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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन

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त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन

भीष्म उवाच

ततस्त्वृषिगणाः सर्वे पितरश्च सदेवताः ।
अरुन्धतीं तपोवृद्धामपृच्छन्त समाहिताः ॥ १ ॥
समानशीलां वीर्येण वसिष्ठस्य महात्मनः ।
त्वत्तो धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।
यत्ते गुह्यतमं भद्रे तत् प्रभाषितुमर्हसि ॥ २ ॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सभी ऋषियों, पितरों और देवताओंने तपस्यामें बढ़ी-चढ़ी हुई अरुन्धती देवीसे, जो शील और शक्तिमें महात्मा वसिष्ठजीके ही समान थीं, एकाग्रचित्त होकर पूछा—'भद्रे! हम आपके मुँहसे धर्मका रहस्य सुनना चाहते हैं। आपकी दृष्टिमें जो गुह्यतम धर्म हो, उसे बतानेकी कृपा करें' ॥ १-२ ॥

अरुन्धत्युवाच

तपोवृद्धिर्मया प्राप्ता भवतां स्मरणेन वै ।
भवतां च प्रसादेन धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ ३ ॥
सगुह्यान् सरहस्यांश्च तान् शृणुध्वमशेषतः ।
श्रद्दधाने प्रयोक्तव्या यस्य शुद्धं तथा मनः ॥ ४ ॥

अरुन्धती बोली—देवगण! आपलोगोंने मुझे स्मरण किया, इससे मेरे तपकी वृद्धि हुई है। अब मैं आप ही लोगोंकी कृपासे गोपनीय रहस्योंसहित सनातन धर्मोंका वर्णन करती हूँ, आपलोग वह सब सुनें। जिसका मन शुद्ध हो, उस श्रद्धालु पुरुषको ही इन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये ॥ ३-४ ॥

अश्रद्दधानो मानी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
असम्भाष्या हि चत्वारो नैषां धर्मः प्रकाशयेत् ॥ ५ ॥

जो श्रद्धासे रहित, अभिमानी, ब्रह्महत्यारे और गुरुस्त्रीगामी हैं, इन चार प्रकारके मनुष्योंसे बात भी नहीं करनी चाहिये। इनके सामने धर्मके रहस्यको प्रकाशित न करे ॥ ५ ॥

अहन्यहनि यो दद्यात् कपिलां द्वादशीः समाः ।
मासि मासि च सत्रेण यो यजेत सदा नरः ॥ ६ ॥
गवां शतसहस्रं च यो दद्याज्ज्येष्ठपुष्करे ।

न तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति ॥ ७ ॥
जो मनुष्य बारह वर्षोंतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है ॥ ६-७ ॥
श्रूयतां चापरो धर्मो मनुष्याणां सुखावहः ।
श्रद्दधानेन कर्तव्यः सरहस्यो महाफलः ॥ ८ ॥
अब मनुष्योंके लिये सुखदायक तथा महान् फल देनेवाले दूसरे धर्मका रहस्यसहित वर्णन सुनो। श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये ॥ ८ ॥
कल्यमुत्थाय गोमध्ये गृह्य दर्भान् सहोदकान् ।
निषिञ्चेत गवां शृङ्गे मस्तकेन च तज्जलम् ॥ ९ ॥
प्रतीच्छेत निराहारस्तस्य धर्मफलं शृणु ।
सबेरे उठकर कुश और जल हाथमें ले गौओंके बीचमें जाय। वहाँ गौओंके सींगपर जल छिड़के और सींगसे गिरे हुए जलको अपने मस्तकपर धारण करे। साथ ही उस दिन निराहार रहे। ऐसे पुरुषको जो धर्मका फल मिलता है, उसे सुनो ॥ ९१/२ ॥
श्रूयन्ते यानि तीर्थानि त्रिषु लोकेषु कानिचित् ॥ १० ॥
सिद्धचारणजुष्टानि सेवितानि महर्षिभिः ।
अभिषेकः समस्तेषां गवां शृङ्गोदकस्य च ॥ ११ ॥
तीनों लोकोंमें सिद्ध, चारण और महर्षियोंसे सेवित जो कोई भी तीर्थ सुने जाते हैं, उन सबमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही गायोंके सींगके जलसे अपने मस्तकको सींचनेसे प्राप्त होता है ॥ १०-११ ॥
साधु साध्विति चोद्दिष्टं देवतैः पितृभिस्तथा ।
भूतैश्चैव सुसंहृष्टैः पूजिता साप्यरुन्धती ॥ १२ ॥
यह सुनकर देवता, पितर और समस्त प्राणी बहुत प्रसन्न हुए। उन सबने उन्हें साधुवाद दिया और अरुन्धती देवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १२ ॥

