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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य

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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य

इन्द्र उवाच

जानन् यो गामपहरेद् विक्रीयाच्चार्थकारणात् ।
एतद् विज्ञातुमिच्छामि क्व नु तस्य गतिर्भवेत् ॥ १ ॥
**इन्द्रने पूछा—**पितामह! यदि कोई जान-बूझकर दूसरेकी गौका अपहरण करे और धनके लोभसे उसे बेच डाले, उसकी परलोकमें क्या गति होती है? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥

पितामह उवाच

भक्षार्थं विक्रयार्थं वा येऽपहारं हि कुर्वते ।
दानार्थं ब्राह्मणार्थाय तत्रेदं श्रूयतां फलम् ॥ २ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! जो खाने, बेचने या ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये दूसरेकी गाय चुराते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, यह सुनो ॥ २ ॥
विक्रयार्थं हि यो हिंस्याद् भक्षयेद् वा निरंकुशः ।
घातयानं हि पुरुषं येऽनुमन्येयुरर्थिनः ॥ ३ ॥
जो उच्छृंखल मनुष्य मांस बेचनेके लिये गौकी हिंसा करता या गोमांस खाता है तथा जो स्वार्थवश घातक पुरुषको गाय मारनेकी सलाह देते हैं, वे सभी महान् पापके भागी होते हैं ॥ ३ ॥
घातकः खादको वापि तथा यश्चानुमन्यते ।
यावन्ति तस्या रोमाणि तावद् वर्षाणि मज्जति ॥ ४ ॥
गौकी हत्या करनेवाले, उसका मांस खानेवाले तथा गोहत्याका अनुमोदन करनेवाले लोग गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक नरकमें डूबे रहते हैं ॥ ४ ॥
ये दोषा यादृशाश्चैव द्विजयज्ञोपघातके ।
विक्रये चापहारे च ते दोषा वै स्मृताः प्रभो ॥ ५ ॥
प्रभो! ब्राह्मणके यज्ञका नाश करनेवाले पुरुषको जैसे और जितने पाप लगते हैं, दूसरोंकी गाय चुराने और बेचनेमें भी वे ही दोष बताये गये हैं ॥ ५ ॥
अपहृत्य तु यो गां वै ब्राह्मणाय प्रयच्छति ।
यावद् दानफलं तस्यास्तावन्निरयमृच्छति ॥ ६ ॥

जो दूसरेकी गाय चुराकर ब्राह्मणको दान करता है, वह गोदानका पुण्य भोगनेके लिये जितना समय शास्त्रोंमें बताया गया है, उतने ही समयतक नरक भोगता है ॥ ६ ॥
सुवर्णं दक्षिणामाहुर्गोप्रदाने महाद्युते ।
सुवर्णं परमित्युक्तं दक्षिणार्थमसंशयम् ॥ ७ ॥
महातेजस्वी इन्द्र! गोदानमें कुछ सुवर्णकी दक्षिणा देनेका विधान है। दक्षिणाके लिये सुवर्ण सबसे उत्तम बताया गया है। इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥
गोप्रदानात् तारयते सप्त पूर्वांस्तथा परान् ।
सुवर्णं दक्षिणां कृत्वा तावद्द्विगुणमुच्यते ॥ ८ ॥
मनुष्य गोदान करनेसे अपनी सात पीढ़ी पहलेके पितरोंका और सात पीढ़ी आगे आनेवाली संतानोंका उद्धार करता है; किंतु यदि उसके साथ सोनेकी दक्षिणा भी दी जाय तो उस दानका फल दूना बताया गया है ॥
सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा ।
सुवर्णं पावनं शक्र पावनानां परं स्मृतम् ॥ ९ ॥
क्योंकि इन्द्र! सुवर्णका दान सबसे उत्तम दान है। सुवर्णकी दक्षिणा सबसे श्रेष्ठ है, तथा पवित्र करनेवाली वस्तुओंमें सुवर्ण ही सबसे अधिक पावन माना गया है ॥ ९ ॥
कुलानां पावनं प्राहुर्जातरूपं शतक्रतो ।
एषा मे दक्षिणा प्रोक्ता समासेन महाद्युते ॥ १० ॥
महातेजस्वी शतक्रतो! सुवर्ण सम्पूर्ण कुलोंको पवित्र करनेवाला बताया गया है। इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपमें यह दक्षिणाकी बात बतायी ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

एतत् पितामहेनोक्तमिन्द्राय भरतर्षभ ।
इन्द्रो दशरथायाह रामायाह पिता तथा ॥ ११ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह उपर्युक्त उपदेश ब्रह्माजीने इन्द्रको दिया। इन्द्रने राजा दशरथको तथा पिता दशरथने अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको दिया ॥ ११ ॥
राघवोऽपि प्रियभ्रात्रे लक्ष्मणाय यशस्विने ।
ऋषिभ्यो लक्ष्मणेनोक्तमरण्ये वसता प्रभो ॥ १२ ॥
प्रभो! श्रीरामचन्द्रजीने भी अपने प्रिय एवं यशस्वी भ्राता लक्ष्मणको इसका उपदेश दिया। फिर लक्ष्मणने भी वनवासके समय ऋषियोंको यह बात बतायी ॥
पारम्पर्यगतं चेदमृषयः संशितव्रताः ।
दुर्धरं धारयामासू राजानश्चैव धार्मिकाः ॥ १३ ॥
इस प्रकार परम्परासे प्राप्त हुए इस दुर्धर उपदेशको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि और धर्मात्मा राजालोग धारण करते आ रहे हैं ॥ १३ ॥

उपाध्यायेन गदितं मम चेदं युधिष्ठिर ।
य इदं ब्राह्मणो नित्यं वदेद् ब्राह्मणसंसदि ॥ १४ ॥
यज्ञेषु गोप्रदानेषु द्वयोरपि समागमे ।
तस्य लोकाः किलाक्षय्या दैवतैः सह नित्यदा ॥ १५ ॥
(इति ब्रह्मा स भगवान् उवाच परमेश्वरः)

युधिष्ठिर! मुझसे मेरे उपाध्याय (परशुरामजी) ने इस विषयका वर्णन किया था। जो ब्राह्मण अपनी मण्डलीमें बैठकर प्रतिदिन इस उपदेशको दुहराता है और यज्ञमें, गोदानके समय तथा दो व्यक्तियोंके भी समागममें इसकी चर्चा करता है, उसको सदा देवताओंके साथ अक्षयलोक प्राप्त होते हैं। यह बात भी परमेश्वर भगवान् ब्रह्माने स्वयं ही इन्द्रको बतायी है ॥ १४-१५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल १५ १/३ श्लोक हैं)