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥
मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो भक्त पुरुष श्राद्धमें इस धर्मको सुनाता है, उसके पितर इस ब्रह्माण्डके प्रलय होनेतक सदा तृप्त बने रहते हैं॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा भागवतान् धर्मान् साक्षाद् विष्णोर्जगद्गुरोः।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुताः कथाः॥
ऋषयः पाण्डवाश्चैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम्।
पूजयामास गोविन्दं धर्मपुत्रः पुनः पुनः॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! साक्षात् विष्णुस्वरूप जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भागवत-धर्मोंका श्रवण करके इस अद्भुत प्रसंगपर विचार करते हुए ऋषि और पाण्डवलोग बहुत प्रसन्न हुए और सबने भगवान्‌को प्रणाम किया। धर्मनन्दन युधिष्ठिरने तो बारंबार गोविन्दका पूजन किया॥
देवा ब्रह्मर्षयः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा।
ऋषयश्च महात्मानो गुह्यका भुजगास्तथा॥

बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः ।
तथा भगवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ।।
कौतूहलसमायुक्ता भगवद्भक्तिमागताः ।
श्रुत्वा तु परमं पुण्यं वैष्णवं धर्मशासनम् ।।
विमुक्तपापाः पूतास्ते संवृत्तास्तत्क्षणेन तु ।
देवता, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सराएँ, ऋषि, महात्मा, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्य, तत्त्वदर्शी योगी तथा पञ्चयाम उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष, जो अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उपदेश सुननेके लिये पधारे थे, इस परम पवित्र वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनकर तत्क्षण निष्पाप एवं पवित्र हो गये। सबमें भगवद्भक्ति उमड़ आयी ।।
प्रणम्य शिरसा विष्णुं प्रतिनन्द्य च ताः कथाः ।।
फिर उन सबने भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उनके उपदेशकी प्रशंसा की ।।
द्रष्टारो द्वारकायां वै वयं सर्वे जगद्गुरुम् ।
इति प्रहृष्टमनसो ययुर्देवगणैः सह ।
सर्वे ऋषिगणा राजन् ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ।।
फिर ‘भगवन्! अब हम द्वारकामें पुनः आप जगद्गुरुका दर्शन करेंगे।’ यों कहकर सब ऋषि प्रसन्नचित्त हो देवताओंके साथ अपने-अपने स्थानको चले गये ।।
गतेषु तेषु सर्वेषु केशवः केशिहा हरिः ।
सस्मार दारुकं राजन् स च सात्यकिना सह ।
समीपस्थोऽभवत् सूतो याहि देवेति चाब्रवीत् ।।
राजन्! उन सबके चले जानेपर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसहित दारुकको याद किया। सारथि दारुक पास ही बैठा था, उसने निवेदन किया—‘भगवन्! रथ तैयार है, पधारिये ।।'
ततो विषण्णवदनाः पाण्डवाः पुरुषोत्तमम् ।
अञ्जलिं मूर्ध्नि संधाय नेत्रैरश्रुपरिप्लुतैः ।
पिबन्तः सततं कृष्णां नोचुरार्ततरास्तदा ।।
यह सुनकर पाण्डवोंका मुँह उदास हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर सिरसे लगाया और वे आँसूभरे नेत्रोंसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी ओर एकटक देखने लगे, किंतु अत्यन्त दुखी होनेके कारण उस समय कुछ बोल न सके ।।
कृष्णोऽपि भगवान् देवः पृथामामन्त्र्य चार्तवत् ।
धृतराष्ट्रं च गान्धारीं विदुरं द्रौपदीं तथा ।।
कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्च मन्त्रिणः ।
सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना ।

निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम् ॥
देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण भी उनकी दशा देखकर दुखी-से हो गये और उन्होंने कुन्ती, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर, द्रौपदी, महर्षि व्यास और अन्यान्य ऋषियों एवं मन्त्रियोंसे बिदा लेकर सुभद्रा तथा पुत्रसहित उत्तराकी पीठपर हाथ फेरा और आशीर्वाद देकर वे उस राजभवनसे बाहर निकल आये और रथपर सवार हो गये ॥