पितामह उवाच

अहो धर्मो महाभागे सरहस्य उदाहृतः ।
वरं ददामि ते धन्ये तपस्ते वर्धतां सदा ॥ १३ ॥
ब्रह्माजीने कहा— महाभागे! तुम धन्य हो, तुमने रहस्यसहित अद्भुत धर्मका वर्णन किया है। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम्हारी तपस्या सदा बढ़ती रहे ॥ १३ ॥

यम उवाच

रमणीया कथा दिव्या युष्मत्तो या मया श्रुता ।

श्रूयतां चित्रगुप्तस्य भाषितं मम च प्रियम् ।। १४ ।।
**यमराजने कहा—**देवताओ और महर्षियो! मैंने आपलोगोंके मुखसे दिव्य एवं मनोरम कथा सुनी है, अब आपलोग चित्रगुप्तका तथा मेरा भी प्रिय भाषण सुनिये ।।
रहस्यं धर्मसंयुक्तं शक्यं श्रोतुं महर्षिभिः ।
श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता ।। १५ ।।
इस धर्मयुक्त रहस्यको महर्षि भी सुन सकते हैं। अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको भी इसे श्रवण करना चाहिये ।। १५ ।।
न हि पुण्यं तथा पापं कृतं किंचिद् विनश्यति ।
पर्वकाले च यत् किंचिदादित्यं चाधितिष्ठति ।। १६ ।।
मनुष्यका किया हुआ कोई भी पुण्य तथा पाप भोगके बिना नष्ट नहीं होता। पर्वकालमें जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब सूर्यदेवके पास पहुँचता है ।।
प्रेतलोकं गते मर्त्ये तत् तत् सर्वं विभावसुः ।
प्रतिजानाति पुण्यात्मा तच्च तत्रोपयुज्यते ।। १७ ।।
जब मनुष्य प्रेतलोकको जाता है, उस समय सूर्यदेव वे सारी वस्तुएँ उसे अर्पित कर देते हैं और पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें उन वस्तुओंका उपभोग करता है ।।
किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि चित्रगुप्तमतं शुभम् ।
पानीयं चैव दीपं च दातव्यं सततं तथा ।। १८ ।।
अब मैं चित्रगुप्तके मतके अनुसार कुछ कल्याण-कारी धर्मका वर्णन करता हूँ। मनुष्यको जलदान और दीपदान सदा ही करने चाहिये ।। १८ ।।
उपानहौ च छत्रं च कपिला च यथातथम् ।
पुष्करे कपिला देया ब्राह्मणे वेदपारगे ।। १९ ।।
अग्निहोत्रं च यत्नेन सर्वशः प्रतिपालयेत् ।
उपानह (जूता), छत्र तथा कपिला गौका भी यथोचित रीतिसे दान करना चाहिये। पुष्कर तीर्थमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला गाय देनी चाहिये और अग्निहोत्रके नियमका सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये ।। १९½ ।।
अयं चैवापरो धर्मश्चित्रगुप्तेन भाषितः ।। २० ।।
फलमस्य पृथक्त्वेन श्रोतुमर्हन्ति सत्तमाः ।
प्रलयं सर्वभूतैस्तु गन्तव्यं कालपर्ययात् ।। २१ ।।
इसके सिवा यह एक दूसरा धर्म भी चित्रगुप्तने बताया है। उसके पृथक्-पृथक् फलका वर्णन सभी साधु पुरुष सुनें। समस्त प्राणी कालक्रमसे प्रलयको प्राप्त होते हैं ।।
तत्र दुर्गमनुप्राप्ताः क्षुत्तृष्णारिपीडिताः ।
दह्यमाना विपच्यन्ते न तत्रास्ति पलायनम् ।। २२ ।।

