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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2279)

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षष्ठोऽध्यायः

धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश

धृतराष्ट्र उवाच

मण्डलानि च बुध्येथाः परेषामात्मनस्तथा ।
उदासीनगणानां च मध्यस्थानां च भारत ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— भरतनन्दन! तुम्हें शत्रुओंके, अपने, उदासीन राजाओंके तथा मध्यस्थ पुरुषोंके मण्डलोंका ज्ञान रखना चाहिये ॥ १ ॥

चतुर्णां शत्रुजातानां सर्वेषामाततायिनाम् ।
मित्रं चामित्रमित्रं च बोद्धव्यं तेऽरिकर्शन ॥ २ ॥

शत्रुसूदन! तुम्हें चार प्रकारके शत्रुओंके और छः प्रकारके आततायियोंके भेदोंको एवं मित्र और शत्रुके मित्रको भी पहचानना चाहिये ॥ २ ॥

तथामात्या जनपदा दुर्गाणि विविधानि च ।
बलानि च कुरुश्रेष्ठ भवत्येषां यथेच्छकम् ॥ ३ ॥
ते च द्वादश कौन्तेय राज्ञां वै विषयात्मकाः ।
मन्त्रिप्रधानाश्च गुणाः षष्टिर्द्वादश च प्रभो ॥ ४ ॥
एतन्मण्डलमित्याहुराचार्या नीतिकोविदाः ।

कुरुश्रेष्ठ! अमात्य (मन्त्री), जनपद (देश), नाना प्रकारके दुर्ग और सेना—इनपर शत्रुओंका यथेष्ट लक्ष्य रहता है (अतः इनकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये)। प्रभो! कुन्तीनन्दन! उपर्युक्त बारह प्रकारके मनुष्य राजाओंके ही मुख्य विषय हैं। मन्त्रीके अधीन रहनेवाले कृषि आदि साठ* गुण और पूर्वोक्त बारह प्रकारके मनुष्य—इन सबको नीतिज्ञ आचार्योंने 'मण्डल' नाम दिया है ॥ ३-४½ ॥

अत्र षाड्गुण्यमायत्तं युधिष्ठिर निबोध तत् ॥ ५ ॥
वृद्धिक्षयौ च विज्ञेयौ स्थानं च कुरुसत्तम ।

युधिष्ठिर! तुम इस मण्डलको अच्छी तरह जानो; क्योंकि राज्यकी रक्षाके संधि-विग्रह आदि छः उपायोंका उचित उपभोग इन्हींके अधीन है। कुरुश्रेष्ठ! राजाको चाहिये कि वह अपनी वृद्धि, क्षय और स्थितिका सदा ही ज्ञान रखे ॥ ५½ ॥

द्विसप्तत्यां महाबाहो ततः षाड्गुण्यजा गुणाः ॥ ६ ॥
यदा स्वपक्षो बलवान् परपक्षस्तथाबलः ।
विगृह्य शत्रून् कौन्तेय जेयः क्षितिपतिस्तदा ॥ ७ ॥

महाबाहो! पहले राजप्रधान बारह और मन्त्रिप्रधान साठ—इन बहत्तरका ज्ञान प्राप्त करके संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका यथावसर उपयोग किया जाता है। कुन्तीनन्दन! जब अपना पक्ष बलवान् तथा शत्रु का पक्ष निर्बल जान पड़े, उस समय शत्रुके साथ युद्ध छेड़कर विपक्षी राजाको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये ।। ६-७ ।।
यदा परे च बलिनः स्वपक्षश्चैव दुर्बलः ।
सार्धं विद्वांस्तदा क्षीणः परैः संधिं समाश्रयेत् ।। ८ ।।
परंतु जब शत्रु-पक्ष प्रबल और अपना ही पक्ष दुर्बल हो, उस समय क्षीणशक्ति विद्वान् पुरुष शत्रुओंके साथ संधि कर ले ।। ८ ।।
द्रव्याणां संचयश्चैव कर्तव्यः सुमहांस्तथा ।
तदा समर्थो यानाय नचिरेणैव भारत ।। ९ ।।
तदा सर्वं विधेयं स्यात् स्थाने न स विचारयेत् ।
भारत! राजाको सदैव द्रव्योंका महान् संग्रह करते रहना चाहिये। जब वह शीघ्र ही शत्रुपर आक्रमण करनेमें समर्थ हो, उस समय उसका जो कर्तव्य हो, उसे वह स्थिरतापूर्वक भलीभाँति विचार ले ।। ९ १/२ ।।
भूमिरल्पफला देया विपरीतस्य भारत ।। १० ।।
हिरण्यं कुप्यभूयिष्ठं मित्रं क्षीणमथो बलम् ।
भारत! यदि अपनी विपरीत अवस्था हो तो शत्रुको कम उपजाऊ भूमि, थोड़ा-सा सोना और अधिक मात्रामें जस्ता-पीतल आदि धातु तथा दुर्बल मित्र एवं सेना देकर उसके साथ संधि करे ।। १० १/२ ।।
विपरीतान्निगृह्णीयात् स्वं हि संधिविशारदः ।। ११ ।।
संध्यर्थं राजपुत्रं वा लिप्सैथा भरतर्षभ ।
विपरीतं न तच्छ्रेयः पुत्र कस्यांचिदापदि ।। १२ ।।
तस्याः प्रमोक्षे यत्नं च कुर्याः सोपायमन्त्रवित् ।
यदि शत्रु की विपरीत दशा हो और वह संधिके लिये प्रार्थना करे तो संधिविशारद पुरुष उससे उपजाऊ भूमि, सोना-चाँदी आदि धातु तथा बलवान् मित्र एवं सेना लेकर उसके साथ संधि करे अथवा भरतश्रेष्ठ! प्रतिद्वन्द्वी राजाके राजकुमारको ही अपने यहाँ जमानतके तौरपर रखनेकी चेष्टा करनी चाहिये। इसके विपरीत बर्ताव करना अच्छा नहीं है। बेटा! यदि कोई आपत्ति आ जाय तो उचित उपाय और मन्त्रणाके ज्ञाता तुम-जैसे राजाको उससे छूटनेका प्रयत्न करना चाहिये ।।
प्रकृतीनां च राजेन्द्र राजा दीनान् विभावयेत् ।। १३ ।।
क्रमेण युगपत् सर्वं व्यवसायं महाबलः ।
पीडनं स्तम्भनं चैव कोशभङ्गस्तथैव च ।। १४ ।।

