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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका संवाद

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सप्तनवतितमोऽध्यायः

गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

गार्हस्थ्यं धर्ममखिलं प्रब्रूहि भरतर्षभ ।
ऋद्धिमाप्नोति किं कृत्वा मनुष्य इह पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! अब आप मुझे गृहस्थ-आश्रमके सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश कीजिये। मनुष्य कौन-सा कर्म करके इहलोकमें समृद्धिका भागी होता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तं जनाधिप ।
वासुदेवस्य संवादं पृथिव्याश्चैव भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! भरतनन्दन! इस विषयमें भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीका संवादरूप एक प्राचीन वृत्तान्त बता रहा हूँ ॥ २ ॥
संस्तुत्य पृथिवीं देवीं वासुदेवः प्रतापवान् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ मां त्वं यत् पृच्छसेऽद्य वै ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने पृथ्वी-देवीकी स्तुति करके उनसे यही बात पूछी थी, जो आज तुम मुझसे पूछते हो ॥ ३ ॥

वासुदेव उवाच

गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रित्य मया वा मद्विधेन वा ।
किमवश्यं धरे कार्यं किं वा कृत्वा कृतं भवेत् ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने पूछा— वसुन्धरे! मुझको या मेरे-जैसे किसी दूसरे मनुष्यको गार्हस्थ्य-धर्मका आश्रय लेकर किस कर्मका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये? क्या करनेसे गृहस्थको सफलता मिलती है? ॥ ४ ॥

पृथिव्युवाच

ऋषयः पितरो देवा मनुष्याश्चैव माधव ।
इज्याश्चैवार्चनीयाश्च यथा चैव निबोध मे ॥ ५ ॥
पृथ्वीने कहा— माधव! गृहस्थ पुरुषको सदा ही देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियोंका पूजन एवं सत्कार करना चाहिये। यह सब कैसे करना चाहिये! सो बता रही

हूँ; सुनिये ॥ ५ ॥
सदा यज्ञेन देवाश्च सदाऽऽतिथ्येन मानुषाः ।
छन्दतश्च यथा नित्यमर्हान् भुञ्जीत नित्यशः ॥ ६ ॥
प्रतिदिन यज्ञ-होमके द्वारा देवताओंका, अतिथि-सत्कारके द्वारा मनुष्योंका (श्राद्ध-तर्पण करके पितरोंका) तथा वेदोंका नित्य स्वाध्याय करके पूजनीय ऋषि-महर्षियोंका यथाविधि पूजन और सत्कार करना चाहिये। इसके बाद नित्य भोजन करना उचित है ॥ ६ ॥

तेन ह्यृषिगणाः प्रीता भवन्ति मधुसूदन ।
नित्यमग्निं परिचरेदभुक्त्वा बलिकर्म च ॥ ७ ॥
कुर्यात् तथैव देवा वै प्रीयन्ते मधुसूदन ।
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन च ॥ ८ ॥
पयोमूलफलैर्वापि पितॄणां प्रीतिमाहरन् ।
मधुसूदन! स्वाध्यायसे ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता होती है। प्रतिदिन भोजनके पहले ही अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव कर्म करे। इससे देवता संतुष्ट होते हैं। पितरोंकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन अन्न, जल, दूध अथवा फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करना उचित है ॥ ७-८ १/२ ॥

सिद्धान्नाद् वैश्वदेवं वै कुर्यादग्नौ यथाविधि ॥ ९ ॥
सिद्ध अन्न (तैयार हुई रसोई) मेंसे अन्न लेकर उसके द्वारा विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करना चाहिये ॥ ९ ॥

अग्नीषोमं वैश्वदेवं धान्वन्तरयमनन्तरम् ।
प्रजानां पतये चैव पृथग्घोमो विधीयते ॥ १० ॥
पहले अग्नि और सोमको, फिर विश्वेदेवोंको, तदनन्तर धन्वन्तरिको, तत्पश्चात् प्रजापतिको पृथक्-पृथक् आहुति देनेका विधान है ॥ १० ॥

तथैव चानुपूर्व्येण बलिकर्म प्रयोजयेत् ।
दक्षिणायां यमायेति प्रतीच्यां वरुणाय च ॥ ११ ॥
सोमाय चाप्युदीच्यां वै वास्तुमध्ये प्रजापतेः ।
धन्वन्तरेः प्रागुदीच्यां प्राच्यां शक्राय माधव ॥ १२ ॥
इसी प्रकार क्रमशः बलिकर्मका प्रयोग करे। माधव! दक्षिण दिशामें यमको, पश्चिममें वरुणको, उत्तर दिशामें सोमको, वास्तुके मध्यभागमें प्रजापतिको, ईशानकोणमें धन्वन्तरिको और पूर्वदिशामें इन्द्रको बलि समर्पित करे ॥ ११-१२ ॥

मनुष्येभ्य इति प्राहुर्बलिं द्वारि गृहस्य वै ।
मरुद्भ्यो दैवतेभ्यश्च बलिमन्तर्गृहे हरेत् ॥ १३ ॥
घरके दरवाजेपर सनकादि मनुष्योंके लिये बलि देनेका विधान है। मरुद्गणों तथा देवताओंको घरके भीतर बलि समर्पित करनी चाहिये ॥ १३ ॥

तथैव विश्वेदेवेभ्यो बलिमाकाशतो हरेत् ।
निशाचरेभ्यो भूतेभ्यो बलिं नक्तं तथा हरेत् ॥ १४ ॥
विश्वेदेवोंके लिये आकाशमें बलि अर्पित करे। निशाचरों और भूतोंके लिये रातमें बलि दे ॥ १४ ॥
एवं कृत्वा बलिं सम्यग् दद्याद् भिक्षां द्विजाय वै ।
अलाभे ब्राह्मणस्याग्नावग्रमुद्धृत्य निक्षिपेत् ॥ १५ ॥
इस प्रकार बलि समर्पण करके ब्राह्मणको विधिपूर्वक भिक्षा दे। यदि ब्राह्मण न मिले तो अन्नमेंसे थोड़ा-सा अग्रग्रास निकालकर उसका अग्निमें होम कर दे ॥
यदा श्राद्धं पितृभ्योऽपि दातुमिच्छेत मानवः ।
तदा पश्चात् प्रकुर्वीत निवृत्ते श्राद्धकर्मणि ॥ १६ ॥
पितॄन् संतर्पयित्वा तु बलिं कुर्याद् विधानतः ।
वैश्वदेवं ततः कुर्यात् पश्चाद् ब्राह्मणवाचनम् ॥ १७ ॥
जिस दिन पितरोंका श्राद्ध करनेकी इच्छा हो, उस दिन पहले श्राद्धकी क्रिया पूरी करे। उसके बाद पितरोंका तर्पण करके विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव-कर्म करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे ॥
ततोऽन्नेन विशेषेण भोजयेदतिथीनपि ।
अर्चापूर्वं महाराज ततः प्रीणाति मानवान् ॥ १८ ॥
महाराज! इसके बाद विशेष अन्नके द्वारा अतिथियोंको भी सम्मानपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेसे गृहस्थ पुरुष सम्पूर्ण मनुष्योंको संतुष्ट करता है ॥