पापोंके कारण दुर्गम नरकमें पड़े हुए प्राणी भूख-प्याससे पीड़ित हो अतामें जलते हुए पकाये जाते हैं। वहाँ उस यातनासे निकल भागनेका कोई उपाय नहीं है ।।
अन्धकारं तमो घोरं प्रविशन्त्यल्पबुद्धयः ।
तत्र धर्मं प्रवक्ष्यामि येन दुर्गाणि संतरेत् ।। २३ ।।
मन्दबुद्धि मनुष्य ही नरकके घोर दुःखमय अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। उस अवसरके लिये मैं धर्मका उपदेश करता हूँ, जिससे मनुष्य दुर्गम नरकसे पार हो सकता है ।। २३ ।।
अल्पव्ययं महार्थं च प्रेत्य चैव सुखोदयम् ।
पानीयस्य गुणा दिव्याः प्रेतलोके विशेषतः ।। २४ ।।
उस धर्ममें व्यय बहुत थोड़ा है, परंतु लाभ महान् है। उससे मृत्युके पश्चात् भी उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं। प्रेतलोकमें ये गुण विशेषरूपसे लक्षित होते हैं ।। २४ ।।
तत्र पुण्योदका नाम नदी तेषां विधीयते ।
अक्षयं सलिलं तत्र शीतलं ह्यमृतोपमम् ।। २५ ।।
वहाँ पुण्योदका नामसे प्रसिद्ध नदी है, जो यमलोकनिवासियोंके लिये विहित है। उसमें अमृतके समान मधुर, शीतल एवं अक्षय जल भरा रहता है ।।
स तत्र तोयं पिबति पानीयं यः प्रयच्छति ।
प्रदीपस्य प्रदानेन श्रूयतां गुणविस्तरः ।। २६ ।।
जो यहाँ जलदान करता है, वही परलोकमें जानेपर उस नदीका जल पीता है। अब दीपदानसे जो अधिकाधिक लाभ होता है, उसको सुनो ।। २६ ।।
तमोऽन्धकारं नियतं दीपदो न प्रपश्यति ।
प्रभां चास्य प्रयच्छन्ति सोमभास्करपावकाः ।। २७ ।।
दीपदान करनेवाला मनुष्य नरकके नियत अन्धकारका दर्शन नहीं करता। उसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि प्रकाश देते रहते हैं ।। २७ ।।
देवताश्चानुमन्यन्ते विमलाः सर्वतो दिशः ।
द्योतते च यथाऽऽदित्यः प्रेतलोकगतो नरः ।। २८ ।।
देवता भी दीपदान करनेवालेका आदर करते हैं। उसके लिये सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल होती हैं तथा प्रेतलोकमें जानेपर वह मनुष्य सूर्यके समान प्रकाशित होता है ।।
तस्माद् दीपः प्रदातव्यः पानीयं च विशेषतः ।
कपिलां ये प्रयच्छन्ति ब्राह्मणे वेदपारगे ।। २९ ।।
पुष्करे च विशेषेण श्रूयतां तस्य यत् फलम् ।
गोशतं सवृषं तेन दत्तं भवति शाश्वतम् ।। ३० ।।
इसलिये विशेष यत्न करके दीप और जलका दान करना चाहिये। विशेषतः पुष्कर तीर्थमें जो वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला दान करते हैं, उन्हें उस दानका जो

फल मिलता है, उसे सुनो। उसे साँड़ों-सहित सौ गौओंके दानका शाश्वत फल प्राप्त होता है।।

