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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1991)

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अर्जुन अपने पुत्र बभ्रुवाहनको छातीसे लगा रहे हैं

‘उनकी बातें सुनकर मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं और पातालमें प्रवेश करके मैंने अपने पितासे यह सारा समाचार कह सुनाया। यह सुनकर पिताजीको भी बड़ा खेद हुआ॥ १५ १/२ ॥
पिता तु मे वसून् गत्वा त्वदर्थे समयाचत ॥ १६ ॥
पुनः पुनः प्रसाद्यैतांस्त एनमिदमब्रुवन् ।
‘वे तत्काल वसुओंके पास जाकर उन्हें बारंबार प्रसन्न करके आपके लिये उनसे बारंबार क्षमा-याचना करने लगे। तब वसुगण उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १६ १/२ ॥
पुत्रस्तस्य महाभाग मणिपूरेश्वरो युवा ॥ १७ ॥
स एनं रणमध्यस्थः शरैः पातयिता भुवि ।
एवं कृते स नागेन्द्र मुक्तशापो भविष्यति ॥ १८ ॥
“महाभाग नागराज! मणिपुरका नवयुवक राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका पुत्र है। वह युद्ध-भूमिमें खड़ा होकर अपने बाणोंद्वारा जब उन्हें पृथ्वीपर गिरा देगा, तब अर्जुन हमारे शापसे मुक्त हो जायँगे ॥ १७-१८ ॥
गच्छेति वसुभिश्चोक्तो मम चेदं शशंस सः ।
तच्छ्रुत्वा त्वं मया तस्माच्छापादसि विमोक्षितः ॥ १९ ॥
“'अच्छा अब जाओ' वसुओंके ऐसा कहनेपर मेरे पिताने आकर मुझसे यह बात बतायी। इसे सुनकर मैंने इसीके अनुसार चेष्टा की है और आपको उस शापसे छुटकारा दिलाया है ॥ १९ ॥
न हि त्वां देवराजोऽपि समरेषु पराजयेत् ।
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात् तेनेहासि पराजितः ॥ २० ॥
‘प्राणनाथ! देवराज इन्द्र भी आपको युद्धमें परास्त नहीं कर सकते, पुत्र तो अपना आत्मा ही है, इसीलिये इसके हाथसे यहाँ आपकी पराजय हुई है ॥ २० ॥
न हि दोषो मम मतः कथं वा मन्यसे विभो ।
इत्येवमुक्तो विजयः प्रसन्नात्माब्रवीदिदम् ॥ २१ ॥
‘प्रभो! मैं समझती हूँ कि इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अथवा आपकी क्या धारणा है? क्या यह युद्ध कराकर मैंने कोई अपराध किया है?’
उलूपीके ऐसा कहनेपर अर्जुनका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने कहा— ॥ २१ ॥
सर्वं मे सुप्रियं देवि यदेतत् कृतवत्यसि ।
इत्युक्त्वा सोऽब्रवीत् पुत्रं मणिपूरपतिं जयः ॥ २२ ॥
चित्राङ्गदायाः शृण्वत्याः कौरव्यदुहितुस्तदा ।
‘देवि! तुमने जो यह कार्य किया है, यह सब मुझे अत्यन्त प्रिय है।’ यों कहकर अर्जुनने चित्रांगदा तथा उलूपीके सुनते हुए अपने पुत्र मणिपुरनरेश बभ्रुवाहनसे कहा— ॥ २२ १/२ ॥
युधिष्ठिरस्याश्वमेधः परिचैत्रीं भविष्यति ॥ २३ ॥

तत्रागच्छेः सहामात्यो मातृभ्यां सहितो नृप ॥ २४ ॥
'नरेश्वर! आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरके यज्ञका आरम्भ होगा। उसमें तुम अपनी इन दोनों माताओं और मन्त्रियोंके साथ अवश्य आना' ॥
इत्येवमुक्तः पार्थेन स राजा बभ्रुवाहनः ।
उवाच पितरं धीमानिदमस्राविलेक्षणः ॥ २५ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहनने नेत्रोंमें आँसू भरकर पितासे इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥
उपयास्यामि धर्मज्ञ भवतः शासनादहम् ।
अश्वमेधे महायज्ञे द्विजातिपरिवेषकः ॥ २६ ॥
'धर्मज्ञ! आपकी आज्ञासे मैं अश्वमेध महायज्ञमें अवश्य उपस्थित होऊँगा और ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका काम करूँगा ॥ २६ ॥
मम त्वनुग्रहार्थाय प्रविशस्व पुरं स्वकम् ।
भार्याभ्यां सह धर्मज्ञ मा भूत् तेऽत्र विचारणा ॥ २७ ॥
'इस समय आपसे एक प्रार्थना है—धर्मज्ञ! आज मुझपर कृपा करनेके लिये अपनी इन दोनों धर्मपत्नियोंके साथ इस नगरमें प्रवेश कीजिये। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥
उषित्वेह निशामेकां सुखं स्वभवने प्रभो ।
पुनरश्वानुगमनं कर्तासि जयतां वर ॥ २८ ॥
'प्रभो! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ! यहाँ भी आपका ही घर है। अपने उस घरमें एक रात सुखपूर्वक निवास करके कल सबेरे फिर घोड़ेके पीछे-पीछे जाइयेगा' ॥ २८ ॥
इत्युक्तः स तु पुत्रेण तदा वानरकेतनः ।
स्मयन् प्रोवाच कौन्तेयस्तदा चित्राङ्गदासुतम् ॥ २९ ॥
पुत्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन कपिध्वज अर्जुनने मुसकराते हुए चित्राङ्गदाकुमारसे कहा— ॥ २९ ॥
विदितं ते महाबाहो यथा दीक्षां चराम्यहम् ।
न स तावत् प्रवेक्ष्यामि पुरं ते पृथुलोचन ॥ ३० ॥
'महाबाहो! यह तो तुम जानते ही हो कि मैं दीक्षा ग्रहण करके विशेष नियमोंके पालनपूर्वक विचर रहा हूँ। अतः विशाललोचन! जबतक यह दीक्षा पूर्ण नहीं हो जाती तबतक मैं तुम्हारे नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा ॥ ३० ॥
यथाकामं व्रजत्येष यज्ञियाश्वो नरर्षभ ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि न स्थानं विद्यते मम ॥ ३१ ॥
'नरश्रेष्ठ! यह यज्ञका घोड़ा अपनी इच्छाके अनुसार चलता है (इसे कहीं भी रोकनेका नियम नहीं है); अतः तुम्हारा कल्याण हो। मैं अब जाऊँगा। इस समय मेरे ठहरनेके लिये

कोई स्थान नहीं है' ।। ३१ ।।
स तत्र विधिवत् तेन पूजितः पाकशासनः ।
भार्याभ्यामभ्यनुज्ञातः प्रायाद् भरतसत्तमः ।। ३२ ।।
तदनन्तर वहाँ बभ्रुवाहनने भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष इन्द्रकुमार अर्जुनकी विधिवत् पूजा की और वे अपनी दोनों भार्याओंकी अनुमति लेकर वहाँसे चल दिये ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वका अनुसरणविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।