वाजिभिः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः ।
युक्तं तु ध्वजभूतेन पतगेन्द्रेण धीमता ॥
उस रथमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे तथा बुद्धिमान् गरुड़का ध्वज फहरा रहा था ॥

अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः ।
अपास्य चाशु यन्तारं दारुकं सूतसत्तमम् ।
अभीषून् प्रतिजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ॥
उस समय कुरुदेशके राजा युधिष्ठिर भी प्रेमवश भगवान्‌के पीछे-पीछे स्वयं भी रथपर जा बैठे और तुरंत ही श्रेष्ठ दारुकको सारथिके स्थानसे हटाकर उन्होंने घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले ली ॥

उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं शुभम् ।
रुक्मदण्डं बृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ॥
फिर अर्जुन भी रथपर आरूढ़ हो स्वर्णदण्डयुक्त विशाल चँवर हाथमें लेकर दाहिनी ओरसे भगवान्‌के मस्तकपर हवा करने लगे ॥

तथैव भीमसेनोऽपि रथमारुह्य वीर्यवान् ।
छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥
इसी प्रकार महाबली भीमसेन भी रथपर जा चढ़े और भगवान्‌के ऊपर छत्र लगाये खड़े हो गये। वह छत्र सौ कमानियोंसे युक्त तथा दिव्य मालाओंसे सुशोभित था ॥

वैदूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् ।
दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छाङ्गधन्वनः ॥
उसका डंडा वैदूर्यमणिका बना हुआ था तथा सोनेकी झालरें उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। भीमसेनने शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्णके उस छत्रको शीघ्र ही धारण कर लिया ।।

उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।
नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ॥
नकुल और सहदेव भी अपने हाथोंमें सफेद चँवर लिये शीघ्र रथपर सवार हो गये और भगवान् जनार्दनके ऊपर डुलाने लगे ।।

भीमसेनोऽर्जुनश्चैव यमावप्यरिसूदनौ ।
पृष्ठतोऽनुययुः कृष्णं मा शब्द इति हर्षिताः ॥
इस प्रकार युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवने हर्षपूर्वक श्रीकृष्णका अनुसरण किया और कहने लगे—'आप मत जाइये' ।।

त्रियोजने व्यतीते तु परिष्वज्य च पाण्डवान् ।
विसृज्य कृष्णस्तान् सर्वान् प्रणतान् द्वारकां ययौ ॥
तीन योजन (चौबीस मील) तक चले आनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपने चरणोंमें पड़े हुए पाण्डवोंको गलेसे लगाकर विदा किया और स्वयं द्वारकाको चले गये ।।

॥ आश्वमेधिकपर्व सम्पूर्णम् ॥

तथा प्रणम्य गोविन्दं तदाप्रभृति पाण्डवाः ।
कपिलाद्यानि दानानि ददुर्धर्मपरायणाः ॥
इस प्रकार भगवान् गोविन्दको प्रणाम करके जब पाण्डव घर लौटे, उस दिनसे सदा धर्ममें तत्पर रहकर कपिला आदि गौओंका दान करने लगे ॥
मधुसूदनवाक्यानि स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ।
मनसा पूजयामासुर्हृदयस्थानि पाण्डवाः ॥
वे सब पाण्डव भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंको बारंबार याद करके और उनको हृदयमें धारण करके मन-ही-मन उनकी सराहना करते थे ॥
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा हृदि कृत्वा जनार्दनम् ।
तद्भक्तस्तन्मना युक्तस्तद्याजी तत्परोऽभवत् ॥
धर्मात्मा युधिष्ठिर ध्यानद्वारा भगवान्‌को अपने हृदयमें विराजमान करके उन्हींके भजनमें लग गये, उन्हींका स्मरण करने लगे और योगयुक्त होकर भगवान्‌का यजन करते हुए उन्हींके परायण हो गये ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलोपाख्याने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें नकुलोपाख्यानविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२२० श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)


॥ आश्वमेधिकपर्व सम्पूर्णम् ॥


अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये२७४७।।(१२२।।)१६८।≡२९१५।।।≡
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१२६५(२१)२८।।।≡१२९३।।।≡

आश्वमेधिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या—४२०९।।।≡