पापं कर्म च यत् किंचिद् ब्रह्महत्यासमं भवेत् ।
शोधयेत् कपिला ह्येका प्रदत्तं गोशतं यथा ॥ ३१ ॥
तस्मात्तु कपिला देया कौमुद्यां ज्येष्ठपुष्करे ।
ब्रह्महत्याके समान जो कोई पाप होता है, उसे एकमात्र कपिलाका दान शुद्ध कर देता है। वह एक ही गोदान सौ गोदानोंके बराबर है। इसलिये ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें कार्तिककी पूर्णिमाको अवश्य कपिला गौका दान करना चाहिये ॥ ३१ १/२ ॥

न तेषां विषमं किंचिन्न दुःखं न च कण्टकाः ॥ ३२ ॥
उपानहौ च यो दद्यात् पात्रभूते द्विजोत्तमे ।
छत्रदाने सुखं छायां लभते परलोकगः ॥ ३३ ॥
जो श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मणको उपानह (जूता) दान करता है, उसके लिये कहीं कोई विषम स्थान नहीं है। न उसे दुःख उठाना पड़ता है और न काँटोंका ही सामना करना पड़ता है। छत्र-दान करनेसे परलोकमें जानेपर दाताको सुखदायिनी छाया सुलभ होती है ॥

न हि दत्तस्य दानस्य नाशोऽस्तीह कदाचन ।
चित्रगुप्तमतं श्रुत्वा हृष्टरोमा विभावसुः ॥ ३४ ॥
उवाच देवताः सर्वाः पितॄंश्चैव महाद्युतिः ।
श्रुतं हि चित्रगुप्तस्य धर्मगुह्यं महात्मनः ॥ ३५ ॥
इस लोकमें दिये हुए दानका कभी नाश नहीं होता। चित्रगुप्तका यह मत सुनकर भगवान् सूर्यके शरीरमें रोमांच हो आया। उन महातेजस्वी सूर्यने सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंसे कहा—'आपलोगोंने महामना चित्रगुप्तके धर्मविषयक गुप्त रहस्यको सुन लिया ॥

श्रद्दधानाश्च ये मर्त्या ब्राह्मणेषु महात्मसु ।
दानमेतत् प्रयच्छन्ति न तेषां विद्यते भयम् ॥ ३६ ॥
'जो मनुष्य महामनस्वी ब्राह्मणोंपर श्रद्धा करके यह दान देते हैं, उन्हें भय नहीं होता' ॥ ३६ ॥

धर्मदोषास्त्विमे पञ्च येषां नास्तीह निष्कृतिः ।
असम्भाष्या अनाचारा वर्जनीया नराधमाः ॥ ३७ ॥
आगे बताये जानेवाले पाँच धर्मविषयक दोष जिनमें विद्यमान हैं, उनका यहाँ कभी उद्धार नहीं होता। ऐसे अनाचारी नराधमोंसे बात नहीं करनी चाहिये। उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ३७ ॥

ब्रह्महा चैव गोघ्नश्च परदाररतश्च यः ।
अश्रद्दधानश्च नरः स्त्रियं यश्चोपजीवति ॥ ३८ ॥

ब्रह्महत्यारा, गोहत्या करनेवाला, परस्त्रीलम्पट, अश्रद्धालु तथा जो स्त्रीपर निर्भर रहकर जीविका चलाता है—ये ही पूर्वोक्त पाँच प्रकारके दुराचारी हैं ॥ ३८ ॥

प्रेतलोकगता ह्येते नरके पापकर्मिणः ।
पच्यन्ते वै यथा मीनाः पूयशोणितभोजनाः ॥ ३९ ॥
ये पापकमी मनुष्य प्रेतलोकमें जाकर नरककी आगमें मछलियोंकी तरह पकाये जाते हैं और पीब तथा रक्त भोजन करते हैं ॥ ३९ ॥

असम्भाष्याः पितॄणां च देवानां चैव पञ्च ते ।
स्नातकानां च विप्राणां ये चान्ये च तपोधनाः ॥ ४० ॥
इन पाँचों पापाचारियोंसे देवताओं, पितरों, स्नातक ब्राह्मणों तथा अन्यान्य तपोधनोंको बातचीत भी नहीं करनी चाहिये ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अरुन्धतीचित्रगुप्तरहस्ये त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अरुन्धती और चित्रगुप्तका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