राजेन्द्र! प्रजाजनोंके भीतर जो दीन-दरिद्र (अन्ध-बधिर आदि) मनुष्य हों, उनका भी राजा आदर करे। महाबली राजा अपने शत्रुके विपरीत क्रमशः अथवा एक साथ सारा उद्योग आरम्भ कर दे। वह उसे पीड़ा दे। उसकी गति अवरुद्ध करे और उसका खजाना नष्ट कर दे ॥ १३-१४ ॥

कार्यं यत्नेन शत्रूणां स्वराज्यं रक्षता स्वयम् ।
न च हिंस्योऽभ्युपगतः सामन्तो वृद्धिमिच्छता ॥ १५ ॥
अपने राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको यत्नपूर्वक शत्रुओंके साथ उपर्युक्त बर्ताव करना चाहिये; परंतु अपनी वृद्धि चाहनेवाले नरेशको शरणमें आये हुए सामन्तका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

कौन्तेय तं न हिंसेत् स यो महीं विजिगीषते ।
गणानां भेदने योगमीप्सेथाः सह मन्त्रिभिः ॥ १६ ॥
कुन्तीकुमार! जो समूची पृथ्वीपर विजय पाना चाहता हो, वह तो कदापि उस (सामन्त)-की हिंसा न करे। तुम अपने मन्त्रियोंसहित सदा शत्रुगणोंमें फूट डालनेकी इच्छा रखना ॥ १६ ॥

साधुसंग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात् तथा ।
दुर्बलांश्चैव सततं नान्वेष्टव्या बलीयसा ॥ १७ ॥
अच्छे पुरुषोंसे मेल-जोल बढ़ाये और दुष्टोंको कैद करके उन्हें दण्ड दे। महाबली नरेशको दुर्बल शत्रुके पीछे सदा नहीं पड़े रहना चाहिये ॥ १७ ॥

तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः ।
यद्येनमभियायाच्च बलवान् दुर्बलं नृपः ॥ १८ ॥
सामादिभिरुपायैस्तं क्रमेण विनिवर्तयेः ।
राजसिंह! तुम्हें बेंतकी-सी वृत्ति (नम्रता)-का आश्रय लेकर रहना चाहिये। यदि किसी दुर्बल राजापर बलवान् राजा आक्रमण करे तो क्रमशः साम आदि उपायोंद्वारा उस बलवान् राजाको लौटानेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ १८ १/२ ॥

अशक्नुवंश्च युद्धाय निष्पतेत् सह मन्त्रिभिः ॥ १९ ॥
कोशेन पौरैर्दण्डेन ये चास्य प्रियकारिणः ।
यदि अपनेमें युद्धकी शक्ति न हो तो मन्त्रियोंके साथ उस आक्रमणकारी राजाकी शरणमें जाय तथा कोश, पुरवासी मनुष्य, दण्डशक्ति एवं अन्य जो प्रिय कार्य हों, उन सबको अर्पित करके उस प्रतिद्वन्द्वीको लौटानेकी चेष्टा करे ॥ १९ १/२ ॥

असम्भवे तु सर्वस्य यथा मुख्येन निष्पतेत् ।
क्रमेणानेन मुक्तिः स्याच्छरीरमिति केवलम् ॥ २० ॥
यदि किसी भी उपायसे संधि न हो तो मुख्य साधनको लेकर विपक्षीपर युद्धके लिये टूट पड़े। इस क्रमसे शरीर चला जाय तो भी वीर पुरुषकी मुक्ति ही होती है। केवल शरीर दे

देना ही उसका मुख्य साधन है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपदेशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपदेशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


* कृषि आदि आठ सन्धान कर्म हैं। बाल आदि बीस असन्धेय हैं। नास्तिकता आदि चौदह दोष हैं और मन्त्र आदि अठारह तीर्थ हैं। उन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन पहले आ चुका है।